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सामाजिक जीवन सत्य और न्याय पर आधारित होना चाहिए : बाबा कीना राम

Ranchi: भारतीय संत परंपरा में अनेक संत अवतरित होते रहे हैं और समाज को दिशा प्रदान करते रहें है. इन्हीं में एक है अघोर परंपरा. इसका विशिष्ट स्थान है. कहा जाता है कि औघड़ अघोरेश्वर बांस के वंशजों की तरह एक दो की संख्या में इस पृथ्वी पर समय-समय पर अवतरित होते रहते हैं और मानवता का उद्धार करते रहते हैं. औघड़ों के फक्कड़ स्वभाव के कारण इनकी बहुत सारी कहानियां केवल जनश्रुतियों में ही सीमित रह गई हैं. इसे लिपिबद्ध नहीं किया जा सका है. इसी परंपरा में आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय, अभिनवगुप्त और अघोर भैरवाचार्य हुए. अघोर भैरवाचार्य से आगे इसे अघोराचार्य महाराजश कीना राम ले कर गये. इसी परंपरा में पूज्य राजेश्वर राम जी व पूज्य अघोरेश्वर बाबा भगवान राम जी का अवतरण इस पृथ्वी पर हुआ. बाबा कीना राम का जन्म पूराने बनारस जनपद के चंदौली तहसील के रामगढ़ गांव में संवत 1658 अर्थात 1601 ई0 के भाद्रमास के कृष्णपक्ष के अघोर चतुर्दशी को प्रातः काल में हुआ था. उनके पिता अकबर सिंह व माता मनसा देवी को बहुत दिनों के बाद लगभग 60 वर्ष की अवस्था में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. पुत्र के जन्म के पूर्व माता मनसा देवी को स्वपन मे साक्षात सदाशिव के दर्शण हुए थे. बालक के जन्म के पूर्व से ही चतुर्मासा का बहाना बना कर उस ग्राम में तीन महात्मा ठहरे हुए थे. जन्म के दो मुहुर्त बाद ही तीनो महात्मा अकबर सिंह के द्वार पर उपस्थित हुए और बालक का गोद में लेकर आशीर्वाद दिये. कहा जाता है कि वे तीनो महात्मा कोई और नहीं स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश थे. कहा जाता है कि उन महात्माओं से आशीर्वाद पाने के बाद ही बालक ने मां का दूध पीना आरम्भ किया. ज्योतिषियों ने बालक को सदाशिव का अवतार बताया था. जन्म से छग दिनों तक अनवरत हर्ष का माहौल रहा. घंटी घंट और शंख से पूरा रामगढ़ गांव हर्षित हो रहा था. सभी जाति के लोग दूर दराज से मिलने आ रहे थे, ताकि उस अलौकिक बालक के एक दर्शण पा सकें. जन्म के छठे दिन अर्थात भ्रद्रपद शुक्लपक्ष षष्ठी तिथि को छठ्ठी समारोह मनाया जा रहा था. कहा जाता है कि उस दिन माता मनसा देवी के वस्त्रों से एक अलौकिक सुगंध निकल रही थी. किसी के छूने पर उसके वस्त्र से भी वैसी ही सुगंध फैल रही थी. पूरा रामगढ़ गांव अलौकिक सुगंध से महक रहा था. माता पिता ने बालक का नाम शिवा रखा. बाद में पुरोहितों ने अकबर सिंह को परामर्श दिया कि बहुत दिनों के बाद आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है. अतः उसके दीर्घजीवी होने के नीमित्त उन्हें किसी को बेच कर फिर `कीन` लें. पुरोहितों के इसी परामर्श के कारण बालक का नामकरण कीना राम हुआ. इन्हीं को वैष्णव लोग शिवाराम के नाम से जानते हैं. माता पिता ने अपने अधिक उम्र होने के कारण 12वर्ष की उम्र में ही कीना राम का विवाह कर दिया. उनकी पत्नि का नाम कात्यायनी था. लेकिन कीनाराम का जन्म पीड़ित मानवता की रक्षा के लिए हुआ था. हुआ भी वही, गौना के पूर्व ही काल्यायनी देवी का शिवलोक गमन हो गया. कुछ दिनों बाद ही माता और फिर पिता का भी देहावसान हो गया. जन्म सिद्ध एकांकी कीनाराम तीर्थों के भ्रमण पर निकल गए. तीर्थाटन में बाबा कीना राम जहां भी ठहरते, उन जगहों पर उनके आसन की पूजा हाने लगती . वैष्णव-आंदोलन से उदासीन बहुत से वैष्णव शिष्य ही उन जगहों पर पूजा अर्चना करते रहे. वह स्थान वैष्णव मठ के रूप में आज भी आमजनों के आस्था के केन्द्र बने हुए हैं. जिनमें महुअर, परानापुर, नईडीह और मारूफपुर के वैष्णव- मठ प्रमुख हैं. वहीं क्री-कुंड, रामगढ़, देवल व हरिहरपूर के औघड़-मठ प्रमुख हैं. बाबा कीना राम का जन्म मुस्लिम शासकों के काल में हुआ था. उस समय मुस्लिम शासकों के अत्याचार एवं कट्टरता से हिन्दुधर्मावलंबी बहुत त्रस्त थे. तब वैष्णव आंदोलन जोरों पर था. शिष्य समुदाय में जो शिष्य राजसी ढगं से रहना चाहते थे उन्हें बाबा कीना राम ने वैष्णव बनने की प्रेरणा दी. जो शिष्य सच्चे सात्विक ढंग से रहना चाहते थे व सत्य की अनुभूति करना