
बैजनाथ मिश्र
ऐसा प्रतीत होता है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सेक्युलरिस्टों का नाड़ा ढ़ीला हो गया है. उन्हें यकीन हो गया है कि चुनावी सफलता का वीटो सनातनियों के हाथ में चला गया है. इसलिए वे वैचारिक लबादा और सियासी चाल बदलने के लिए किसी मुफीद मौके की तलाश में थे. वह मौका उन्हें अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा चोरों और उनके सरपरस्तों ने दे दिया है.
अब भाजपा और संघ परिवार पर लानत भेजने और उनसे बड़ा सनातन प्रेमी दिखाने की होड़ सी मच गई है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश में जहां अगले साल की शुरुआत में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. यहां सेक्युलर वोटों के तीन अढ़तिये हैं. इनमें अव्वल है समाजवादी पार्टी. इस पार्टी के नेता, प्रवक्ता अपनी पार्टी को तनातनी समाजवादी पार्टी बता रहे हैं. इस पार्टी ने राम मंदिर निर्माण में कितना योगदान दिया है, इसकी पूरी सूची उपलब्ध है. बाकायदे बयानों और करतूतों के साथ. यह पार्टी राम भक्तों पर गोलियां चलवाकर और उन्हें जेलों में ठूंसकर कीर्ति कमा चुकी है. इसी कीर्ति के कारण वह राज्य में सबसे उम्दा सेक्युलर पार्टी के तख्त से कांग्रेस को उतारकर खुद बैठ चुकी है.
इसी प्रकार लालू प्रसाद ने राम रथ यात्री लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवाकर सेक्युलरिज्म की गाड़ी से कांग्रेस को उतारकर फेंका था. आज आलम यह है कि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस सपा और राजद की पिछलग्गू बनी हुई है. कांग्रेस सेक्युलर वोटों की सोल एजेंसी रही है. जहां क्षेत्रीय दल लड़ाई में नहीं है, वहां उसकी एजेंसी ठाठ से चल रही है.
उत्तर प्रदेश में तीसरी अढ़तिया मायावती की बसपा है. लेकिन आजकल यह दुकान मंदी के दौर से गुजर रही है. कारण यह है कि इसने भाजपा को परास्त कर पाने की हैसियत लगभग खो दी है. प्रदेश में बदलते सियासी हालात के बीच बसपा का हाथी बिना किसी नये रंग रोगन के मैदान में उतरने जा रहा है. लेकिन सपा की साइकिल की सीट और हैंडिल वगैरह भगवा रंग में रंग दिये गये हैं.
सपाइयों को लग रहा है कि यदि सनातनी वोट छितरा जाये और सेक्युलरिज्म की दुकान पहले जैसी ही चलती रहे तो फिर सत्ता की राह की अड़चनें दूर हो जायेंगी. उधर कांग्रेस राम मंदिर निर्माण का श्रेय लेने के लिए अपने योगदान की चर्चा करते हुए अघा नहीं रही है. ताला उसने की खुलवाया और प्रारंभिक शिलान्यास का पुण्य भी उसने ही कमाया है. वह यह भी बता रही है कि उसने तो शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के नेतृत्व में मंदिर निर्माण के लिए रामालय ट्रस्ट भी बनवा दिया था. लेकिन वह इस सवाल का जवाब देने से कतरा रही है कि नरसिंह राव के नेतृत्व वाली उसकी सरकार ने विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद के निर्माण का संकल्प संसद में क्यों दोहराया था? यह भी कि विवादित ढ़ांचे के ध्वंस के बाद भाजपा की चार राज्य सरकारें बर्खास्त क्यों कर दी गयीं? आनन-फानन उपासना स्थल कानून क्यों बना दिया गया? सवाल तो यह भी मुंह बाये खड़ा रहता है कि एक सेक्युलर देश में पर्सनल लॉ बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग और मंत्रालय की क्या आवश्यकता है?
दरअसल कांग्रेस सांप्रदायिक शक्तियों की पुरानी इश्कबाज है. इश्कबाजी उसका पुश्तैनी धंधा रहा है. वह अमूमन अल्पसंख्यक, ब्राह्मण और दलित वोटों के गंठजोड़ के बूते सत्ता सुख भोगती रही है. राम मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मण बिदक गये, अल्पसंख्यक सपा, राजद जैसे क्षेत्रीय दलों की ओर लुढ़क गये और बसपा के उभार ने दलितों को कांग्रेस से अलग कर दिया. कांग्रेस इस वोट बैंक की वापसी या नया वोट बैंक बनाने के लिए छटपटा रही है.
असम, केरल के विधानसभा चुनाव परिणामों पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस की ओर लौट रहे हैं. लेकिन केवल इसी के भरोसे सत्ता नहीं मिल सकती है. इसलिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अजय राय, राजेंद्र पाल गौतम और इमरान मसूद के भरोसे एक नयी व्यूह रचना में लगी है. इनमें अजय राय सबसे कमजोर और इमरान मसूद सबसे मजबूत कड़ी लग रहे हैं. इमरान मसूद इन दिनों कांग्रेस आलाकमान के नयन तारे हैं. लगता है कांग्रेस उन्हें नया रफी अहमद किदवई जैसा नेता बनाने पर आमदा है. उन्हें पूरी छूट भी दी गयी है.
