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शीशे की अदालत में पत्थर की गवाही

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बैजनाथ मिश्र

अमेरिका ने बेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया है. उसने यह धतकर्म तब किया जब दुनिया नये साल के जश्न के खुमार में डूबी हुई थी. यानी दो जनवरी की रात को. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस अपहरण को गिरफ्तारी बता रहे हैं. लेकिन वह यह नहीं बता पा रहे हैं, ना बता पायेंगे कि यह अधिकार उन्हें मिला कैसे है? उनका कहना है कि मादुरो ने बेनेजुएला में संपन्न हुए चुनाव को हाईजैक कर लिया था और राष्ट्रपति पद पर कब्जा कर लिया था. अगर उनकी यह दलील मान भी ली जाये तब भी क्या वह दुनिया के बादशाह हैं या अंतरराष्ट्रीय डॉन जो किसी भी देश के आंतरिक मामले में सैन्य घुसपैठ के लिए स्वतंत्र हैं? क्या यह कृत्य किसी सार्वभौम देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं है? 

 

यदि ट्रंप किसी देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर इस हद तक चिंतित हैं तो फिर पाकिस्तान को प्रश्रय क्यों दे रहे हैं जहां लोकतंत्र है ही नहीं? अमेरिका ने सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी क्यों दे रखी है जहां कभी चुनाव होते ही नहीं हैं? इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को भी अमेरिका ने जैविक हथियार बनाने और लोकतंत्र विरोधी होने के आरोप में गिरफ्तार कर फांसी दी थी. लेकिन आज तक वह न वहां जैविक हथियारों का कोई प्रमाण दे पाया और ना ही वहां लोकतंत्र कायम हो पाया. अमेरिका ने लीबिया के कर्नल गद्दाफी पर भी अनर्गल आरोप लगाकर उन्हें खत्म किया था. लेकिन आज वहां की स्थिति अत्यंत दयनीय है. 

 

इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका दुनिया का सबसे धनवान और बलवान देश है. इसी घमंड में उसके राष्ट्रपति जब तब सनक जाते हैं. लेकिन हकीकत यह भी है कि इस समय अमेरिका पर किसी भी देश से ज्यादा कर्ज है और दुनिया के कई देश, समूह और संगठन डॉलर के बदले व्यापार के लिए दूसरी मुद्राओं के लिए तत्पर हो रहे हैं. अमेरिका भारत से इसलिए नहीं चिढ़ा हुआ है कि हम रूस से तेल खरीद रहे हैं. वह इसलिए चिढ़ा है कि हम व्यापार रुपये और रुबल में कर रहे हैं. बेनेजुएला भी चीन को तेल युआन में बेच रहा था. उधर ब्रिक्स भी नयी विनिमय नीति पर विचार कर रहा है. यदि यह सब चल पड़ा तो अमेरिकी डॉलर की बादशाहत खत्म होने लगेगी. अमेरिका की बेचैनी का कारण यही है. 

 

अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ पेट्रो डॉलर है. इसकी शुरुआत हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ के एक समझौते से किया था. तय यह हुआ था कि अमेरिका उसे सुरक्षा देगा और वह तेल व्यापार डॉलर में करेगा. यहीं से पेट्रो डॉलर का प्रचलन शुरु हुआ और अमेरिका अमीर बनने लगा. सद्दाम हुसैन ने डॉलर के बजाय दूसरी मुद्राओं में व्यापार का फैसला किया तो उसे जहन्नुम पहुंचा दिया गया. गद्दाफी ने भी दिनार गोल्ड में व्यापार की घोषणा की तो लीबिया को ही बर्बाद कर दिया गया. इसी तरह की गुस्ताखी मादुरो कर रहे थे जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है और उन्हें सजा-ए-मौत या आजीवन कारावास की सजा दे दी जाएगी. 

