`सत्ता के लिए एक्जिट` भारतीय राजनीति में लाइलाज रोग
`सत्ता के लिए एक्जिट` भारतीय राजनीति में पुराना और लाइलाज रोग है. गुलाम नबी न पहले हैं न आखिरी. किसी पार्टी को सत्ता मिलती दिखती है, तो इंट्री शुरू हो जाती है और सत्ता मिलने की उम्मीद नहीं हो तो एक्जिट प्लान प्रारंभ हो जाता है. जब से बीजेपी के नायक नरेंद्र मोदी बने हैं, बीजेपी में इनकमिंग ज्यादा है और कांग्रेस में आउट गोइंग. आठ साल में कितने नेता गए. हजारों गए. 25-30 तो बड़े नाम हैं. कुछ तो ऐसे, जिनकी पीढियां कांग्रेस में रहीं. सत्ता सुख भोगती रहीं. मलाई चाभती रहीं. हाल ही में कपिल सिब्बल गए. हार्दिक पटेल, जयंती नटराजन, सुनील जाखड़, राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी के सुपुत्र अभिजीत मुखर्जी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, अमरिंदर सिंह, सुष्मिता देव, हेमंत विस्वा शर्मा ---. गिनते जाइए. सूची अंतहीन है. हिंदी फिल्म कागज के फूल का गीत याद कीजिए- ये खेल है कब से जारी, बिछड़े सभी बारी-बारी---.और ये बिछड़ना अभी जारी रहेगा. अनेक कतार में हैं. कुछ को बीजेपी से आश्वासन का इंतजार है. कुछ को अवसर का. चाहें तो आनंद शर्मा, मनीष तिवारी का नाम ले सकते हैं और देवयोग से कहीं कांग्रेस के हाथ सत्ता लगती दिखे, तो इसमें से अनेक हमसे भूल हो गई, हमको माफी दई दो गाते हुए इनकमिंग वाली लाइन में लग जाएंगे. सत्ता अमृत है ही ऐसी. जी ललचाए-रहा न जाए. सत्ता को लात मारकर अपनी नीति-सिद्धांत पर अडिग रहने वाले विरले ही होते हैं. अपने देश में ऐसे पुण्यात्मा नेता भी हुए हैं. कदाचित उनका ही पुण्य-प्रताप है कि प्रजातंत्र जीवित है. नहीं तो दलबदलू राजनीति का क्या हाल करते, उसकी कल्पना कर सकते हैं.कांग्रेस में मुसलमान नेता का अभाव
दो सवाल और है- आजाद अब करेंगे क्या और उनके कदम से कांग्रेस को नुकसान कितना होगा? नुकसान तो तय है. किसी पार्टी से बड़ा विकेट गिरे, तो धरती डोलती ही है. गुलाम के आजाद होने से कांग्रेस को बड़ा फर्क जम्मू-कश्मीर में पड़ेगा. जम्मू में बीजेपी का दबदबा है और कश्मीर में महबूबा की पीडीपी और अब्दुल्ला के नेशनल कांफ्रेंस का. गुलाम नबी जम्मू-कश्मीर के सीएम रहे हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. उनका कम या ज्यादा प्रभाव दोनों क्षेत्रों में है. कांग्रेस को इस प्रभाव का लाभ नहीं मिल पाएगा. दूसरा घाटा यह है कि कांग्रेस के पास जम्मू-कश्मीर में कोई बड़ा नाम नहीं है. गुलाम नबी के पार्टी छोड़ने के बाद अनेक नेता उनके साथ हो लिए हैं. ऐसे में चुनाव के वक्त कांग्रेस को जम्मू -कश्मीर में पालकी ढोने भर लोग मिलना भी मुश्किल है. तीसरा नुकसान यह है कि पार्टी में अब मुसलमान नेता का अभाव है. अब बड़ा और पुराना नाम सलमान खुर्शीद का ही है. चौथा नुकसान यह है कि कांग्रेस पार्टी भारत जोड़ो अभियान प्रारंभ करने वाली है और ऐसे समय कांग्रेस तोड़ो प्रारंभ हो गया. यानी परसेप्शन कमजोर.जम्मू कश्मीर के शिंदे हो सकते हैं आजाद
अब बड़ा सवाल. गुलाम नबी आजाद क्या करेंगे? कह चुके हैं कि वे जम्मू-कश्मीर में अपनी पार्टी बनाएंगे. अभी उनकी पार्टी इसी राज्य में सक्रिय रहेगी. प्रदेश में आजाद के प्रभाव से इंकार किसी को नहीं है. अगर वे कश्मीर क्षेत्र में पांच-सात सीटें भी निकाल लेते हैं, तो बड़ी बात हो सकती है. जम्मू क्षेत्र में बीजेपी सभी सीट जीतने की फिराक में है. यह संभव भी है. ऐसे में गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर के `शिंदे` हो सकते हैं. राजनीति संभावनाओं का खेल है. यहां कुछ भी असंभव नहीं है. दो बातें याद रखिए. अपने पीएम और गुलाम नबी यूं ही एक दूसरे की प्रशंसा नहीं कर रहे हैं. सत्ता अमृत के लिए कुछ भी चलेगा ! {लेखक दैनिक भास्कर सहित अनेक अखबारों के संपादक रहे हैं. फिलहाल लगातार मीडिया में स्थानीय संपादक हैं } यह भी पढ़ें : आप">https://lagatar.in/what-will-happen-to-you-janab-e-ali/">आपका क्या होगा जनाब-ए-आली ? [wpse_comments_template]

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