alt="" width="600" height="400" /> प्रोफेसर संजय सिंह[/caption] आजादी के बाद 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन होने के बाद से ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण होना शुरू हुआ. पहली बार 1968 में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव किया गया. इसके बाद अगस्त 1985 में शिक्षा की चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति 1986 लागू किया गया. जिसका प्रारूप 10+2+3 शिक्षा संरचना को अपनाया गया. पुनः 1992 में उक्त नीति में संशोधन किया गया. पुनः वर्ष 2020 में भारत सरकार ने देश में नई शिक्षा नीति की घोषणा की. इस नई नीति में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर फोकस किया गया है, जो लाभदायक है. सबसे पहले शिक्षा में 10+2+3 के स्थान पर 5+3+3+4 शिक्षा संरचना को शामिल करने से पहले 5 वर्ष पढ़ाई के लिए फाउंडेशन स्टेज होगी. प्री-प्राइमरी का 2 साल और अगले तीन साल तीसरी कक्षा से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई के लिए होगी. पुनः अगले 3 साल के लिए मीडिल कक्षा 6 से लेकर 8 तक के पढ़ने वाले बच्चे और उसके बाद कक्षा 9 से लेकर 11 वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए किसी विशेष विषय के प्रति गहरी समझ और उनके सोचने की शक्ति के साथ सुखद उज्ज्वल भविष्य के लिए जीवन लक्ष्य तय करने के लिए प्रेरित किया जाएगा. इस नई शिक्षा नीति में बच्चे मातृभाषा यानि स्थानीय भाषा और राष्ट्र भाषा के साथ कोई अन्य भाषा को चयन कर सकते हैं. वहीं अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता खत्म करने पर जोर दिया गया है. बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा सीखने के साथ छठी कक्षा से ही इंटर्नशिप का भी मौका मिलेगा. कक्षा 9 से 12 तक की परीक्षा सेमेस्टर के आधार पर होगी. कुल प्राप्तांक को जोड़कर फाइनल परिणाम घोषित किया जाएगा. महाविद्यालय में नामांकन कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट के आधार पर होगी. इस प्रदर्शन के साथ 12वीं का मार्क्स जोड़ दिया जाएगा. तब आप मनपसंद कॉलेज में दाखिला ले सकते हैं. नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए जीडीपी का अब 6% हिस्सा खर्च किया जाएगा. जो पूर्व में 4.43% था. पढ़ाई को आसान बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाएगा. अब उच्च शिक्षा से एमफिल की डिग्री को खत्म कर दिया जाएगा. एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा. छात्रों को 3 भाषा सिखाया जाएगा, जो राज्य सरकार तय करेगी. पढ़ाई के साथ-साथ उसके कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. जब कोई नई नीति लागू होती है तो प्रारंभ में कुछ आलोचना होना स्वाभाविक है. कुछ लोगों का मानना है कि यह नीति कारगर साबित नहीं होगी. इसकी पूर्ण होने की संभावना कम है. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को बोर्ड ऑफ गवर्नर के जिम्मे करना अनुचित है. वैसे सच कहा जाय तो नई नीति से शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लिए लाभदायक है. अर्थात लाभ ही लाभ है. हानि नहीं के बराबर है. नई शिक्षा नीति लागू होने पर कुछ लोगों को जो नुकसान होता नजर आ रहा है, वह केवल मन का भ्रम है. जैसे-पुरानी शिक्षा नीति के तहत पढ़े विद्यार्थियों को भविष्य में नुकसानदेह है. सरकारी नौकरी मिलने की संभावना कम है. विद्यार्थियों के लिए वर्ष में दो बार परीक्षा होने पर परीक्षार्थियों के लिए सिरदर्द बनेगा और शिक्षा सत्र में सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई होगी. शिक्षक बनने में भी कठिनाई होगी. लेकिन हमारा मानना है कि नई शिक्षा नीति को लागू करने में प्रारंभ में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन किसी भी मामले में यह नीति नुकसानदेह नहीं है. क्योंकि समय के रफ्तार के साथ सब कुछ बदलता रहता है. जीवन में परिवर्तन शाश्वत है. [wpse_comments_template]
पढ़ाई के साथ कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा : संजय सिंह
