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दिव्यांगता को पीछे छोड़ ‘सोना’ ने पेंटिंग में बनाया कॅरियर, अब देश-विदेश के बच्चों को सीखा रहीं पेंटिंग

 
Tarun Choubey Ranchi : जिंदगी हर कदम एक नई जंग है... और इस जंग को लड़कर रांची की बेटी सोना सिन्हा ने एक मुकाम हासिल किया है. बचपन से पोलियोग्रस्त और चल-फिर पाने में असमर्थ सोना सिन्हा ने जिंदगी की तमाम परेशानियों को एक ओर रखकर खूब मेहनत की और अपने कॅरियर पर फोकस किया. सोना ने पेंटिंग को अपना कॅरियर चुना. आज अपनी लगन और मेहनत के दम पर सोना अपना और अपने परिवार का नाम देश ही नहीं विदेश में रोशन कर रही हैं. देश-विदेश के बच्चे उनसे पेंटिंग सीख रहे हैं.

2 साल की उम्र में पोलियो की शिकार हुईं

सोना सिन्हा जब दो साल की थीं, तब उनके माता-पिता को पता चला कि वह पोलियोग्रस्त है. सोना की मां मंजू सिन्हा और पिता एनके सिन्हा ने हर मां-बाप की तरह सोना का काफी इलाज कराया. खूब कोशिश की, ताकि सोना अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. तब सोना का परिवार बिहार के छोटे से गांव चंदन मट्टी में रहा करता था. अच्छे इलाज की आस में सोना का परिवार उसे लेकर रांची आ गए. और रांची के देबुका नर्सिंग होम में उसका इलाज कराया. लेकिन रांची में उस समय सोना की बीमारी का इलाज नहीं हो सका. सोना को पोलियो के कारण बचपन से ही काफी तकलीफें उठानी पड़ीं. [caption id="attachment_514584" align="alignnone" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/12/sona.jpg"

alt="सोना स‍िन्‍हा" width="600" height="1000" /> सोना स‍िन्‍हा[/caption]

स्‍कूल में नहीं मिल पाया दाख‍िला

ना बताती हैं कि जब उनकी उम्र स्कूल जाने की हुई, तो उसे किसी भी स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाया. कारण पूछने पर स्कूल वाले कहा करते थे कि हम ऐसे बच्चों को अपने स्कूल में दाखिला नहीं देते हैं. सोना बताती हैं- तब उसे समझ नहीं आता था कि कोई भी स्कूल उसका नामांकन क्यों नहीं कर रहा है. रिश्तेदार माता-पिता से पूछा करते थे कि सोना अभी क्या कर रही हो, पर उनके पास किसी भी सवाल का जवाब नहीं होता था. लेकिन सोना ने हार नहीं मानी और अपना रास्ता खुद बनाया. बचपन से ही पेंटिग का शौक था, उसने अपने शौक को ही अपना कॅरियर बनाने का फैसला किया. घर के कुछ दूर विष्णु सर नाम के पेंटिग के शिक्षक रहा करते थे. सोना की बहन और मां के निवेदन पर विष्णु सर सोना को घर आकर पेंटिग सीखाने को तैयार हो गए. तब से सोना ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और पेंटिग को ही अपने जीवन साथी बना लिया. अपने गुरु की मदद से सोना ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से ऑनलाइन बैचलर इन फाइन आर्ट्स में दाखिला लिया और अपनी आगे की पढाई की. सोना से आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में जैसे- दुबई, फ्रांस,जर्मनी के बच्चे भी पेंटिग सीख रहे हैं. तमाम चुनौतियों से सोना लड़ती रहीं और खुद को इस काबिल बनाया कि आज दुनिया उसकी तारीफ कर रही है. सोना अब एक मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं.

छलका दर्द, दिव्यांगता की वजह से नहीं देता कोई काम

इतना सब हासिल करने के बाद भी सोना को रांची में कही काम नहीं मिल पा रहा है. वह कहती हैं कि मैं ज्यादा से ज्यादा बच्चों को पेंटिग सिखाना चाहती हूं, इसके लिए जब यहां के स्कूलों में जाती हूं, तो वह मेरी दिव्यांगता को देखकर मना कर देते हैं. स्कूलों का कहना होता है कि आप बच्चों को मैनेज नहीं कर पाएंगी. सोना भविष्य में खुद की एक पेंटिग स्कूल खोलना चाहती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को पेंटिग सीखा सकें. [wpse_comments_template]
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