चाहते थे और जिसका किसी धर्म जाति या मजहब के प्रति कोई दुराव नहीं था, उनको बाबा ने अघोर पंथ की दीक्षा दी थी. उत्तर भारत के अनेक नगरों में दोनों वर्गों के शिष्य समुदाय कुटिया - मठ में विद्यमान हैं. जहां वैष्णवाचार व अघोराचार दोनों ही शिष्य परंपरा के लोग विचरते रहते हैं. बाबा कीनाराम के जन्म के पूर्व व बाद के कालों के ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखने से ज्ञात होता है कि भारतीय जन समान्य विशेष कर हिन्दुधर्मावलंबी हर प्रकार से त्रस्त थे. मुस्लिम शासकों का अत्याचार चरम पर था. समाज में शिक्षा का लोप होता जा रहा था. ब्राह्मणों के कर्मकांडों से और अधिक पीड़ा सहने का लोग विवश थे. कर वसूली को लेकर जुल्म हो रही थी. हिन्दुधर्मावलंबी हर प्रकार से सताए जा रहे थे.  कोई सुधि लने वाला नहीं था. काशी की धार्मिक स्थिति संकटकाल से गुजर रही थी. बनारस का वैदिकधर्म रूड़िग्रस्त हो चुका था. धार्मिक रूड़िवादिता ने आम जनों के विचार शक्ति को कुचल दिया था. सर्वसाधारण के मन में एक विचित्र सूनापन व्याप्त हो चुका था. वे अनैक्षिक रूप से उन कर्मकांडों को मानने के लिए विवश थे. इस्लामिक कट्टरपंथ से प्रेरित अत्याचार तत्कालीन शासकों के द्वारा प्रायोजित होने से अत्याधिक क्रूर रूप ले चुका था. इसके कारण लोग घर-बेघर हो रहे थे. सुरक्षित ठिकानों की खोज में लोग दर-दर भटकने को विवश थे. प्राण व प्रतिष्ठा हर समय दांव पर लगी रहती थी. समाज उच्च एवं नीच वर्ग में विभाजित था. छोटी जाति के लोग उपेक्षा एवं संरक्षण नहीं मिलने के कारण धर्मपरिवर्तन कर रहे थे. ऐसे में बाबा कीना राम का प्रादुर्भाव ईशवरीय कृपा के रूप में परिलक्षित हुआ. बाबा कीनाराम ने जातिवाद का पूरजोर विरोध किया. अपने योगबल का प्रयोग कर अनेक उदाहरण समाज के समक्ष रखे. जिससे समाज में समरसता व्याप्त हो सके. उनके व्यक्तित्व से प्रेरित हो कर मुगल शासक मुहम्मद शाह ने जजिया कर समाप्त कर थी. महान संत औघड़ बाबा कीना राम के अनुसार सामाजिक जीवन सत्य और न्याय पर आधारित होना चाहिए. अपने इस जीवन-दर्शन को मूर्तरूप देने और समाज में व्याप्त अन्याय, अत्याचार व अनैतिकता को दूर करने के लिए उन्होंने समय-समय पर समाज के अधिकारियों एवं सत्ताधारियों के विरूद्ध संघर्ष किया. अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग कर उन्होंने अन्याय का निराकरण किया व रोगी, दुखी, धनहीन एवं समाज के उपेक्षित - बहिस्कृत लोगों की सेवा करते रहे. महाराज बाबा कीनाराम ने जीवन पर्यन्त जाति प्रथा में अनास्था दिखया. अपने शिष्य समुदाय को भी वैसी ही प्रेरणा दी. बाबा कीनाराम को औघड़ों में नैसर्गिक कहते हैं. उनकी दृष्टि सम रहती थी. वे समवर्ति व्यवहार के प्रेरक थे. उनका जीवन साधारण एवं सर्वदा जनों के दुःखों के निवारणार्थ के निमित्त होता था. उनके शिष्य समुदाय मे हर वर्ग के लोग देखे जाते थे. बाबा कीना राम के शिष्य परंपरा में उनके मुख्य स्थल, क्रीं-कुंड, जो बनारस में स्थित है, में अभी तक 11 महंत हुए. जिनमें समाज के तथाकथित नीची जाति के व्यक्ति भी महंत हुए. बाद में बाबा कीना राम भ्रमण करते हुए वर्त्तमान बलिया जिला (उ०प्र०) के कारो ग्राम मे स्थित कामेश्वर धाम में विराजे रामानुजी परंपरा के संत शिवाराम से दीक्षा ग्रहण किया. बाद में गिरनार चले गए. बाबा कीना राम 170वर्ष तक लोगों के पथ प्रर्दशक बने रहे. बाद मे बनारस में ही निर्वाण को प्राप्त हुए. उनके विचारों को कीनारामी परंपरा के इस सदी के प्रख्यात औघड़ संत परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम व उनके द्वारा स्थापित संस्था श्री सर्वेश्वरी समूह, जो पड़ाव, वाराणसी (उoप्रo) में स्थित है, लेकर चल रही है. वर्तमान में अघोरेश्वर बाबा भगवान राम जी के अनन्य शिष्य औघड़ बाबा गुरूपद सम्भव राम जी, निवर्त्तमान अध्यक्ष श्री सर्वेश्वरी समूह के कुशल नेतृत्व में उनके विचारो को आगे बढ़ाने का कार्य हो रहा है. अघोराचार्य बाबा कीना राम के कई तपोस्थली, जो उपेक्षित पड़े थे, उनका जीर्णोद्धार का कार्य बाबा गुरूपद सम्भव राम द्वारा कराया गया है. अभय सहाय "साम्ययोगि” [wpse_comments_template]  

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