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स्त्री को देवी मानना बंद कीजिए !

पत्नी द्वारा पति की या किसी युवती द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिल कर मंगेतर की हत्या या हत्या के प्रयास की हाल में सामने आईं घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं! मगर इन चंद घटनाओं के आधार पर इसे महिलाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति, नारी सुलभ भावनाओं में कमी के रूप में देखना जल्दबाजी का निष्कर्ष है. ऐसा इसलिए कि हमने महिला को ‘देवी’ का दर्जा दे दिया और भूल गये कि वह भी एक सामान्य इंसान है! स्त्री हो या पुरूष दोनों में एक समान भावनाएं, अच्छाई और बुराई हो सकती है. समाज के बदलते हालात के साथ उसमें भी अच्छा या नकारात्मक बदलाव हो सकता है!
 
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                                                 श्रीनिवास


(संदर्भ- प्रेमी/पत्नी पर जानलेवा हमले की हालिया घटनाएं)

 

पत्नी द्वारा पति की या किसी युवती द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिल कर मंगेतर की हत्या या हत्या के प्रयास की हाल में सामने आईं घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं! मगर इन चंद घटनाओं के आधार पर इसे महिलाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति, नारी सुलभ भावनाओं में कमी के रूप में देखना जल्दबाजी का निष्कर्ष है. ऐसा इसलिए कि हमने महिला को ‘देवी’ का दर्जा दे दिया और भूल गये कि वह भी एक सामान्य इंसान है! स्त्री हो या पुरूष दोनों में एक समान भावनाएं, अच्छाई और बुराई हो सकती है. समाज के बदलते हालात के साथ उसमें भी अच्छा या नकारात्मक बदलाव हो सकता है! 


पिछले 1-2 साल में भारत में ऐसे कुछ मामले सामने आये हैं, जहां पत्नियों या युवतियों ने पति/मंगेतर की हत्या की या प्रयास किया. 

 

- बेंगलुरु, 2023 : कम्यूटर इंजीनियर पत्नी ने पति की हत्या कर शव को सूटकेस में भर दिया!

- मेरठ, 2024 : पत्नी ने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या की, शव को सीमेंट में छिपाया. 

- इंदौर, 2024 : शादी से इनकार पर एक युवती ने मंगेतर पर चाकू से हमला किया!

 

और सबसे ताजा पुणे का मामला, जिसमें केतन विशाल अग्रवाल की मौत लोहगढ़ किले की खाई में गिरने से हुई. बाद में उजागर हुआ कि उसकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने प्रेमी चेतन बाबूलाल चौधरी के साथ मिल कर हत्या की योजना बनायी थी और केतन को खाई में धकेल दिया! पुलिस ने सिया गोयल और चेतन बाबूलाल चौधरी को गिरफ्तार कर लिया है.


इस घटना ने देश को एक बार फिर झकझोर दिया. सोशल मीडिया पर महिलाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति' की बहस छिड़ गयी. यह चिंता वाजिब और स्वाभाविक है, पर निष्कर्ष और तर्क सही नहीं लगते! हिंसा कोई भी करे, निंदनीय है. हर जान की कीमत बराबर है, मगर कुछ घटनाओं से पूरी स्त्री-जाति की 'प्रवृत्ति' तय कर देना आंकड़ों और विवेक, दोनों के खिलाफ है. 


इस मसले पर चर्चा और चिंता व्यक्त करते हुए हम स्त्री के खिलाफ होती रही हिंसा- घर के अंदर, अपनों द्वारा ही- को याद नहीं करते. जिस देश में भ्रूण के लिंग का पता लगा कर अजन्मी कन्याओं की हत्या कर दी जाती है. जहां विजातीय और ‘विधर्मी’ युवक से दोस्ती और शादी करने पर लोग अपनी ही बहन और बेटी की हत्या कर देते हैं, वहां कुछ युवतियों की- बेशक निंदनीय- हरकतों के आधार पर पूरे महिला समाज के बारे में नतीजा निकालने की जल्दबाजी के पीछे पुरुषवादी सोच ही/भी काम करता है!