Ramgarh: नई शिक्षा नीति इन दिनों चर्चा में है. इस पर शिक्षाविद अपने विचार रख रहे हैं. इस पर प्रोफेसर संजय सिंह ने अपने विचार रखे. वे कहते हैं कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है. भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में स्पष्ट कहा गया है कि 6 से 14 वर्षों के बच्चों के लिए अनिवार्य रूप से मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था की जाए. [caption id="attachment_352347" align="aligncenter" width="600"]
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alt="" width="600" height="400" /> प्रोफेसर संजय सिंह[/caption] आजादी के बाद 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन होने के बाद से ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण होना शुरू हुआ. पहली बार 1968 में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव किया गया. इसके बाद अगस्त 1985 में शिक्षा की चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति 1986 लागू किया गया. जिसका प्रारूप 10+2+3 शिक्षा संरचना को अपनाया गया. पुनः 1992 में उक्त नीति में संशोधन किया गया. पुनः वर्ष 2020 में भारत सरकार ने देश में नई शिक्षा नीति की घोषणा की. इस नई नीति में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर फोकस किया गया है, जो लाभदायक है. सबसे पहले शिक्षा में 10+2+3 के स्थान पर 5+3+3+4 शिक्षा संरचना को शामिल करने से पहले 5 वर्ष पढ़ाई के लिए फाउंडेशन स्टेज होगी. प्री-प्राइमरी का 2 साल और अगले तीन साल तीसरी कक्षा से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई के लिए होगी. पुनः अगले 3 साल के लिए मीडिल कक्षा 6 से लेकर 8 तक के पढ़ने वाले बच्चे और उसके बाद कक्षा 9 से लेकर 11 वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए किसी विशेष विषय के प्रति गहरी समझ और उनके सोचने की शक्ति के साथ सुखद उज्ज्वल भविष्य के लिए जीवन लक्ष्य तय करने के लिए प्रेरित किया जाएगा. इस नई शिक्षा नीति में बच्चे मातृभाषा यानि स्थानीय भाषा और राष्ट्र भाषा के साथ कोई अन्य भाषा को चयन कर सकते हैं. वहीं अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता खत्म करने पर जोर दिया गया है. बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा सीखने के साथ छठी कक्षा से ही इंटर्नशिप का भी मौका मिलेगा. कक्षा 9 से 12 तक की परीक्षा सेमेस्टर के आधार पर होगी. कुल प्राप्तांक को जोड़कर फाइनल परिणाम घोषित किया जाएगा. महाविद्यालय में नामांकन कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट के आधार पर होगी. इस प्रदर्शन के साथ 12वीं का मार्क्स जोड़ दिया जाएगा. तब आप मनपसंद कॉलेज में दाखिला ले सकते हैं. नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए जीडीपी का अब 6% हिस्सा खर्च किया जाएगा. जो पूर्व में 4.43% था. पढ़ाई को आसान बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाएगा. अब उच्च शिक्षा से एमफिल की डिग्री को खत्म कर दिया जाएगा. एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा. छात्रों को 3 भाषा सिखाया जाएगा, जो राज्य सरकार तय करेगी. पढ़ाई के साथ-साथ उसके कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. जब कोई नई नीति लागू होती है तो प्रारंभ में कुछ आलोचना होना स्वाभाविक है. कुछ लोगों का मानना है कि यह नीति कारगर साबित नहीं होगी. इसकी पूर्ण होने की संभावना कम है. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को बोर्ड ऑफ गवर्नर के जिम्मे करना अनुचित है. वैसे सच कहा जाय तो नई नीति से शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लिए लाभदायक है. अर्थात लाभ ही लाभ है. हानि नहीं के बराबर है. नई शिक्षा नीति लागू होने पर कुछ लोगों को जो नुकसान होता नजर आ रहा है, वह केवल मन का भ्रम है. जैसे-पुरानी शिक्षा नीति के तहत पढ़े विद्यार्थियों को भविष्य में नुकसानदेह है. सरकारी नौकरी मिलने की संभावना कम है. विद्यार्थियों के लिए वर्ष में दो बार परीक्षा होने पर परीक्षार्थियों के लिए सिरदर्द बनेगा और शिक्षा सत्र में सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई होगी. शिक्षक बनने में भी कठिनाई होगी. लेकिन हमारा मानना है कि नई शिक्षा नीति को लागू करने में प्रारंभ में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन किसी भी मामले में यह नीति नुकसानदेह नहीं है. क्योंकि समय के रफ्तार के साथ सब कुछ बदलता रहता है. जीवन में परिवर्तन शाश्वत है. [wpse_comments_template]
