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बिछने लगी है महाभारत की विसात

हमारा लोकतंत्र अचानक भीड़तंत्र में बदल रहा है. इस भीड़तंत्र को युवाओं की भावना का खाद-पानी दिया जा रहा है. जरुरत के हिसाब से युवाओं की जाति भी बतायी जा रही है और उसके आधार पर फर्जी मुकदमे भी लखवाये जा रहे हैं. उदाहरण के लिए निशु और उसके पिता संजय आजाद का मामला ही देख लीजिए.
 
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 बैजनाथ मिश्र

 

खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पच्चीस साल के सार्वजनिक जीवन को यादगार बनाने के लिए भाजपा सत्रह सितंबर से महीने भर का सेवा संकल्प अभियान चलाएगी. सत्रह सितंबर मोदी का जन्म दिवस है. यह तारीख हर साल आती है और पार्टी कुछ न कुछ करती ही है. लेकिन इस साल कुछ विशेष होगा. कारण यह है कि पार्टी ही नहीं, सरकार भी कई मोर्चों पर फंसी  हुई है या हिचकोले खा रही है. अगले साल ही आधा दर्जन राज्यों में चुनाव हैं. इनमें उत्तर प्रदेश भी है और यदि यह राज्य हाथ से निकल गया तो 2029 की बोहनी ही खराब हो जाएगी.

 

हमारा लोकतंत्र अचानक भीड़तंत्र में बदल रहा है. इस भीड़तंत्र को युवाओं की भावना का खाद-पानी दिया जा रहा है. जरुरत के हिसाब से युवाओं की जाति भी बतायी जा रही है और उसके आधार पर फर्जी मुकदमे भी लिखवाये जा रहे हैं. उदाहरण के लिए निशु और उसके पिता संजय आजाद का मामला ही देख लीजिए. मामूली मारपीट का मामला एससी-एसटी एक्ट में बदल दिया गया है. एक बड़बोला सवर्ण युवा जेल चला गया है और प्रधानमंत्री के श्राद्ध का भोज खिला रही निशु इतरा रही है. इस क्रिया की प्रतिक्रिया भी कम जहरीली नहीं है. न्यायपालिका के हाथ पांव फूले हुए हैं और डरा-सहमा पुलिस महकमा अपने अधिकार कर्तव्य खूंटी पर टांग चुका है.

 

भारतीय समाज टुकड़ों में बंटता नजर आ रहा है. यह बंटा हुआ या भ्रमित समाज भाजपा को डरा रहा है. नरेंद्र मोदी सब समझ रहे हैं. उनकी खूबी यह है कि वह समस्याओं के समाधान का दायित्व स्वयं उठाते हैं. उन्हें आउटसोर्सिंग पर भरोसा नहीं है. वह “वह कर बहिया बल अपनो छाड़ बिरानी आस” के हिसाब से चलते हैं और विपक्ष इसीलिए अमूमन मात खा जाता है.

 

मोदी दिल्ली के श्रीराम कॉलेज और बडोदरा में युवाओं के कार्यक्रम के जरिये नाराज फूफा के जुमले से साफ कर चुके हैं कि वह अपनी लड़ाई विकास के मुद्दे पर लड़ेंगे.

 

अब उनके जन्म दिवस पर “आशीर्वाद का दीया” जलेगा. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर का होगा. इस कार्यक्रम के तहत सरकारी योजनाओं के लाभार्थी मोदी के प्रति आभार जताते हुए दीप जलायेंगे. इन दीयों के माध्यम से विकसित भारत का संकल्प दोहराया जाएगा. विपक्ष को यह बताया-दिखाया जाएगा कि देखो हमने क्या किया है, हमारे साथ कितने लोग हैं और इनके मुकाबले तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है. महीने भर चलने वाले इस अभियान में “सेवा ज्योति कलश” यात्रा भी नकलेगी. इसमें पदयात्रा, साइकिल और मोटरसाइकिल यात्रायें भी होंगी. प्रखंडों में सेवा सेतु शिविर लगेंगे और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित लोगों को लाभ भी दिलाया जाएगा.