 

बेनेजुएला के पास दुनिया के किसी भी देश से अधिक तेल है. उसके पास रेयर अर्थ जैसी खनिज संपदा भी है. लेकिन उसके पास अभियांत्रिकी और वैज्ञानिक क्षमता नहीं है. अमेरिका इसका फायदा उठाकर उसे अपने हिसाब से चलाना चाहता था. मादुरो इसके लिए तैयार तो नहीं ही थे, उन्होंने तेल के लिए चीन से हाथ मिला लिया और सुरक्षा के लिए रुस से हथियार खरीदने लगे. ट्रंप के लिए यह नाकाबिल-ए-बर्दाश्त था. उन्होंने मादुरो की गिरफ्तारी के लिए पांच करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर दिया था. मादुरो को सबक सिखाने के लिए उन्होंने बेनेजुएला में अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए को सक्रिय कर दिया था. जब उन्हें इत्मीनान हो गया कि बिना किसी भारी खून-खराबे के मादुरो को दबोचा जा सकता है तो उन्होंने डेल्टा फोर्स को ऑपरेशन के लिए भेज दिया. 

 

वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति लैटिन अमेरिकी देशों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करते रहते हैं. अमेरिका ने पहले भी मैक्सिको, क्यूबा, निकारागुआ, होंडुरास और पनामा पर हमले कर चुका है. उसी ने चिली, इक्वाडोर, ग्वाटेमाला, पेरु और ब्राजील में तख्ता पलट भी कराये. वह आदतन, इरादतन खुराफाती है. अब भी वह बेनेजुएला के बाद मैक्सिको, कोलंबिया और क्यूबा पर नजर गड़ाए हुए है. इस बार ट्रंप ने एक नयी चाल चली है. उनकी दलील है कि चूंकि मादुरो एक घोषित नार्को आतंकवादी है, इसलिए अमेरिकी कानून के तहत उसे कठघरे में लाना जरुरी था. यह दलील इस आरोप के जवाब में दी जा रही है कि अमेरिका की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, क्योंकि यह राज्यसत्ता की संप्रभुता पर हमला है. ट्रंप का यह कहना भी तथ्य से परे है कि मादुरो बेनेजुएला के वैध राष्ट्रपति नहीं है. तथ्य यह है कि मादुरो चुनाव जीतते रहे हैं और अब भी अपने देश की निर्वाचन परिषद द्वारा ही चुने गये हैं. ट्रंप मादुरो पर मनगढ़ंत आरोप इसलिए लगा रहे हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक मादुरो को अमेरिकी अदालतों में मिलनेवाली इम्युनिटी न मिल सके. इसे कहते हैं- शीशे की अदालत में पत्थर की गवाही है, कातिल ही मुहाफिज है, कातिल ही सिपाही है. 

 

बहरहाल ट्रंप चाहते हैं कि बेनेजुएला का तेल उद्योग अमेरिका संचालित करे. लेकिन किसी देश पर जबरन कब्जा करने और उसके संसाधनों को वैश्विक बाजार में बेचने की इजाजत न अमेरिकी कानून देता है, ना ही कोई अंतरराष्ट्रीय कानून. कुल मिलाकर अमेरिका बेनेजुएला पर हमला यूएन चार्टर का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है. अब सवाल यह है कि क्या ट्रंप की इस कार्रवाई को समरथ को नहि दोसु गुसांई मान लिया जाय? इसका मतलब तो यही होगा कि अब कोई भी मजबूत राष्ट्र अपने पड़ोस के छोटे देशों पर कोई भी अनर्गल आरोप लगाकर हमला और उस पर कब्जा कर सकेगा. अब यदि चीन ताईवान पर हमला करता है तो ट्रंप किस मुंह से उसका विरोध करेंगे? यदि रूस यूक्रेन युद्ध को विस्तार देते हुए कुछ यूरोपीय देशों पर हमला करने लगे तो अमेरिका क्या करेगा? इससे भी बड़ा सवाल यह कि आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ है किसलिए? अगर वह अमेरिका को जहां-तहां ऊधम मचाने से नहीं रोक सकता, किसी संप्रभु राष्ट्र पर हमले के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता, तो उसकी जरुरत ही क्या है? खत्म कीजिए ऐसी संस्थाओं को जिनके अधिकारी-पदधारी बाहुबलियों की निरंकुशता पर मौन साध लेते हैं. चलने दीजिए जंगल का नियम-कानून. आखिर जब लाठीधारी किसी भी कमजोर की भैंस हांक ही ले जायेंगे, तब इन संस्थाओं पर भारी धन राशि खर्च करने की क्या आवश्यकता है? इस घटना के बाद ऐसा लगता है कि अब संयुक्त राष्ट्र के बरक्स एक नयी संस्था के गठन का समय आ गया है. 

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