alt="" width="600" height="400" /> प्रोफेसर संजय सिंह[/caption] आजादी के बाद 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन होने के बाद से ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण होना शुरू हुआ. पहली बार 1968 में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव किया गया. इसके बाद अगस्त 1985 में शिक्षा की चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति 1986 लागू किया गया. जिसका प्रारूप 10+2+3 शिक्षा संरचना को अपनाया गया. पुनः 1992 में उक्त नीति में संशोधन किया गया. पुनः वर्ष 2020 में भारत सरकार ने देश में नई शिक्षा नीति की घोषणा की. इस नई नीति में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर फोकस किया गया है, जो लाभदायक है. सबसे पहले शिक्षा में 10+2+3 के स्थान पर 5+3+3+4 शिक्षा संरचना को शामिल करने से पहले 5 वर्ष पढ़ाई के लिए फाउंडेशन स्टेज होगी. प्री-प्राइमरी का 2 साल और अगले तीन साल तीसरी कक्षा से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई के लिए होगी. पुनः अगले 3 साल के लिए मीडिल कक्षा 6 से लेकर 8 तक के पढ़ने वाले बच्चे और उसके बाद कक्षा 9 से लेकर 11 वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए किसी विशेष विषय के प्रति गहरी समझ और उनके सोचने की शक्ति के साथ सुखद उज्ज्वल भविष्य के लिए जीवन लक्ष्य तय करने के लिए प्रेरित किया जाएगा. इस नई शिक्षा नीति में बच्चे मातृभाषा यानि स्थानीय भाषा और राष्ट्र भाषा के साथ कोई अन्य भाषा को चयन कर सकते हैं. वहीं अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता खत्म करने पर जोर दिया गया है. बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा सीखने के साथ छठी कक्षा से ही इंटर्नशिप का भी मौका मिलेगा. कक्षा 9 से 12 तक की परीक्षा सेमेस्टर के आधार पर होगी. कुल प्राप्तांक को जोड़कर फाइनल परिणाम घोषित किया जाएगा. महाविद्यालय में नामांकन कॉमन एप्टीट्यूड टेस्ट के आधार पर होगी. इस प्रदर्शन के साथ 12वीं का मार्क्स जोड़ दिया जाएगा. तब आप मनपसंद कॉलेज में दाखिला ले सकते हैं. नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए जीडीपी का अब 6% हिस्सा खर्च किया जाएगा. जो पूर्व में 4.43% था. पढ़ाई को आसान बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाएगा. अब उच्च शिक्षा से एमफिल की डिग्री को खत्म कर दिया जाएगा. एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा. छात्रों को 3 भाषा सिखाया जाएगा, जो राज्य सरकार तय करेगी. पढ़ाई के साथ-साथ उसके कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. जब कोई नई नीति लागू होती है तो प्रारंभ में कुछ आलोचना होना स्वाभाविक है. कुछ लोगों का मानना है कि यह नीति कारगर साबित नहीं होगी. इसकी पूर्ण होने की संभावना कम है. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को बोर्ड ऑफ गवर्नर के जिम्मे करना अनुचित है. वैसे सच कहा जाय तो नई नीति से शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लिए लाभदायक है. अर्थात लाभ ही लाभ है. हानि नहीं के बराबर है. नई शिक्षा नीति लागू होने पर कुछ लोगों को जो नुकसान होता नजर आ रहा है, वह केवल मन का भ्रम है. जैसे-पुरानी शिक्षा नीति के तहत पढ़े विद्यार्थियों को भविष्य में नुकसानदेह है. सरकारी नौकरी मिलने की संभावना कम है. विद्यार्थियों के लिए वर्ष में दो बार परीक्षा होने पर परीक्षार्थियों के लिए सिरदर्द बनेगा और शिक्षा सत्र में सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई होगी. शिक्षक बनने में भी कठिनाई होगी. लेकिन हमारा मानना है कि नई शिक्षा नीति को लागू करने में प्रारंभ में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन किसी भी मामले में यह नीति नुकसानदेह नहीं है. क्योंकि समय के रफ्तार के साथ सब कुछ बदलता रहता है. जीवन में परिवर्तन शाश्वत है. [wpse_comments_template]

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