भारत में ‘महिलाओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है’ एक निर्विवाद सत्य है!’ इस उत्पीड़न के कई रूप हो सकते हैं- प्रत्यक्ष हिंसा से लेकर व्यवहार में उसे रोज-रोज अपमानित करने तक! यह समझने की जरूरत है कि यह मौखिक, गैर-मौखिक और मनोवैज्ञानिक रणनीति के रूप में भी आ सकता है जो एक महिला की गरिमा, सुरक्षा और कल्याण को कम करता है. 


एक नजर इन आकड़ों पर... 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच भारत में बलात्कार के कुल 1.89 लाख मामले दर्ज किए गये. रोजाना औसतन बलात्कार के 86 मामले दर्ज किये गये, यानी हर एक घंटे में बलात्कार की 4 घटनाएं!


बड़ी बात यह है कि इनमें से 82 मामलों में बलात्कार करने वाला पीड़िता का कोई परिचित शख्स ही निकला था. महिलाओं के विरुद्ध कुल दर्ज अपराध (2022) : 4,45,256 मामले, जो हर घंटे लगभग 51 एफआईआर के बराबर है! पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (घरेलू हिंसा) के 31.4% मामले.  

 

विवाहित महिलाएं पति/अंतरंग साथी की हिंसा का अनुभव करती हैं, कुल मिला कर 29.95%. शारीरिक हिंसा के 26.47 प्रातिशत. वर्तमान/पूर्व पति द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा के विवाहित महिलाओं में से 32%.  इस तरह हिंसा का बड़ा पैटर्न अब भी पुरुषों से महिलाओं की तरफ है. नई घटनाएं अपवाद हैं, नियम नहीं.


'देवी' का मिथक

भारतीय समाज ने स्त्री को दो अतियों में बांट रखा है - या तो 'देवी' या 'डायन'!  जब हम स्त्री से त्याग, ममता, सहनशीलता ही उम्मीद करते हैं, तो उसकी गलती, गुस्सा, अपराध हमें 'असामान्य' लगता है. इसलिए एक हत्या भी 'स्त्री-प्रकृति के खिलाफ विद्रोह' बन जाती है, जबकि पुरुष की हत्या 'सामान्य अपराध'. 


स्त्री-पुरुष दोनों इंसान हैं. दोनों में प्रेम, ईर्ष्या, लालच, बदले की भावना हो सकती है. अच्छाई-बुराई की मोनोपोली किसी एक जेंडर के पास नहीं. डॉ लोहिया भी कहते थे- "स्त्री को देवी बनाकर हमने उसे इंसान होने के हक से वंचित कर दिया. देवी गलती नहीं करती, इंसान करता है.’ समाज को इस मिथक से मुक्त होना चाहिए, होना होगा!

 

अपराधी स्त्री हो या पुरुष, सजा एक जैसी. 'महिला है तो बेचारी होगी' या 'पुरुष है तो दरिंदा होगा'- दोनों पूर्वाग्रह है, गलत है. स्त्री से 'सीता-सावित्री' वाली कथित पूर्णता मांगना बंद करें. उसे द्रौपदी की तरह गुस्सा करने, गलती करने, और उसकी कीमत चुकाने का हक दें. 
बराबरी का मतलब ये नहीं कि अब स्त्री अपराध नहीं करेगी, बराबरी का मतलब है कि उसके अपराध को भी 'इंसानी अपराध' माना जाये, 'स्त्री-जाति का पतन' नहीं. ऐसे मामलों के पीछे बेमेल विवाह के साथ ही, परिवार द्वारा लड़की की इच्छा जाने बिना या उसकी अनिच्छा के बावजूद अपनी पसंद के लड़के से विवाह करने की जिद भी एक कारण हो सकता है...


अंत में, प्लेन उड़ाने वाली हिम्मत भी इंसानी है और हत्या करने वाली नीचता भी इंसानी! स्त्री को देवी के सिंहासन से उतार कर इंसान की जमीन पर लाएंगे, तभी सही-गलत का निरपेक्ष मूल्यांकन हो सकेगा!

 

डिस्क्लेमर - लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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