लोग परेशान हैं. एक बड़ा वर्ग आशंकित है. पता नहीं कल क्या होगा? नौकरी बचेगी या नहीं? महंगाई बढ़ेगी तो बच्चे कैसे पढ़ेंगे? बीमार हो गए तो इलाज कैसे करायेंगे? पर कुछ लोग अब भी मोदी सरकार की गुणगान करने में लगे हैं. कह रहे कि सिर्फ 3 रुपये ही तो बढ़े हैं, दूसरे देशों का हाल देखो. मोदी जी हैं. इसलिए तीन रूपये ही बढ़े हैं. ऐसे लोगों की इन बातों से बड़ा झूठ कुछ भी नहीं. सच तो यह है कि मोदी सरकार के दस साल के कार्यकाल में भारत में तेल दूसरे देशों के मुकाबले ना सिर्फ ज्यादा महंगा हुआ, बल्कि आम लोगों को बेतहाशा लूटा गया. सरकारी खजाने को भरा गया और कंपनियों को भारी मुनाफा कमाने का मौका दिया गया.
पिछले दस सालों में तेल की कीमत बढ़ाने वाले टॉप 11 देशों में आस्ट्रेलिया सबसे ऊपर है. वहां दस सालों में तेल के दाम 67 प्रतिशत बढ़े हैं. दूसरे नंबर पर भारत है. भारत में तेल के दाम 63 प्रतिशत बढ़े हैं. तीसरे नंबर पर वियतनाम है, जहां दस सालों में तेल के काम में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. चौथे नंबर पर चीन (54 प्रतिशत), पांचवें पर थाइलैंड (48 प्रतिशत)), छठे पायदान पर यूके (42 प्रतिशत)), सातवें नंबर पर जर्मनी (40 प्रतिशत), आठवें नंबर पर साउथ कोरिया (39 प्रतिशत), नौवें नंबर पर यूएस (36 प्रतिशत), दसवें नंबर पर बांग्लादेश (35 प्रतिशत) और 11वें नंबर पर इटली (34 प्रतिशत) है.
दस साल में किस देश में कितने प्रतिशत कीमत बढ़े

दरअसल, भारत में पिछले दस सालों से पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ते रहे हैं. भारत में पहले से ही बेस रेट बढ़ा हुआ है. भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम उस समय कम ही नहीं किए गए, जब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें नीचे आई थीं. यानी सरकार ने पहले ही ऊंचा “base price” बना रखा था. अब उसी ऊंचे base से percentage निकालकर यह कहना कि “भारत में बढ़ोतरी बहुत कम हुई”, एक तरह से आंकड़ों का भ्रम फैलाना है.
जबकि असल सवाल यह नहीं है कि पिछले कुछ महीनों में दाम कितने प्रतिशत बढ़े. असल सवाल यह है कि पिछले 10 वर्षों में आम भारतीय ने पेट्रोल-डीजल के लिए कुल कितना भुगतान किया. जब क्रुड ऑयल सस्ता हुआ, तब सरकार ने टैक्स में बढ़ोतरी तक आम लोगों तक राहत नहीं पहुंचने दी. और जब वैश्विक संकट आया, तो यह कहा जा रहा है कि “देखिए, मोदी सरकार ने दो दूसरे देशों के मुकाबले कम बढ़ोतरी की है.
भारत में इस तरह की बातों को प्रचार किया जाना ठीक वैसी ही बात है, जिसमें किसी आदमी से पहले ही ज्यादा पैसा वसूल लिया जाए और बाद में कहा जाए कि “हमने नया बोझ कम डाला.” जबकि अगर दस सालों के आंकड़े पर गौर करें, तो तस्वीर बिल्कुल उल्टा दिखाई देगा.

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