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चीनी कम है-सरकार का फेल्योर या शुगर लॉबी?

देश में चीनी कम है. पिछले 15-20 दिनों के भीतर चीनी की कीमत 45 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 65-70 रुपये तक पहुंच गई है. यानी चीनी की किल्लत है. ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार की चिंता बढ़ गई और 20 जुलाई को 10 लाख टन चीनी आयात (विदेश से खरीद) करने का निर्णय ले लिया. यह बताने जताने की कोशिश की गई कि आम जनता की परेशानी से सरकार बहुत चिंतित है. लेकिन सरकार ने यह नहीं बताया कि चीनी की कीमतें बढ़ीं ही क्यों?
 
टिप्पणी
  • मोदी सरकार ने नवंबर 2025 में 15 लाख टन और फरवरी में 5 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति कैसे दे दी थी?

देश में चीनी कम है. पिछले 15-20 दिनों के भीतर चीनी की कीमत 45 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 65-70 रुपये तक पहुंच गई है. यानी चीनी की किल्लत है. ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार की चिंता बढ़ गई और 20 जुलाई को 10 लाख टन चीनी आयात (विदेश से खरीद) करने का निर्णय ले लिया. यह बताने जताने की कोशिश की गई कि आम जनता की परेशानी से सरकार बहुत चिंतित है. लेकिन सरकार ने यह नहीं बताया कि चीनी की कीमतें बढ़ीं ही क्यों?

 

क्या सिर्फ पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना ही इसकी वजह है? या वजहें दूसरी भी हैं, जिसके लिए कोई और नहीं बल्कि सीधे-सीधे मोदी सरकार के फैसले जिम्मेदार हैं. वो फैसले जो मोदी सरकार ने नौ और छह माह पहले लिये. वजहें जो भी हो, सरकार शायद यह कभी बताएगी नहीं और आम लोग अंधेरे में ही रहेंगे.

 

जैसा कि शोर मचाया जा रहा है, चीनी की कीमत बढ़ने की वजह पेट्रोल में इथेनॉल मिलाया जाना है. इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने के चक्कर में चीनी का उत्पादन कम हो गया. यह बात सही है, लेकिन पूरी तरह नहीं.

 

दरअसल, चीनी की कीमतों में वृद्धि के पीछे या तो सरकार का निकम्मापन, अदूरदर्शिता और फेल्योर है या फिर सरकार शुगर लॉबी के हाथों खेल रही है. ऐसा क्यों कहा जा सकता है? इसे समझने के लिए नौ माह पहले और छह माह पहले की दो खबरों पर गौर कीजिए. पुरानी खबरों को खंगालिए. आपको पता चलेगा कि पिछले साल नवंबर में भारत सरकार ने 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी. इसके तीन महीने बाद फरवरी में और 5 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई.

 

मतलब, छह महीने पहले तक देश में चीनी की कमी नहीं थी. तभी तो सरकार ने 20 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी. जरा सोचिए, बुद्धि की बलिहारी! 20 लाख टन चीनी निर्यात करने के बाद 10 लाख टन चीनी आयात करने का फैसला लेकर आम लोगों की चिंता करने वाली सरकार होने का दावा करके किसे बेवकूफ बनाया जा रहा है?

 

नवंबर 2025 और फरवरी में चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई थी. मतलब, यह न मानने का कोई आधार नहीं है कि सरकार को यह भी पता होगा कि देश में जरूरत के हिसाब से चीनी मौजूद है. लेकिन सच तो यह है कि चीनी कम थी, जिसका असर अब दिख रहा है. इसके दो मतलब हैं. या तो सरकार ने जानबूझकर किल्लत पैदा की या फिर सरकार को चीनी की उपलब्धता का सही आंकड़ा पता नहीं था. या जो आंकड़े उपलब्ध थे, वे सही नहीं थे.

 

अगर छह और नौ महीने पहले सरकार के पास सही आंकड़े थे, तो सरकार ने यह चूक क्यों की? किसने चूक की? क्यों निर्यात की इजाजत दी गई? और अगर सरकार के पास सही आंकड़े उपलब्ध थे, तो छह माह में ही सरकार का आकलन कैसे गलत हो गया? और अगर आंकड़े गलत थे, तो विपक्ष का वह आरोप सही प्रतीत होता है, जिसमें मोदी सरकार पर आंकड़ों में हेरफेर करने के आरोप लगते हैं.

 

चीनी की कीमत बढ़ने की एक अन्य वजह शुगर लॉबी भी है. शुगर लॉबी इस काम में माहिर है. वह देश में बनी चीनी को महंगा करके बेच रही है और मुनाफा कमा रही है. अब आयात की गई चीनी से भी कमाई करेगी. और महंगाई की मार झेलेगी जनता.

 

यह शुगर लॉबी किनकी है, किन नेताओं और उनके रिश्तेदारों की है, यह बात छिपी नहीं है. यह भी छिपा नहीं है कि वे नेता इन दिनों दिल्ली में किन लोगों के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं. वैसे, बहुतों के लिए चीनी की कीमत का बढ़ना भी गर्व की बात होगी. विश्वगुरु जो ठहरे.

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