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‘रामलीला’ की रैली से ऐसी दहशत!

आखिर क्या हो जाएगा उस रैली से? क्या सरकार के पास कोई खुफिया जानकारी है कि रैली के बहाने कोई साजिश हो रही है? लगता तो नहीं है! ऐसा होता, तो अब तक राहुल गांधी को गिरफ्तार किया जा चुका होता!
 
राहुल गांधी द्वारा जारी पोस्टर.

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श्रीनिवास

लगता है, सरकार आमादा है कि एक नवंबर को रामलीला मैदान में आहूत रैली को फ्लॉप या देश विरोधी साबित कर देगी! 'खास' रंग में रंग चुकी मीडिया के माध्यम से यह नैरेटिव बनाने का प्रयास हो रहा है कि इस रैली से देश पर बहुत बड़ा संकट आ जायेगा या यह असल में देश को अराजकता के गर्त में धकेलने की साजिश है.

 

एक टर्म उछाला गया, खुद मोदी जी ने शुरुआत की- रिजीम चेंज! फिर सत्ता पक्ष के सारे नेता और कथित मुख्यधारा की मीडिया पर बहस शुरू हो गयी- इनका मकसद ‘रिजीम चेंज’ करना है! मानो ‘रिजीम चेंज’ की बात करना, उसके लिए प्रयास करना कोई अपराध और अलोकतांत्रिक बात हो! ‘रिजीम चेंज’ का मतलब कतई हिंसक तख्ता-पलट नहीं होता! हालांकि व्यापक जनाक्रोश और जनांदोलन के कारण इस तरह हुए हर तख्ता-पलट का नतीजा हमेशा नकारात्मक ही नहीं होता!

 

उस ‘रिजीम चेंज’ के बाद बनने वाली सरकारों को दूसरे देश मान्यता देते हैं, उनसे बेहतर संबंध बनाने का प्रयास करते है! जैसे बांग्लादेश और नेपाल की नयी सरकारों के साथ भारत का रिश्ता सामान्य ही है! बांग्लादेश का निर्माण ही व्यापक हिंसा और युद्ध के बाद हुआ था! शुरू में अमेरिका और उसके पिट्ठू देशों ने बांग्लादेश को मान्यता नहीं दी, लेकिन अंततः सच को स्वीकारना पड़ा. आज उस ‘रिजीम चेंज’ को कौन गलत मानता है? 

 

अभी तो सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो रही है. धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि ज्ञानेश कुमार की भूमिका संदिग्ध रही है! अन्यथा आखिर चुनाव आयुक्तों को मुकदमे से बचाने वाला कानून क्यों बनाया जाता? इससे पता चलता है कि ज्ञानेश कुमार सरकार और मोदी जी के लाडले क्यों हैं? सीईसी छोड़िए, किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को अलोकतांत्रिक कहा जा सकता है? क्या भारत में ऐसी मांगों, उनके लिए आंदोलनों का लंबा इतिहास नहीं है? 

 

कुछ दिन पहले किसी नामालूम से व्यापारिक संगठन (ब्रजेश गोयल) से राहुल गांधी के नाम अपील जारी कराई गई कि रैली कैंसिल कर दीजिए, अन्यथा हजारों करोड़ के कारोबार का नुकसान हो जायेगा. कमाल यह कि भाजपा ने बीते बुधवार 28 अक्टूबर को दिल्ली में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा निकाली. इसके अलावा खरगे के ‘बाप’ वाले बयान के खिलाफ भी भाजपा देश भर में प्रदर्शन कर रही है! भाजपा को चिंता हुई कि इससे कारोबार पर असर पड़ सकता है!  

 

इस बीच राहुल गांधी के हालिया विदेश दौरे को लेकर भी तरह-तरह के भ्रम फैलाने का प्रयास हुआ. भाजपा के साथ सभी ‘नामी’ चैनलों के एंकर-एंकरानियां कांग्रेस से पूछने लगे- राहुल गांधी कहां और क्यों गये हैं? ‘क्यों’ तो नहीं, लेकिन कहां गये हैं, यह तो सरकार भी जानती होगी! एक आरोप यह भी था कि वे भारत को अराजकता में धकेलने के लिए फंड लेने विदेश गये हैं. इस तरह उस रैली को ‘डीरेल’ करने की हर संभव कोशिश जारी है! लेकिन क्यों? 

 

आखिर क्या हो जाएगा उस रैली से? क्या सरकार के पास कोई खुफिया जानकारी है कि रैली के बहाने कोई साजिश हो रही है? लगता तो नहीं है! ऐसा होता, तो अब तक राहुल गांधी को गिरफ्तार किया जा चुका होता!

 

तो एक नवंबर की रैली को लेकर आखिर क्या आशंका है? राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेता आखिर क्या करनेवाले हैं कि सरकार परेशान है? रामलीला मैदान को तो सरकार ने वैसे भी बाकायदा विरोध-प्रदर्शन की जगह बना दिया है. लोग आएंगे, भाषण होगा, आगे के लिए कुछ घोषणा होगी, और क्या? 

