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सुशील श्रीवास्तव हत्याकांडः पुलिस ने अखबार में छपी खबर के आधार पर साजिश की थ्योरी बनायी

सुशील श्रीवास्तव की फाइल फोटो

Ranchi : हजारीबाग कोर्ट परिसर में सुशील श्रीवास्तव हत्याकांड मामले में पुलिस, साजिश की अपनी थ्योरी से भटक गयी. वास्तव में हत्या की घटना के बाद अखबार में छपी साजिश की थ्योरी के आधार पर पुलिस ने विकास तिवारी को साजिशकर्ता माना और इसी लाइन पर जांच की. अखबार में छपी खबर में विकास तिवारी को साजिशकर्ता बताया गया था. न्यायाधीश रंगोन मुखोपाध्याय और न्यायाधीश प्रदीप कुमार ने सुशील श्रीवास्तव हत्याकांड के अभियुक्तों को बरी करते हुए पुलिस की जांच पर यह टिप्पणी की है.

 

न्यायालय ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष के गवाहों को पुलिस गवाह और स्वतंत्र गवाह के रूप में दो हिस्सों में बांटा है. न्यायालय ने स्वतंत्र गवाह के रूप में पेश किये गये मृतक के पुत्र और मृत के सहयोगी के बयान को संदेहास्पद माना है. पुलिस के गवाहों ने खुद को चश्मदीद गवाह करार दिया था. इन चश्मदीद गवाहों द्वारा बतायी गयी हमलावरों की संख्या में भारी अंतर पाया गया. किसी चश्मदीद गवाह ने हमलावरों की संख्या दो तीन बतायी थी तो किसी ने 8-10. 

 

पुलिस के कुछ चश्मदीद गवाहों ने घटना होने के बाद वहां पहुंचने की बात कही थी. वहीं कुछ चश्मदीद गवाहों ने दूसरों से सुनी हुई बातों के आधर पर खुद को चश्मदीद गवाह के रूप में कोर्ट में पेश किया था. किसी ने एक हमलावर को AK-47 से गोली चलाने तो किसी ने दो हमलावरों द्वारा AK-47 से गोली चलाने की बात कही थी. ज़्यादातर गवाहों मे हमलावरों द्वारा चेहरा ढ़ंके होने की बीत कही थी. 

 

पुलिस ने पूरी घटना को एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा करार दिया था. साथ ही पूरे साजिश की थ्योरी पर ही पूरे मामले में जांच की थी. न्यायालय मे पुलिस द्वारा बतायी गयी साजिश की थ्योरी में तथ्यों की समीक्षा के बाद अपने फैसले में यह कहा कि पुलिस अपनी ही साजिश की थ्योरी से भटक गयी. घटना के बाद अख़बार में छपी साजिश की थ्योरी के लाइन पर जांच की. 

 

अखबार में छपी खबर में सुशील श्रीवास्तव की हत्या के लिए विकास तिवारी को दोषी और साजिशकर्ता बताया गया था. पुलिस ने भी सुशील श्रीवास्तव हत्याकांड में साजिश की इसी थ्योरी को डाला. लेकिन जांच के दौरान पुलिस साजिश की इस थ्योरी की साबित करने के लिए किसी तरह का सबूत नहीं जुटा सकी.

 

विकास तिवारी और राहुल देव के बीच टेलीफोन पर बातचीत कर हत्या की साजिश रचने की बात कही गयी. यह बातचीत भी उस वक्त हुई जब सुशील श्रीवास्तव के जेल से कोर्ट जाने के लिए निकला और कोर्ट परिसर में उसकी हत्या हो गयी. पुलिस अपनी इस थ्योरी के मद्देनजर ना तो मोबाईल जब्त किया ना ही CDR पेश किया. 

 

साजिश की थ्योरी सुशील श्रीवास्तव और विकास तिवारी के बीच कथित दुश्मनी के आधार पर बनायी गयी थी. पुलिस किसी भी सबूत के सहारे यह साबित नहीं कर सकी कि विकास सहित अन्य ने साजिश रची थी और सुशील हत्याकांड इसी साजिश का नतीजा था. 

 

अभियोजन पक्ष के एक गवाह ने अपने बयान में कहा था कि अखबार में राज सिंह नाम के शूटर के शामिल होने की खबर छपी थी. लेकिन पुलिस के गवाह सह मामले के एक जांच अधिकारी ने जांच के दौरान शूटआउट में राज सिंह के शामिल होने के बारे में पता चलने की बात कही थी. अभियोजन पक्ष के एक दूसरे गवाह सह दूसरे जांच अधिकारी ने कहा कि वह राज को रिमांड पर लेने के लिए सुलतानपुर जेल गये थे. लेकिन राज को सुलतानपुर से बरेली जेल में स्थानांतरित किये जाने के बाद राज को रिमांड पर लेने या उसके बारे में आगे की जांच बंद हो गयी. 

 

न्यायालय ने अपने फैसले मे इन घटनाओं की चर्चा करते हुए यह कहा कि इससे यह पता चलता है कि पुलिस ने मामले की जांच कैसे की. जांच के दौरान राज के शूटरों में से एक होने की जानकारी मिलने और उसे ढूंढने के बावजूद आगे कुछ भी नहीं किया. इससे इस हत्याकांड में पुलिस को मिली एक अहम सुराग समाप्त हो गया. न्यायालय ने पुलिस जांच की इन तथ्यों के अधार पर हजारीबाग सत्र न्यायाधीश अमित शेखर द्वारा सुनायी गयी सजा के फैसले को रद्द कर दिया.

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