alt="" width="600" height="400" /> आरओपी से ग्रस्त होने पर बच्चे के रेटिना में अवांछित रक्त वाहिकाएं विकसित हो जाती हैं. ये रक्त वाहिकाएं बाद के जीवन में आंख और दृष्टि में गंभीर समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं. आरओपी खुद ही बच्चों के विकास के साथ खत्म हो सकता है. लेकिन जरूरी है कि बच्चों को आंख के चिकित्सक के पास नियमित जांच कराएं. बच्चों में अंधापन यानि ब्लाइंडनेस को रोकने के लिए कभी कभी तत्काल उपचार की जरुरत होती है. यदि यह उपचार नहीं किया गया तो बच्चा बाद के जीवन में आंखों की रोशनी पूरी तरह खो सकती है. विश्व स्वास्थ्यसंगठन के अनुसार भारत में 3 करोड़ बच्चे प्रत्येक वर्ष पैदा होते हैं, जिनमें से 40 लाख बच्चे प्रीमेच्योर जन्म लेते हैं. इन 40 लाख प्रीमेच्योर बच्चों को रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी (आरओपी) से नेत्रहीनता का खतरा होता है, जिसे जागरूकता एवं उपचार से रोक सकते हैं. देश में इसके कारण प्रत्येक वर्ष लगभग 5 लाख बच्चों की आंखों की रोशनी प्रभावित होती है. इलाज के अभाव में 50 हजार से अधिक बच्चे एडवांस आरओपी के कारण हमेशा के लिए अंधे हो जाते हैं.
इन कारणों से हो सकता है रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी
alt="" width="600" height="400" /> आमतौर पर आंखों में रक्त वाहिकाएं जन्म से कुछ हफ्ते पहले ग्रो होना बंद हो जाती हैं. जो बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं, उनमें स्थिति कुछ अलग होती हैं. दवाओं, ऑक्सीजन, चकाचौंध भरी रोशनी, तापमान का बदलाव आदि वजहों से आंखों की रक्त वाहिकाओं के विकास पर प्रभाव पड़ता है. जिन बच्चों का जन्म के समय 1.5 किलोग्राम से वजन कम हो एवं जिन बच्चों को जन्म के बाद लंबे समय तक ऑक्सीजन दिया गया हो, उनमें आरओपी का खतरा होता है. जुड़वा बच्चों में, एनीमिया, इंफेक्शन एवं जन्म के समय सांस की तकलीफ से पीड़ित नवजात बच्चों में आरओपी का खतरा बन सकता है.
जांच इसलिए जरूरी
alt="" width="600" height="400" /> समयसे पहले जन्मे शिशुओं में जन्म के तुरंत बाद यह बीमारी नहीं होती है। यह रोग जन्म के कुछ दिनों बाद प्रकट होता है एवं उपचार के अभाव में जन्म के 1-2 माह के अंदर लाइलाज हो जाती है.आरओपी.द्वारा होने वाली नेत्रहीनता को रोकने के लिए जिनबच्चों का जन्म 36 सप्ताह से पहले हुआ है, उन्हें जन्म के 30 दिन बाद पर्दे की विस्तृत जांच करना आवश्यक है. जिन बच्चों का जन्म 30 सप्ताह से पहले हुआ है उन्हें जन्म के 20 दिन बाद पर्दे की विस्तृत जांच करना आवश्यक है. 34 सप्ताह से पहले जन्म लेने वाले और 2 किलो से कम वजन वाले शिशुओं की जीवन के पहले 28 दिनों तक आरओपी के लिए जांच की जानी चाहिए. साप्ताहिक या दो सप्ताह के अंतराल पर लगातार जांच तब तक की जाती है जब तक कि वृद्धि पूरी न हो जाए या यह पता लगाने के लिए कि आरओपी विकसित हो रहा है या नहीं.
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