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एक छद्म मसीहा के अध:पतन के अंतिम अध्याय का प्रारंभ!

अब तय है कि नीतीश जी राज्यसभा जा रहे हैं, संभवतः बिहार का सिंहासन भाजपा को सौंप कर! इसके साथ ही ‘सुशासन बाबू’, ‘विकास पुरुष’ आदि उपाधियों (वैसे उन पर चिपक गया ‘पलटूराम’ स्टिकर सबसे सटीक है) से नवाजे  जाते रहे और कथित जंगल राज के खात्मे का श्रेय लूटते रहे. नीतीश कुमार का हासिल और योगदान यह है कि उनको पूरे देश को ‘दानव राज’ बनाने के अभियान को मजबूती देने का श्रेय दिया जाएगा!  वे जिस जमात के साथ खड़े हैं, वह पूरी दुनिया पर ‘दानवी राज’ कायम करने में सहयोगी बनी हुई है!
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  • एक संभावनापूर्ण नेता ये हश्र!
  • राज्यसभा क्या 'ओल्ड एज होम' है?

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श्रीनिवास

अब तय है कि नीतीश जी राज्यसभा जा रहे हैं, संभवतः बिहार का सिंहासन भाजपा को सौंप कर! इसके साथ ही ‘सुशासन बाबू’, ‘विकास पुरुष’ आदि उपाधियों (वैसे उन पर चिपक गया ‘पलटूराम’ स्टिकर सबसे सटीक है) से नवाजे  जाते रहे और कथित जंगल राज के खात्मे का श्रेय लूटते रहे. नीतीश कुमार का हासिल और योगदान यह है कि उनको पूरे देश को ‘दानव राज’ बनाने के अभियान को मजबूती देने का श्रेय दिया जाएगा!  वे जिस जमात के साथ खड़े हैं, वह पूरी दुनिया पर ‘दानवी राज’ कायम करने में सहयोगी बनी हुई है!

 

नीतीश कुमार खुद को प्रखर समाजवादी डॉ लोहिया का अनुयायी बताते रहे हैं. लोहिया हमेशा नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ते थे. उनका मानना था कि सत्ता पक्ष के सबसे बड़े नेता के खिलाफ विपक्ष के भी बड़े नेता को पराजय की चिंता छोड़ कर चुनाव लड़ना चाहिए. उनके साथी उनसे राज्यसभा के रास्ते संसद जाने का सुझाव देते. मगर लोहिया मानते थे कि सक्रिय राजनीति में सक्रिय लोगों को राज्यसभा नहीं जाना चाहिए. उसे चोर रास्ता मानते थे. 1962 चुनाव हारने के बाद 1963 में एक उप चुनाव जीत कर लोकसभा के सदस्य बने. फिर 1967 में भी जीते. और जितने समय लोकसभा में रहे, वह लोहिया की धारदार बहसों के लिए याद किया जाता है. 1964 में नेहरू जी का निधन हुआ. उनके जीते जी लोहिया अपने तीखे सवालों से नेहरू और सरकार की परेशानी का कारण बने रहे.

 

नीतीश जी ने कहा है कि उनको बहुत मन था कि राज्यसभा भी जाएं! वे राज्यसभा में करेंगे क्या? राज्यसभा क्या 'ओल्ड एज होम' है? राज्यसभा को उच्च सदन माना जाता है- प्रबुद्ध लोगों का सदन. जिनकी चुनाव लड़ने में रुचि नहीं हैं लेकिन राज्य के नीति निर्धारण में जिनका योगदान हो सकता है, ऐसे लोगों के लिए है राज्यसभा. नीतीश जी किसी सार्थक गंभीर बहस में शामिल होने के काबिल भी हैं? 

 

सच यह है कि नीतीश कुमार को अपरिहार्य बोझ की तरह ढोती भाजपा का धैर्य जवाब दे रहा था और इनको सिंहासन खाली करना था. यही करना था तो विधानसभा चुनाव के बाद नखरा क्यों किया. उसी समय ससम्मान भाजपा को सत्ता सौंप देते. बेहतर होता राजनीतिक संन्यास की घोषणा कर देते. उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत के बारे में तरह-तरह के कयास तो लगाये ही जा रहे थे. वही बहाना बन सकता था. या 2024 के संसदीय चुनाव के बाद एक बार और पलटी मार देते. तब इतिहास में मोदी की पालकी के कहार के रूप में तो दर्ज नहीं होते. 

 

कम से कम 'जदयू' नाम के जेनरल स्टोर, जिसमें मौसम के हिसाब से सेकुलरिज्म, देशभक्ति से लेकर बिहार के डीएनए जैसे हर किसिम किसिम के सामान का सौदा होता रहा, को फाइनली बंद ही कर देते. अब इस कथित राजनीतिक दल की कोई उपयोगिता-प्रासंगिकता बची है? कुछ उधर जायेंगे, कुछ लज्जा छोड़ कर "देशभक्त" बन जायेंगे. जो चंद लोग सचमुच किसी 'विचार’ के कारण (वैसे संदेह ही है) टिके हुए थे, उन बेचारों के बारे में भी नहीं सोचा! या कि अंतिम बेला में 'सर्वोच्च' पद (वैसे वह कहने को ही सर्वोच्च संवैधानिक पद हैं) मिलने की उम्मीद है? वह पद मिल भी गया तो इससे आपका कद ऊंचा हो जायेगा? 

 

तमाम कमियों के बावजूद, लगता था कि नीतीश जी के पास बिहार के विकास की एक दृष्टि थी. उस दिशा में कुछ काम भी किया. मगर दिमागी व वैचारिक अस्थिरता के कारण इधर-उधर डोलते रह गये. कभी राजनीति में शालीनता के प्रतीक माने जाते रहे नीतीश कुमार की जुबान भी बाद के दिनों फिसलने और बहकने लगी. उनकी हालत देख कर वे दया के पात्र लगने लगे थे! ऐसा भी कुर्सी मोह! फिर भी आंदोलन के दौरान आप हमारे नेताओं में शुमार थे. बाद में जो भी हुआ, जो भी किया, बहुत निराश किया, लोहिया को बदनाम किया. फिर भी शुभकामनाएं.

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