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सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने ताइवान-तिब्बत नीति पर नेहरू और वाजपेयी के साथ पीएम मोदी को भी लपेटा

NewDelhi : चीन ने लद्दाख के हिस्‍सों पर कब्‍जा लिया है और मोदी बेहोशी की हालत में है. भाजपा नेता सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने चीन के बहाने प्रधानमंत्री मोदी पर हल्ला बोला है. स्‍वामी का यह बयान अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्‍स नैंसी पेलोमी की ताइवान यात्रा के बीच आया है. जान लें कि स्‍वामी भाजपा के राज्‍यसभा सांसद ने बुधवार को ट्वीट कर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी को भी नहीं छोड़ा.

मोदी कोई आया नहीं... कहते हुए चुप हैं

स्‍वामी ने कहा कि नेहरू और वाजपेयी की बेवकूफी के कारण हम भारतीयों ने तिब्‍बत और ताइवान को चीन का हिस्‍सा स्‍वीकार कर लिया. सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने लिखा, लेकिन अब चीन साझा सहमति वाली LAC को मानने से इनकार करता है. वह लद्दाख के हिस्‍सों पर कब्‍जा जमा चुका है, जबकि मोदी कोई आया नहीं... कहते हुए चुप हैं. हालांकि स्‍वामी ने तंज कसते हुए कहा कि चीन को पता होना चाहिए कि फैसला करने के लिए हमारे यहां चुनाव होते हैं.

चीन  नैंसी पेलोमी की ताइवान यात्रा से बौखलाया हुआ है

जान लें कि अभी चीन अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्‍स नैंसी पेलोमी की ताइवान यात्रा से बौखलाया हुआ है. वह लगातार अमेरिका को धमकी दे रहा है. चीन और भारत के बीच पहले से ही तनाव जारी है. चीन और भारत की सेनाएं 2020 से ही पूर्वी लद्दाख में कई पॉइंट्स पर आमने-सामने हैं. जहां तक ताइवान की बात है. तो उसके साथ डिप्‍लोमेटिक रिश्‍तों से भारत कतराता रहा है. 1990 के दशक में दोनों के रिश्‍तों में सुधार आया. हालांकि लुक ईस्‍ट नीति के तहत भारत ने व्‍यापार और निवेश समेत अन्‍य कारोबारी क्षेत्रों में संबंध मजबूत किये हैं. चीन लगातार मांग करता आया है कि भारत वन चाइना पॉलिसी जारी रखे. भारत ने ताइवान पर रुख ठंडा इसलिए भी रखा क्‍यों‍कि वह नहीं चाहता कि कश्‍मीर और पूर्वोत्‍तर में चीन का दखल बढ़े.

प्रधानमंत्री नेहरू के समय में तिब्‍बत के साथ रिश्‍ते कमजोर होते गये...

जानकारों का मानना है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के समय में तिब्‍बत के साथ रिश्‍ते कमजोर होते गये. 1952 में ल्‍हासा स्थित डिप्‍लोमेटिक मिशन को डाउनग्रेड कर कांसुलेट जनरल कर दिया गया. 10 साल बाद 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद कांसुलेट भी बंदकर दिया गया. भारत लगातार ल्‍हासा में कांसुलेट खोलने की मांग करता रहा, मगर चीन इनकार करता है. 1988 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद जारी साझा बयान में तिब्‍बत को चीन का ऑटोनॉमस रीजन करार दिया गया था. जून 2003 में तत्‍कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के बाद संयुक्‍त घोषणा में भी भारत ने तिब्‍बत को चीन का हिस्‍सा मान लिया. विशेषज्ञों का कहना है कि 2003 में ही भारत ने तिब्‍बत पर चीन की संप्रभुता स्‍वीकार कर ली है [wpse_comments_template]  

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