Lohardaga : लोहरदगा की समाजसेविका सुनिता उरांव ने आदिवासी दिवस के मौके पर कहा कि आदिवासी समाज को मुख्यधारा में जोड़े बिना सामाजिक विकास की बात करना कोरी कल्पना है. कहा कि भारत समेत दुनियाभर के कई देशों में आदिवासी दिवस काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. लेकिन यह चिंता का विषय है कि यहां आदिवासियों की हालत दोयम दर्जे की क्यों है. आज भी आदिवासी समाज देश की मुख्यधारा से बाहर क्यों है. सुनिता उरांव ने जोर देते हुए कहा कि जब-तक आदिवासी समुदाय को मुख्यधारा में नहीं लाया जाता, तब-तक इस दिवस और देश का विकास कोई मायने नहीं रखता. सुनिता उरांव ने कहा कि देश का विकास आदिवासी समुदाय के विकास के बिना संभव नहीं है.
यूएनओ के निर्देश के बावजूद आदिवासी समाज की स्थिति बद से बदतर क्यों
उल्लेखनीय है कि विश्वभर के आदिवासियों के मानवाधिकारों को लागू करने और उनके संरक्षण के लिए 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक कार्यदल यूएनडब्लूजीईपी के उप आयोग का गठन किया. इसके बावजूद विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले आदिवासी समाज के लोगों को उपेक्षा, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम प्रकार की सुविधाओं का अभाव है. वे बेरोजगारी और बंधुआ व बाल मजदूरी जैसी समस्याओ से ग्रसित हैं. उन्होंने कहा कि हमें आज भी अपने अधिकार, समस्याओं के निराकरण और भाषा, संस्कृति व इतिहास के संरक्षण के लिए संघर्ष जारी रखने की जरुरत है. सुनिता उरांव ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि यूएनओ के निर्देश के बावजूद आदिवासी समाज की स्थिति बद से बदतर क्यों होती जा रही है. अधिसंख्यक आदिवासी आज भी शोषित क्यों हैं, आज भी वे मुख्यधारा से अलग क्यों हैं. सुनीता उरांव ने कहा कि जब-तक हमारा समाज मुख्यधारा में नहीं आयेगा तब-तक सामाजिक विकास की बात कोरी कल्पना ही होगी. [wpse_comments_template]
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