- दल बदलने वाले अधिकांश नेता हो गये फ्लॉप, राजनीतिक करियर भी लगभग खत्म
- गिरिनाथ, लालचंद, केसरी, देवकुमार धान, राधाकृष्ण, गौतम सागर राणा जैसे नेता हो गये फ्लॉप
- अर्जुन मुंडा, बाबूलाल, बाउरी, अन्नपूर्णा, जेपी, चंद्रवंशी, बन्ना जैसे नेताओं को दल बदलने से हुआ फायदा
Satya Sharan Mishra Ranchi: यह चुनावी साल है. लोकसभा के बाद झारखंड में विधानसभा के भी चुनाव होने हैं. जाहिर है सांसद और विधायक बनने के लिए नेता लोग खूब उछल-कूद करेंगे. जल्द ही जोर-शोर से दलबदल का सिलसिला शुरू होगा. झारखंड के प्रमुख राजनीतिक दल झामुमो, कांग्रेस और भाजपा के कई बड़े नेता टिकट पाने के लिए दल बदलेंगे. राजनीतिक दलों में हाशिए पर जा चुके और कभी कद्दावर नेता माने जाने वाले नेता जो अब अप्रासंगिक हो चुके हैं, वे भी टिकट पाने के लिए एक बार फिर हाथ-पैर मारेंगे. झारखंड के अधिकांश बड़े नेताओं ने दल बदला है, लेकिन सभी को दलबदल रास नहीं आया है. ऐसे कुछ ही नेता हैं जो दल बदलने के बाद फायदे में है, जबकि अधिकांश दलबदलुओं का राजनीतिक करियर लगभग समाप्ति की ओर है.
दल बदल कर फ्लॉप हो गये ये नेता
गिरिनाथ सिंह: गिरिनाथ सिंह झारखंड में राजद का बड़ा चेहरा थे. बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. झारखंड में जब राजद कमजोर हुई, तब गिरिनाथ सिंह ने दल बदल दिया. 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में आ गये, लेकिन यहां भी वे हाशिए पर ही रहे. कार्यसमिति सद्स्य का पद देकर उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है. गौतम सागर राणा: गौतम सागर राणा बगोदर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं. वे कई बार राजद के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने कई बार दल बदला. झाविमो में शामिल हुए, फिर राजद गये. राजद छोड़ कर राजद के समानांतर अपनी पार्टी बनाई, लेकिन फ्लॉप रहे. अब एक बार फिर चुनावी मौसम में वे राजद में शामिल हो चुके हैं.
राधाकृष्ण किशोर: पूर्व विधायक राधाकृष्ण किशोर पलामू में अच्छी पकड़ रखते हैं. राजनीति में वे एक जमाने में चर्चित चेहरा थे, लेकिन अभी हाशिए पर हैं. पहले समता पार्टी, फिर जदयू, कांग्रेस, भाजपा और आजसू होते हुए वे राजद में चले गये हैं. पिछले चुनाव में भाजपा से टिकट कटा, तो वे आजसू से चुनाव लड़े, लेकिन हार गये. ताला मरांडी: भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और बोरियो से विधायक रहे ताला मरांडी 2019 में भाजपा छोड़ आजसू में शामिल हुए थे. चुनाव हार गये तो आजसू में हाशिए पर चले गये. थक हार कर फिर से वे भाजपा में शामिल हुए, लेकिन भाजपा में भी अबतक हाशिए पर ही हैं. लालचंद महतो: पूर्व मंत्री लालचंद महतो का भी कुछ ऐसा ही हाल है. कभी राज्य का बड़ा कुर्मी चेहरा माने जाते थे. जनसंघ से राजनीति शुरू की थी, फिर जनता दल में चले गये. वहां भी मन नहीं लगा तो बहुजन सदान मोर्चा नाम की अपनी पार्टी बना ली। जब पार्टी नहीं चली तो भाजपा में चले गये। भाजपा में हाशिये पर गये तो जदयू में चले गये। वहां भी हाशिये में गये तो समाजवादी पार्टी में शामिल हो गये.
रामचंद्र केसरी: पूर्व मंत्री रामचंद्र केसरी भी कभी बड़े नेता थे. भवनाथपुर से विधायक रहे. लंबी छलांग की मंशा से जदयू छोड़ राजद में गये, लेकिन फ्लॉप हो गये. फिर बाबूलाल मरांडी के जेवीएम में शामिल हुए, लेकिन वहां भी कोई कमाल नहीं कर सके. बाद में बचा-खुचा राजनीतिक करियर चलाने के लिए भाजपा में शामिल हो गये.
देवकुमार धान: पूर्व मंत्री देवकुमार धान भी कभी बड़ा आदिवासी चेहरा थे. कांग्रेस के टिकट पर मांडर से चुनाव जीतते रहे थे. बाद में भाजपा में चले आये. भाजपा ने 2019 में सिटिंग विधायक का टिकट काट कर इन्हें दिया, फिर भी हार गये. पिछले साल उपचुनाव में भाजपा ने इन्हें किनारे कर दिया, तो ये ओवैसी की पार्टी में चले गये. दल बदल कर इन्हें मिली सफलता
अर्जुन मुंडा: केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने झामुमो से राजनीति की शुरुआत की थी. बाद में वे भाजपा आये. यह दलबदल उनकी जिंदगी में सफलता लेकर आया. झारखंड में भाजपा के प्रमुख नेता बने. मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष रहे. अब केंद्र सरकार में मंत्री हैं.
बाबूलाल मरांडी: पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी ने भाजपा छोड़ कर अपनी पार्टी झाविमो बनाई. 14 साल तक उन्होंने भाजपा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की. भाजपा ने भी उन्हें डैमेज किया, लेकिन 2019 में वे फिर से भाजपा में आ गये. भाजपा ने आते ही उन्हें विधायक दल का नेता चुना. अब वो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. अमर बाउरी: अमर बाउरी झाविमो के टिकट पर जीत कर पहली बार विधायक बने थे. दल बदल कर भाजपा में आ गये. भाजपा ने उन्हें राज्य में मंत्री का पद दिया. बाबूलाल मरांडी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद अब पार्टी ने उन्हें विधायक दल का नेता बनाया है.
रामचंद्र चंद्रवंशी: रामचंद्र चंद्रवंशी विश्रामपुर से भाजपा के विधायक हैं. पहले राजद के टिकट पर चुनाव जीतते थे. राजद छोड़ कर भाजपा में आये. चुनाव जीते और मंत्री का पद पाया. फिलहाल पार्टी में अच्छी स्थिति में हैं. संजय सेठ: संजय सेठ भाजपा के कार्यकर्ता थे. उपेक्षा हुई तो झाविमो में शामिल हो गये. तत्कालीन सीएम रघुवर दास की कृपा हुई और झारखंड खादी बोर्ड के अध्यक्ष बने. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान किस्मत खुल गई. भाजपा ने उन्हें रांची से लड़ा दिया. चुनाव जीत गये. अब तो पीएम मोदी भी इनकी तारीफ करते हैं. [wpse_comments_template]
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