Ranchi : खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड सरकार और केंद्र के बीच टकराव बढ़ता दिख रहा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 13 अगस्त को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर विधेयक के कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई है.
मुख्यमंत्री ने कहा है कि प्रस्तावित संशोधन से झारखंड के संवैधानिक, आर्थिक और विकास से जुड़े अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. उन्होंने विधेयक की धारा 2, 3, 4 और 5 पर दोबारा विचार करने की मांग की है. साथ ही केंद्र सरकार से संघीय व्यवस्था यानी केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के संतुलन को बनाए रखने की अपील की है.
नयी धारा 9D पर सबसे बड़ी आपत्ति
हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में कहा है कि राज्य सरकार को 10 अगस्त को लोकसभा में पेश किए गए विधेयक की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली. राज्य की सबसे बड़ी आपत्ति प्रस्तावित नयी धारा 9D को लेकर है.
इस धारा के जरिए राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों और खनिज वाली जमीन पर टैक्स, उपकर या दूसरी तरह की लेवी लगाने की शक्ति को सीमित करने का प्रस्ताव है. इसके तहत राज्य सरकारें केवल केंद्र की ओर से तय शर्तों और सीमाओं के तहत ही ऐसा कर सकेंगी.प्रस्तावित प्रावधान में पहले से बकाया या वसूले नहीं गए ऐसे करों को भी अमान्य करने की बात कही गयी है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के 25 जुलाई 2024 के फैसले का भी हवाला दिया है. Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Limited मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने राज्यों के खनिज और खदान वाली जमीन पर टैक्स लगाने के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था.
फैसले में कहा गया था कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के तहत राज्य विधानसभाओं को जमीन और खदान वाली जमीन पर टैक्स लगाने का अधिकार है.
राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित धारा 9D के जरिए इस अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता. झारखंड का तर्क है कि खनिज वाली जमीन पर टैक्स लगाने के राज्य के अधिकार को सीमित करने के लिए केवल खान और खनिज कानून में बदलाव पर्याप्त नहीं होगा.
राज्य ने मांग की है कि प्रस्तावित धारा 9D में लगाए जा रहे प्रतिबंध को सिर्फ खनिज अधिकारों तक सीमित रखा जाए. खनिज वाली जमीन को इसके दायरे से बाहर किया जाए.
झारखंड की कमाई पर पड़ेगा बड़ा असर
मुख्यमंत्री ने पत्र में विधेयक के संभावित वित्तीय असर को लेकर भी चिंता जताई है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, 2024-25 में झारखंड के अपने गैर-कर राजस्व में खनन से होने वाली आय की हिस्सेदारी करीब 84.9 प्रतिशत थी.
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड खनिज युक्त भूमि उपकर अधिनियम, 2024 लागू किया था. इससे राज्य को हर साल करीब 11,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने की उम्मीद है.
सरकार के अनुसार इस पैसे का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण सड़क और दूसरे बुनियादी ढांचे, पेयजल और कृषि जैसे कामों में किया जाना है.
मंईयां सम्मान योजना पर भी असर की आशंका
मुख्यमंत्री ने कहा है कि खनिज युक्त जमीन से मिलने वाला राजस्व राज्य की कई कल्याणकारी योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है. इसी में मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना भी शामिल है.
सरकार का कहना है कि यह योजना ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को आर्थिक मदद देने की दिशा में महत्वपूर्ण है. अगर राज्य की खनन आय में बड़ी कमी आती है तो ऐसी योजनाओं के लिए वित्तीय दबाव बढ़ सकता है.
खनन से होने वाले नुकसान का भी जिक्र
हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा को केवल कमाई के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. राज्य में बड़े पैमाने पर खनन के कारण लोगों को विस्थापन, जमीन से अलग होने, प्रदूषण और पर्यावरण को नुकसान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
उन्होंने कहा कि खनन प्रभावित इलाकों के लोगों को पहले से ही इसकी सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत चुकानी पड़ रही है. ऐसे में अगर राज्य को बिना किसी वैकल्पिक आय के इस राजस्व से वंचित किया गया तो इसका असर सीधे इन क्षेत्रों के विकास पर पड़ेगा.
कानून-व्यवस्था को लेकर चेतावनी
मुख्यमंत्री ने पत्र में चेतावनी दी है कि राज्य की आय में अचानक कमी आने से खनन प्रभावित इलाकों में चल रही योजनाओं पर असर पड़ सकता है. इससे लोगों में असंतोष और सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका है. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति आगे चलकर कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा कर सकती है.
स्थानीय लोगों को मिले खनिज संपदा का लाभ
झारखंड सरकार ने पत्र में खनिज संपदा से होने वाली कमाई में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी की बात भी उठाई है. मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में ज्यादातर खनन काम सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के जरिए होता है और इन कंपनियों को खनिजों से बड़ी आर्थिक आय होती है.
राज्य का कहना है कि इस आर्थिक लाभ का एक उचित हिस्सा उन इलाकों और वहां रहने वाले लोगों के विकास पर खर्च होना चाहिए, जहां से खनिज निकाले जाते हैं. इससे स्थानीय लोगों को खनिज संपदा का सामाजिक लाभ मिल सकेगा.
केंद्र से संशोधन पर दोबारा विचार की अपील
हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड देश के विकास में पूरी तरह सहयोग करता है. लेकिन खनिज संपदा वाले राज्यों की समस्याओं और उनके अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से विधेयक की संबंधित धाराओं पर तत्काल दोबारा विचार करने की मांग की है. उनका कहना है कि संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का संतुलन बना रहना जरूरी है.
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