 

याद रहे, यह वही रामलीला मैदान है, जहां 25 जून 1975 को एक बड़ी रैली हुई थी. एकमात्र वक्ता जयप्रकाश नारायण थे. उसके पहले से देश भर में सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा था. 12 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का ’71 का चुनाव रद्द घोषित कर दिया था! इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही थी. तय था कि 25 जून की रैली बड़ी होगी, उसमें आंदोलन के आगामी चरणों की घोषणा हो सकती है और वही हुआ. 

 

जेपी ने उस मंच से एक ऐसी अपील की, जिस पर अब भी बहस होती है कि वह करनी चाहिए थी या नहीं. उन्होंने जनता से शांतिपूर्ण संघर्ष का आह्वान करने के साथ ही सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों, यहां तक कि सेना और पुलिस से भी अपील की थी कि वे सरकार के और अपने उच्चाधिकारियों के किसी असंवैधानिक आदेश को नहीं मानें. यह संविधान के हिसाब से गलत नहीं है, लेकिन व्यवहार में उसका भिन्न अर्थ भी निकाला जा सकता है- अराजकता और विद्रोह के लिए उकसाना. सरकार ने यही अर्थ निकाला, इमरजेंसी (जो उसे रात घोषित हो गयी थी)लगाने के लिए एक तर्क यह भी दिया गया!

 

बताने की जरूरत नहीं कि रामलीला मैदान की उस रैली में वाजपेयी, आडवाणी, मधु लिमये, जॉर्ज, मोरारजी सहित उस समय के विपक्ष के सारे नेता उपस्थित थे! किसी ने जेपी की उस अपील को गलत नहीं माना! नरेंद्र मोदी उस समय बहुत छोटे स्तर के कार्यकर्ता होंगे, मगर नासमझ तो नहीं ही रहे होंगे! क्या आज भी वे कह सकते हैं कि जेपी को वह अपील नहीं करनी चाहिए थी? 

 

यदि जेपी की वह अपील गलत नहीं थी, तो अब उसी रामलीला मैदान की रैली से इतनी घबराहट क्यों! क्या बढ़ते जनाक्रोश के और फैलने का खतरा नजर आने लगा है? यदि हां, तो उनको इतना समझ लेना चाहिए कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध को बलपूर्वक कुचलने से कोई लाभ नहीं होता है, उल्टे जनता का आक्रोश और भड़क सकता है!

 

2011 में अन्ना हजारे को आगे करके (बाद में स्पष्ट हो गया वे महज मुखौटा थे) ‘जंतर मंतर’ पर सरकार के विरोध में बड़ा प्रदर्शन हुआ, जो एक तमाशा ही था, कई दिनों तक चला! 24 घंटे लाइव रिपोर्टिंग होती थी! तब उस आंदोलन के पक्ष में वे पत्रकार भी थे, जो अब ‘अर्बन नक्सल’ घोषित हो चुके हैं! यूपीए सरकार की छवि ध्वस्त हो गई, इकबाल खत्म हो गया. अंततः वह  सरकार चली भी गयी.

 

आपने वह ‘जंतर मंतर’ छीन लिया! और जिस ‘रामलीला मैदान’ को प्रदर्शन स्थल के रूप में घोषित किया है, वहां एक रैली हो रही है तो उससे भी आप परेशान हैं!

 

इस प्रसंग में दिल्ली की एक अन्य बड़ी रैली (जुलूस), जिसमें मैं शामिल था, याद आ रही है! 6 मार्च 1975, उसे ‘जनता मार्च’ नाम दिया गया था. महीनों पहले उसकी घोषणा हो गयी थी. देश भर में तैयारी चल रही थी. स्वाभाविक ही रैली में दिल्ली और आसपास के अधिक लोग पहुंचे. वह बिहार आंदोलन का ही विस्तार था, तो बिहार से बड़ी संख्या में लोग, खास कर युवा गये! 

 

बेतिया से सौ से अधिक. बगहा से नाव से (तब छितौनी में पुल नहीं बना था) गंडक पार कर गोरखपुर, फिर ट्रेन से. बिना टिकट. टुंडला जंक्शन पर मैजिस्ट्रेट चेकिंग हुई. हमारे डिब्बे में से चार आंदोलनकारियों को उतार लिया गया, एक मैं भी था. पूरे ट्रेन में आंदोलनकारी भरे हुए थे. हमें पकड़े जाने का हल्ला हो गया तो वहां जुटान होने लगा- नहीं छोड़ गया तो ट्रेन को आगे नहीं जाने देंगे. 

 

मैजिस्ट्रेट के साथ के सिपाही उनसे कह रहे थे- छोड़ दीजिए सर, बहुत बवाल हो जाएगा. मैजिस्ट्रेट की इज्जत का सवाल था, उसने मिनिमम लेकर टिकट बनाने की बात कहीं. हम वापस ट्रेन में! दिल्ली पहुंचे, लाल किला के पास रुके, अगले दिन छह मार्च को विशाल जुलूस निकला, जेपी के नेतृत्व में! दिनकर जी की पंक्ति गूंजी- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..’

 

बेशक जेपी की छवि ऐसी थी कि उनके रहते किसी अराजकता की आशंका नहीं थी, फिर भी रैली में भीड़ नहीं जुट सके, ऐसा कोई प्रयास हुआ, या बेटिकट यात्रियों/आंदोलनकारियों को भी उतारने की कोशिश, ऐसी कोई सूचना नहीं थी! 

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