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सरना स्थलों पर सादगी से मना सरहुल, कोरोना से मुक्ति के लिए हुई प्रार्थना, सीएम ने सिरम टोली में की पूजा

Ranchi : आदिवासियों का सरहुल पर्व गुरुवार को कोरोना के बीच पारंपरिक तरीके और सादगी से मनाया जा रहा है. प्रकृति का त्योहार सरहुल को झारखंड में काफी धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन पिछले साल की तरह इस साल भी कोरोना की वजह से पर्व सादगी से मना. रांची के मुख्य सरना स्थल में हातमा और सिरम टोली सहित कई सरना स्थलों में सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए पाहन ने पूर्ण पारम्परिक रीति-रिवाज के साथ पूजा अर्चना की.

सीएम ने प्रकृति की पूजा की, लोगों को दी शुभकामनाएं

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सीएम हेमंत सोरेन ने भी सिरम टोली सरना स्थल पर प्रकृति पर्व सरहुल पर पूजा की. मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर ईश्वर से राज्यवासियों की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की. मौके पर मुख्यमंत्री ने राज्यवासियों को प्रकृति पर्व सरहुल, चैत्र नवरात्रि, रमजान, पहला बैशाख सहित आदि की शुभकामनाएं दीं.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य की जनता से अपील की कि कोरोना संक्रमण के इस दौर में सावधानी अवश्य बरतें. स्वयं के साथ-साथ अपने परिजनों का भी विशेष ख्याल रखें. उन्होंने कहा कि संक्रमण की स्थिति में भी हमें परंपरा को अक्षुण्ण रखना है. कोरोना संक्रमण के मद्देनजर सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन का पूरा अनुपालन करें. सीएम मधुपुर दौरे से वापस रांची लौटते ही एयरपोर्ट से सीधे सिरम टोली स्थित सरना स्थल पहुंचे. मुख्यमंत्री को सरना स्थल पर पाहन रोहित हंस ने पूजा-अर्चना करायी.

पूजा स्थलों पर कम रही भीड़

इस दौरान कोरोना के संक्रमण को देखते हुए पूजा स्थलों में काफी कम भीड़ रही. सरहुल पूजा की शुरुआत सबसे पहले हातमा में पहान जगलाल हेम्ब्रोम ने किया. उसके बाद सिरम टोली में पाहन रोहित हंस ने किया और नगड़ा टोली के चंदन हलधर पहान ने पूजा की. सरना स्थलों पर पारम्परिक तरीके से मुर्गे की बलि दी गई. समाज के लोगो ने पारम्परिक रूप से पहान को पानी से नहलाया. इसी तरह अन्य मौजा सरना स्थलों में पूजा अर्चना की गई. साथ ही कोरोना संक्रमण से लोगों पर आये संकट को दूर करने और रक्षा करने के लिए प्रार्थना की गई. लोग पारम्परिक आदिवासी कपड़ों में सम्मिलित हुए और पूजा स्थल पर मांदर, नगाड़ों की धुन और पारम्परिक सरहुल गीतों के साथ पूजा अनुष्ठान की विधि पूरी की गयी.

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नहीं निकाली गयी सरहुल की शोभायात्रा

कोरोना संक्रमण के बचाव के लिए पिछले साल की तरह इस बार भी सरहुल की शोभायात्रा नहीं निकाली गयी. इसको लेकर सभी सरना व आदिवासी संगठनों ने बैठक में ही निर्णय ले लिया गया था. न ही कहीं पर सामूहिक नृत्य और संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो सरहुल त्योहार का प्रमुख आकर्षण हुआ करता था.

सरहुल में साल और सखुआ वृक्ष की होती है विशेष पूजा

आदिवासियों की प्रकृति प्रेम के प्रतीक के रूप में सरहुल पर्व पूरे राज्य में मनाया जाता है. यह आदिवासी समुदाय का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है. यह पर्व रबी की फसल कटने के साथ ही आरंभ होता है. इसलिए इसे नए वर्ष के आगमन के रूप में भी मनाया जाता है. इस पर्व में साल व सखुआ वृक्ष की विशेष तौर पर पूजा की जाती है. साथ ही पूर्व संध्या में दो घड़े में रखे जल को देखकर यह भविष्यवाणी की जाती है कि इस साल बारिश की स्थिति कैसी रहेगी.

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