जस्टिस एलपीएन शाहदेव की पुण्यतिथि पर विशेष Lagatar Desk : मूलवासियों के एक बड़े वर्ग को आंदोलन से जोड़ने में जस्टिस शाहदेव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. झारखंड आंदोलन में जस्टिस एलपीएन शाहदेव की प्रखर भूमिका रही. जस्टिस शाहदेव ने इस आंदोलन को बौद्धिक खुराक दी. झारखंड आंदोलन जब अपने अंतिम दौर में था और अलग राज्य लेने के लिए एक सामूहिक व संगठित प्रहार की जरूरत थी, तब जस्टिस शाहदेव ने बौद्धिक नेतृत्व किया. पूरे एक दशक तक सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति ने सड़कों पर उतर कर आंदोलन किया. उनके अंदर झारखंड अलग राज्य के लिए एक छटपटाहट थी. जस्टिस शाहदेव हमेशा कहते थे कि झारखंडी अपने हक अधिकार के लिए संकोच न करें, पूरी ताकत से लड़ें. एक समय झारखंड आंदोलन पूरी तेवर और आक्रमकता के साथ चल रहा था. तब जस्टिस शाहदेव ने कहा था कि कोई आंदोलन अहिंसक और लोकतांत्रिक रहे, इसके लिए हमेशा अनुशासन में बंधकर संगठित रूप से काम करना होगा. वे यह भी बोलने में नहीं हिचकते थे कि जब कोई आंदोलन अहिंसक और लोकतांत्रिक रहता है, तब तक सत्ता में बैठे लोग आंदोलन की आवाज को सुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं. आंदोलन के इस दौर में जस्टिस शाहदेव ने मूल वासियों के एक बड़े वर्ग को आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. कतिपय झारखंडी नेताओं के विवादास्पद बयानों के कारण मूलवासियों का एक बड़ा वर्ग आंदोलन को थोड़ा संदेह की दृष्टि से देखाता था. लेकिन जस्टिस शाहदेव के आने के बाद धीरे-धीरे यह वर्ग भी पूरे तरीके से आंदोलन में जुड़ गया.
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alt="" width="600" height="400" /> समाज के बुद्धिजीवियों की गोलबंदी नहीं हो पा रही थी. जस्टिस एलपीएन शाहदेव ने आंदोलन का न सिर्फ ऊर्जावान नेतृत्व दिया, बल्कि बुद्धिजीवियों को लगातार जागरूक भी करते रहे. वे झारखंड आंदोलन में बिखरी ताकतों को एक मंच पर लाने के लिए पूरा जोर लगाते रहे. इसी का परिणाम है कि सर्वदलीय राज्य निर्माण समिति का गठन हुआ. 21 दिसंबर 1998 को झारखंड आंदोलन अपने अंतिम चरण पर था. एक सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सड़क पर एक जुलूस का नेतृत्व कर रहा था. जस्टिस शाहदेव की गिरफ्तारी भी हुई. इस घटना ने आंदोलन को बड़ी ताकत दी. आदिवासी- मूलवासी, बौद्धिक तबका इस आंदोलन में सहभागी बनने के लिए आगे आया. झारखंड राज्य के अलग निर्माण में जस्टिस शाहदेव ने कई बार आंदोलन को कानूनी उलझन से निकालने का भी काम किया. केंद्र सरकार ने झारखंड मामले के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनायी थी, वीएस लाल तब गृह सचिव थे. आंदोलनकारी संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी अड़चन को लेकर जस्टिस शाहदेव से लगातार संवाद करते रहते थे. वे हर मोर्चे पर एक सिपाही की तरह डटे रहे. झारखंड आंदोलन के क्रम में आत्मविश्वास जब भी डगमगाता, तब जस्टिस शाहदेव आंदोलनकारियों के लिए अभिभावक की तरह खड़े रहे. जस्टिस शाहदेव इस बात के हिमायती थे कि झारखंड सिर्फ अपनी पहचान व अस्मिता को ही हासिल नहीं करे, बल्कि यहां के लोगों की भावना के अनुरूप राज्य को सींचे. जस्टिस शाहदेव का नेतृत्व कौशल सृजनात्मक और रचनात्मक से भरा और अद्वितीय रहा है. आज उनकी पुण्यतिथि पर नमन. [wpse_comments_template]
alt="" width="600" height="400" /> समाज के बुद्धिजीवियों की गोलबंदी नहीं हो पा रही थी. जस्टिस एलपीएन शाहदेव ने आंदोलन का न सिर्फ ऊर्जावान नेतृत्व दिया, बल्कि बुद्धिजीवियों को लगातार जागरूक भी करते रहे. वे झारखंड आंदोलन में बिखरी ताकतों को एक मंच पर लाने के लिए पूरा जोर लगाते रहे. इसी का परिणाम है कि सर्वदलीय राज्य निर्माण समिति का गठन हुआ. 21 दिसंबर 1998 को झारखंड आंदोलन अपने अंतिम चरण पर था. एक सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सड़क पर एक जुलूस का नेतृत्व कर रहा था. जस्टिस शाहदेव की गिरफ्तारी भी हुई. इस घटना ने आंदोलन को बड़ी ताकत दी. आदिवासी- मूलवासी, बौद्धिक तबका इस आंदोलन में सहभागी बनने के लिए आगे आया. झारखंड राज्य के अलग निर्माण में जस्टिस शाहदेव ने कई बार आंदोलन को कानूनी उलझन से निकालने का भी काम किया. केंद्र सरकार ने झारखंड मामले के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनायी थी, वीएस लाल तब गृह सचिव थे. आंदोलनकारी संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी अड़चन को लेकर जस्टिस शाहदेव से लगातार संवाद करते रहते थे. वे हर मोर्चे पर एक सिपाही की तरह डटे रहे. झारखंड आंदोलन के क्रम में आत्मविश्वास जब भी डगमगाता, तब जस्टिस शाहदेव आंदोलनकारियों के लिए अभिभावक की तरह खड़े रहे. जस्टिस शाहदेव इस बात के हिमायती थे कि झारखंड सिर्फ अपनी पहचान व अस्मिता को ही हासिल नहीं करे, बल्कि यहां के लोगों की भावना के अनुरूप राज्य को सींचे. जस्टिस शाहदेव का नेतृत्व कौशल सृजनात्मक और रचनात्मक से भरा और अद्वितीय रहा है. आज उनकी पुण्यतिथि पर नमन. [wpse_comments_template]
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