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इसलिए कांग्रेस से सब बिछड़ रहे बारी-बारी

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Dr. Santosh Manav सत्ता अमृत है. ऐसा अमृत, जो सबको चाहिए. कीमत चाहे कुछ भी हो. इसके लिए `यू टर्न` लेना पड़े, वर्षों जिनकी शरण में रहे, उन्हें गालियां देनी पड़े या `कुतर्क का पहाड़` गढ़ना पड़े, सब चलेगा. एक पंक्ति में कहना चाहें तो कह सकते हैं कि सत्ता के लिए सब चलेगा. अपने गुलाम नबी आजाद को ही लीजिए. गुलाम अब कांग्रेस से आजाद हो चुके हैं. नई-नई आजादी के बाद उन्होंने राहुल और सोनिया गांधी के बारे में क्या-क्या कहा, आप सब पढ़-सुन चुके हैं. जिस कांग्रेस पार्टी में उन्होंने जीवन के पांच दशक गुजारे. जिस पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, केंद्र में मंत्री, लोकसभा, राज्यसभा का सदस्य बनाया. जिस पार्टी के चार प्रधानमंत्री- इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की सरकार में वे मंत्री रहे, वही पार्टी अचानक बीमार हो गई! बीमारी भी लाइलाज. इसलिए गुलाम नबी बीमार पार्टी से आजाद हो लिए. गोया कांग्रेस वाली बीमारी उन्हें भी लग जाती. क्या बात इतनी भर है? एक सवाल है, अगर कांग्रेस गुलाम नबी को फिर से राज्यसभा में भेज देती या निकट भविष्य में पार्टी के केंद्र की सत्ता में वापसी की आस होती, तो गुलाम कांग्रेस से आजाद होते? क्या अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आजाद के बोल आज की तरह मीठे होते? दरअसल, प्रधानमंत्री के लिए सद्भावना और राहुल गांधी के लिए दुर्भावना के पीछे सत्ता प्राप्ति की चाह है- सत्ता अमृत की आस. ऐसा अमृत, जो चाहिए हर राजनीतिक को, पर जिसे पीकर कोई अमर नहीं हुआ. वे भी नहीं, जिनका नाम ही अमर था.

`सत्ता के लिए एक्जिट` भारतीय राजनीति में लाइलाज रोग

`सत्ता के लिए एक्जिट` भारतीय राजनीति में पुराना और लाइलाज रोग है. गुलाम नबी न पहले हैं न आखिरी. किसी पार्टी को सत्ता मिलती दिखती है, तो इंट्री शुरू हो जाती है और सत्ता मिलने की उम्मीद नहीं हो तो एक्जिट प्लान प्रारंभ हो जाता है. जब से बीजेपी के नायक नरेंद्र मोदी बने हैं, बीजेपी में इनकमिंग ज्यादा है और कांग्रेस में आउट गोइंग. आठ साल में कितने नेता गए. हजारों गए. 25-30 तो बड़े नाम हैं. कुछ तो ऐसे, जिनकी पीढियां कांग्रेस में रहीं. सत्ता सुख भोगती रहीं. मलाई चाभती रहीं. हाल ही में कपिल सिब्बल गए. हार्दिक पटेल, जयंती नटराजन, सुनील जाखड़, राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी के सुपुत्र अभिजीत मुखर्जी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, अमरिंदर सिंह, सुष्मिता देव, हेमंत विस्वा शर्मा ---. गिनते जाइए. सूची अंतहीन है. हिंदी फिल्म कागज के फूल का गीत याद कीजिए- ये खेल है कब से जारी, बिछड़े सभी बारी-बारी---.और ये बिछड़ना अभी जारी रहेगा. अनेक कतार में हैं. कुछ को बीजेपी से आश्वासन का इंतजार है. कुछ को अवसर का. चाहें तो आनंद शर्मा, मनीष तिवारी का नाम ले सकते हैं और देवयोग से कहीं कांग्रेस के हाथ सत्ता लगती दिखे, तो इसमें से अनेक हमसे भूल हो गई, हमको माफी दई दो गाते हुए इनकमिंग वाली लाइन में लग जाएंगे. सत्ता अमृत है ही ऐसी. जी ललचाए-रहा न जाए. सत्ता को लात मारकर अपनी नीति-सिद्धांत पर अडिग रहने वाले विरले ही होते हैं. अपने देश में ऐसे पुण्यात्मा नेता भी हुए हैं. कदाचित उनका ही पुण्य-प्रताप है कि प्रजातंत्र जीवित है. नहीं तो दलबदलू राजनीति का क्या हाल करते, उसकी कल्पना कर सकते हैं.

कांग्रेस में मुसलमान नेता का अभाव

दो सवाल और है- आजाद अब करेंगे क्या और उनके कदम से कांग्रेस को नुकसान कितना होगा? नुकसान तो तय है. किसी पार्टी से बड़ा विकेट गिरे, तो धरती डोलती ही है. गुलाम के आजाद होने से कांग्रेस को बड़ा फर्क जम्मू-कश्मीर में पड़ेगा. जम्मू में बीजेपी का दबदबा है और कश्मीर में महबूबा की पीडीपी और अब्दुल्ला के नेशनल कांफ्रेंस का. गुलाम नबी जम्मू-कश्मीर के सीएम रहे हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. उनका कम या ज्यादा प्रभाव दोनों क्षेत्रों में है. कांग्रेस को इस प्रभाव का लाभ नहीं मिल पाएगा. दूसरा घाटा यह है कि कांग्रेस के पास जम्मू-कश्मीर में कोई बड़ा नाम नहीं है. गुलाम नबी के पार्टी छोड़ने के बाद अनेक नेता उनके साथ हो लिए हैं. ऐसे में चुनाव के वक्त कांग्रेस को जम्मू -कश्मीर में पालकी ढोने भर लोग मिलना भी मुश्किल है. तीसरा नुकसान यह है कि पार्टी में अब मुसलमान नेता का अभाव है. अब बड़ा और पुराना नाम सलमान खुर्शीद का ही है. चौथा नुकसान यह है कि कांग्रेस पार्टी भारत जोड़ो अभियान प्रारंभ करने वाली है और ऐसे समय कांग्रेस तोड़ो प्रारंभ हो गया. यानी परसेप्शन कमजोर.

जम्मू कश्मीर के शिंदे हो सकते हैं आजाद

अब बड़ा सवाल. गुलाम नबी आजाद क्या करेंगे? कह चुके हैं कि वे जम्मू-कश्मीर में अपनी पार्टी बनाएंगे. अभी उनकी पार्टी इसी राज्य में सक्रिय रहेगी. प्रदेश में आजाद के प्रभाव से इंकार किसी को नहीं है. अगर वे कश्मीर क्षेत्र में पांच-सात सीटें भी निकाल लेते हैं, तो बड़ी बात हो सकती है. जम्मू क्षेत्र में बीजेपी सभी सीट जीतने की फिराक में है. यह संभव भी है. ऐसे में गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर के `शिंदे` हो सकते हैं. राजनीति संभावनाओं का खेल है. यहां कुछ भी असंभव नहीं है. दो बातें याद रखिए. अपने पीएम और गुलाम नबी यूं ही एक दूसरे की प्रशंसा नहीं कर रहे हैं. सत्ता अमृत के लिए कुछ भी चलेगा ! {लेखक दैनिक भास्कर सहित अनेक अखबारों के संपादक रहे हैं. फिलहाल लगातार मीडिया में स्थानीय संपादक हैं } यह भी पढ़ें : आप">https://lagatar.in/what-will-happen-to-you-janab-e-ali/">आप

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