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संविधान की प्रस्तावना से सोशलिस्ट और सेक्युलर शब्द हटाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सोमवार को

New Delhi : सुप्रीम कोर्ट संविधान की प्रस्तावना से सोशलिस्ट और सेक्युलर जैसे शब्द हटाने की मांग करने वाली याचिका पर सोमवार को फैसला सुनायेगा. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा था कि संविधान के 42वें संशोधन, जो 1976 में हुए थे, उस पर काफी ज्यूडिशियल रिव्यू हो चुके हैं. कहा कि हम यह नहीं कह सकते कि इमरजेंसी में जो भी काम संसद द्वाराकिया गया, वह अमान्य है. कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए संविधान की प्रस्तावना से सोशलिस्ट और सेक्युलर` जैसे शब्द हटाने की मांग करने वाली याचिका लार्जर बेंच को सौंपने से मना कर दिया.

चीफ जस्टिस  खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले में सोमवार को फैसला सुनायेंगे. जान लें कि चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने सुनवाई कर फैसला सुरक्षित रख लिया है. चीफ जस्टिस खन्ना ने भारतीय संदर्भ में कहा कि सोशलिस्ट का मतलब वेलफेयर स्टेट है. भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अर्जी दाखिल कर प्रस्तावना में संविधान संशोधन के जरिये जोड़े गये सेक्युलर और समाजवाद शब्द को डिलीट करने की मांग कोर्ट से की है. इसके अलावा एडवोकेट विष्णुशंकर जैन और अन्य ने भी अर्जी दाखिल की है,

सेक्युलर और समाजवाद शब्द को 1976 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में डाला गया था

याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय के अनुसार वे सोशलिस्ट, सेक्युलर और इंटिग्रिटी शब्द के खिलाफ नहीं हैं. कहा कि इसे संविधान में रखने के भी खिलाफ भी वे नहीं हैं, लेकिन इसे प्रस्तावना में 1976 में डाले जाने के खिलाफ हैं. जान लें कि सेक्युलर और समाजवाद शब्द को 1976 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में डाला गया था. इसे 26 नवंबर 1949 से प्रभावी कर दिया गया.

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