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नदियों का पानी रोकने की बात बुरबक बनाने के अलावा कुछ नहीं

Surjit Singh जम्मू-कश्मीर में 26 पर्यटकों की हत्या के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने सिंधु नदी की पानी रोकने की घोषणा की है. अखबार व टीवी भी यही बता रहा है कि पाकिस्तान एक बूंद पानी को तरस जायेगा. पर, सच क्या है. दरअसल, यह सब कह करके केंद्र सरकार देश के लोगों को बुरबक बना रही है. यह सरकार ऐसा कुछ भी करने का इरादा नहीं रखती और ना ही नदी का पानी रोकना संभव है. चाहे बात सिंधु की नदियों का पानी रोकने की हो या गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे द्वारा गंगा की पानी को रोकने की बात. मोदी सरकार सिंधु नदी का पानी रोकने की बात पहली बार नहीं कर रही है. यह तीसरा मौका है. इससे पहले वर्ष 2016 में उरी हमले के ठीक बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था- रक्त और पानी साथ नहीं बह सकते. दूसरी बार पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने ऐसी ही बातें की थी. और अब 2025 में पर्यटकों की हत्या के बाद मोदी सरकार के मंत्री आदेश जारी कर रहे हैं कि एक बूंद पानी भी पाकिस्तान नहीं जायेगा. अब सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार सच में पानी रोकने को लेकर गंभीर है और क्या पानी रोकना संभव है? अगर मोदी सरकार पानी रोकने को लेकर गंभीर है, तो उसे बताना चाहिए कि पिछले 9 सालों में उसने ऐसा क्या किया, जिससे पाकिस्तान की तरफ जाने वाली नदियों के पानी को रोका गया. कुछ भी नहीं. फिर 2025 में वही राग क्यों अलाप रहे. देश में भावनाओं का ज्वार बढ़ाने के लिए या लोगों को बुरबक बनाने के लिए. दूसरा सवाल- क्या नदियों का पानी रोकना संभव है. तो इसे ऐसे समझिए. पाकिस्तान सीमा से लगे कुछ छह नदियां हैं. भारत के हिस्से की नदी रावी, ब्यास औऱ सतलुज है, जबकि पाकिस्तान के हिस्से में जाने वाली सिंधु, झेलम और चिनाब. भारत अपने हिस्से की तीन नदियों का पानी रोकने के लिए पिछले 80 सालों में थोड़ी सफलता हासिल की है. भारत के हिस्से की तीनों नदियों रावी, ब्यास व सतलुज में प्रति वर्ष 33 बिलियन एकड़ फुट पानी बहता है. इसे तो हम पूरी तरह रोक नहीं पाए हैं, अभी तक, लेकिन बात हो रही है सिंधु, झेलम व चिनाब नदी का पानी रोकने की. तथ्य यह है कि इन तीनों नदियों से प्रति वर्ष 133 बिलियन एकड़ फुट पानी बहता है. इस पानी को रोकने के लिए बड़े-बड़े डैम बनाने पड़ेंगे. जिसके लिए सालों का वक्त लगेगा और खरबों रुपये. तब जाकर कुछ हद तक पानी तो रुक जायेगा, लेकिन इसका असर नदी के रास्ते आने वाले भारतीय इलाकों पर भी पड़ेगा. बाढ़ की तबाही के रुप में. दरअसल, सिंधु की नदियों में पानी हिमालय की उंचाईयों से आता है. प्राकृतिक ढलान के कारण वह पाकिस्तान की तरफ बहती है. इस पानी को रोकने के लिए विशाल बांध बनाने की जरुरत है. जो तकनीकि और आर्थिक दोनों तरह से चुनौतीपूर्ण है. वर्ष 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत सरकार ने एक कमेटी बनायी थी, जिसका काम था सिंधु की नदियों का पानी रोकने की योजना बनाना. छह सालों में इस कमेटी ने क्या रिपोर्ट की, उन रिपोर्ट्स पर क्या कार्रवाई हुई, यह किसी से छिपा नहीं है. रही बात गंगा नदी का पानी रोक करके बांग्लादेश को पानी के लिए तरसाने का, तो फरक्का में बांध बना हुआ है, वहां पानी रूकता है. लेकिन जब पानी का स्तर बढ़ता है, तो पानी छोड़ना ही पड़ता है. लेकिन एक बार मान लीजिये कि और बांध बनाकर पानी को रोका जायेगा, तो क्या पश्चिम बंगाल व बिहार बाढ़ की चपेट से बच पायेगा. दरअसल, असल मुद्दा यह है कि पर्यटकों की हत्या में किसकी चूक है, किसकी चूक की वजह से वहां सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे, इंटेलिजेंस इनपुट नहीं होने के लिए कौन जिम्मेदार है, घटना के बाद कूटनीतिक, राजनीतिक और सुरक्षा को लेकर ऐसा क्या किया जा रहा है, जिससे पाकिस्तान को उसकी करनी का फल मिले, यह सब ना बताना पड़े, इसलिए हल्की बातें, असंभव जैसी बातें लोगों को बताया जा रहा है. ताकि लोगों को यह लगे कि केंद्र सरकार ने पाकिस्तान को दंडित कर दिया. हत्याओं का बदला ले लिया गया. एक तरह से यह सब देश के लोगों को बुरबक बनाने जैसा है.  

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