इमरान साहब खुलेआम सपा पर यह कहते हुए हमला बोल रहे हैं कि उसने आजम खां, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी का साथ नहीं दिया जबकि ये सभी सपा के प्रति वफादार रहे हैं. उन्होंने आगे कहा- सपा सनातनी बन रही है, लेकिन अल्पसंख्यकों के मसलों पर चुप्पी ओढ़ लेती है. इससे बौखलायी सपा के सांसद ने आरोप लगाया है कि इमरान मसूद ने भाजपा से सुपारी ले ली है. कांग्रेस आलाकमान इनकी जुबान पर ताला लगाये.
सपा के दूसरे सांसद कह रहे हैं कि सपा आखिर अल्पसंख्यकों के लिए और क्या करे? मुलायम सिंह यादव कार सेवकों पर गोलियां चलवाकर मुल्ला बन गये. अखिलेश को अकीलुद्दीन कह दिया गया. सपा-कांग्रेस के बीच ऐसी तुर्शी-वतुर्शी और बढ़ेगी. कारण यह है कि कांग्रेस समझौते में बराबरी का हक जता रही है तो सपा उसे दो विधायकों वाली पार्टी कह रही है.
ऐसा लगता है कि कांग्रेस अपनी खोयी जमीन हासिल करने के लिए नई रणनीति पर विचार कर रही है. उसने क्षेत्रीय दलों के सामने घुटने टेकने से इनकार करने का मन शायद बना लिया है. लेकिन उत्तर प्रदेश में सनातनी वोटों के लिए बेताबी का आलम यह है कि ओवैसी की पार्टी का एक प्रवक्ता टीवी चैनलों पर राम को भगवान बता रहा है.
सबसे बड़ी समस्या अखिलेश यादव के सामने है. यदि वह 2027 का चुनाव हार गये तो फिर सपा को नयी संजीवनी नहीं मिल पाएगी और उसके अभाव में पार्टी का शिराजा बिखर सकता है. इसलिए अखिलेश दबाव में हैं और कांग्रेस इसका फायदा उठाना चाहेगी.
अखिलेश की विवशता देखिए! सरकार रहते जिस सैफई में इंद्र का दरबार सजता था. वहां बॉलीवुड की अप्सरायें थिरकती थीं. गंधर्व गायन, वादन करते थे. माहौल और खर्चा-पानी ऐसा कि देवराज भी शर्मा जायें. सत्ता गयी तो उसी सैफई में शिव मंदिर बन रहा है. राजनीति जो न कराये.
कांग्रेस ने मंदिर का ताला मजबूरी में खुलवाया था. शाहबानों मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला संसद से पलटने के बाद कांग्रेस की इश्कबाजी नग्न हो गयी थी. तब अरूण नेहरू की सलाह पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश केएम पांडेय के एक आदेश के जरिये ताला खुलवा दिया गया. लेकिन सनातनी इससे संतुष्ट नहीं हुए. कुछ ऐसे ही हालात फिर बन रहे हैं. बरसाती सनातनी बने नेताओं और पार्टियों को खराद पर चढ़ाने की योजना बन चुकी है.
अगले महीने यानी अगस्त में कृष्ण जन्म भूमि की मुक्ति के लिए मथुरा में एक आयोजन होने जा रहा है. आयोजक अखिलेश को बुला रहे हैं. कांग्रेसियों से भी सहयोग-समर्थन का आग्रह किया जा रहा है. सरकार इस परिस्थिति से कैसे निपटेगी, वह जाने, लेकिन सनातनी तो जुटेंगे ही और उनमें भाजपाई भी होंगे.
दूसरी ओर बाबा रामदेव ने देश के सभी नागरिकों से आह्वान किया है कि वे स्वयं को ऋषियों-मुनियों की संतान मानें, अपनी पूजा पद्धति न छोड़ें, लेकिन राष्ट्र के उन्नयन के लिए समवेत स्वर में आगे आयें. वैसे तो इस बयान में कुछ गड़बड़ नहीं है, लेकिन सेक्युलरिस्टों के लिए यह अपील नागवार ही है.
तीसरी ओर मुखौटाधारी सनातनियों का मुकाबला भगवाधारी योगी आदित्यनाथ से है. वह आचार-विचार और आहार-व्यवहार से भी सनातनी हैं. वह सनातन के एक प्रतीक पुरुष हैं. उनका राष्ट्रवाद, विकास मॉडल और जन कल्याण के कार्य उनकी कार्यशैली की गवाही दे रहे हैं. उनकी एक यूएसपी जन सुरक्षा भी है. जब चुनाव प्रचार शुरु होगा और व्यूह रचे जायेंगे, तब पता चलेगा कि किसकी चाल पर जनता क्या सोचती है.
वैसे भाजपा तो चाहेगी ही कि विपक्ष उसकी बनायी सनातनी पिच पर ही बल्लेबाजी और गोलंदाजी करे ताकि उसके चाल चरित्र और चेहरे की सारी परतें उघेड़ी जा सकें. राम मंदिर में चोरी से आस्था घायल हुई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जनता किसी भ्रमजाल में फंस जाएगी. हां, यदि सनातन के मुद्दे पर भाजपा उत्तर प्रदेश हार जाएगी तो यकीनन उसके पराभव का सूत्रपात हो जाएगा और 2029 में केंद्र में सरकार बनाने का सपना चूर हो जाएगा. होइहिं सोई जो राम रचि राखा. यानी होगा वही जो राम चाहेंगे.
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