 

पार्टी की बीस युवा टीमें मोदी के जन्मस्थान (वडनगर, गुजरात) से उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी के बीच युवाओं से संवाद करेंगी. इस पूरी कवायद का मकसद संगठन को सक्रिय करना है, ताकि वर्तमान और आनेवाली चुनौतियों से जमीनी स्तर पर निपटा जा सके. यदि प्रस्तावित कार्यक्रम थोड़ा-बहुत भी सफल हो जाये तो अगले साल के चुनावी राज्यों में विपक्ष की तिकड़म काम नहीं कर पाएंगी. गुजरात में तो खैर भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में कोई दल दिखाई नहीं दे रहा है. कांग्रेस बेदम और खस्ताहाल है. केजरीवाल की पार्टी बीच-बीच में फुदकती जरुर है, लेकिन वह पंजाब बचा ले जाएगी, यह भी संदेहास्पद है. यहां कांग्रेस में अंदरुनी खटपट है. लेकिन भाजपा हारे या जीते, वह लड़ेगी बहुत तेज. तभी तो अकाली दल उसके साथ तालमेल के लिए बेचैन है. भाजपा बराबरी का हिस्सा चाहती है, अन्यथा अकेले लड़ेगी. यदि ऐसा हुआ तो यकीन मानिए अकाली का शिराजा बिखर जाएगा. कांग्रेस एकजुट हो गई तो केजरीवाल की पार्टी फंसेगी.

 

अलबत्ता उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह पहले जैसी आसान नहीं है. हालांकि कानून-व्यवस्था और विकास के मोर्चे पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की कोई सानी नहीं है, लेकिन जातीय गोलबंदी भाजपा को परेशान जरुर करेगी. बसपा के कमजोर होते जाने से दलित वोटों में बड़े पैमाने पर बिखराव होगा. इसीलिए सपा मुखिया अखिलेश यादव नीला दुपट्टा ओढ़कर घूमने लगे हैं. यदि कांग्रेस-सपा के बीच ठीक-ठाक तालमेल हो गया तो भाजपा की राह कंटकाकीर्ण हो सकती है. हालांकि वह अपने कमंडल में मंडल को समेटने के प्रयास में लगी है और संजय निषाद, ओम प्रकाश राजभर, जयंत चौधरी आदि सध गये तो कोई बड़ी दिक्कत नहीं आएगी. कांग्रेस सपा से मोल तोल में लगी है.कांग्रेस का मानना है कि पूरे देश में मुस्लिम वोटों की वह पहली हकदार है. वह मुस्लिम लीग के साथ मिलकर केरलम में सरकार चला रही है. इस सरकार में मुस्लिम लीग के पांच मंत्री हैं जो आजादी के बाद एक रिकॉर्ड है.

 

वंदेमातरम् पर कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस से भिड़ गयी है. नौ सितंबर को एक फिल्म फेस्टिवल में पूरा वंदे मातरम् गाया गया और मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला, फारुक अब्दुल्ला खड़े रहे. इस सरकार में लगभग सभी मंत्री मुस्लिम हैं. उन्हें पूरा वंदे मातरम् से एकराज नहीं है. लेकिन कांग्रेस को है. सपा भी पूरी तरह मुस्लिम वोटों के भरोसे है. उधर आदित्यनाथ हिंदू आइकॉन बने हुए हैं. मुस्लिम वोट वहीं जाएगा जो भाजपा को हराता नजर आएगा. लेकिन यदि कांग्रेस ज्यादा सीटों के लिए अड़ गयी और सपा से गंठबंधन नहीं हुआ तो दोनों पिट जायेंगे. वैसे भी यदि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण घनीभूत हुआ तो उसके समानांतर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भी होगा.

 

सपा के साथ एक समस्या उसका अतीत है. जिस दलित वोट के लिए छीना झपटी मची है, वह सपा के गुंडों से आतंकित रहा है. कुछ वैसे ही जैसे बिहार में जंगलराज की वापसी के भय से मतदाताओं ने राजद के विरुद्ध गोलबंदी कर दी थी. सपा इस खतरे को भांप रही है. इसलिए वह अपने पीडीए फॉर्मूले का फुलफॉर्म रोज बदलती रहती है, ताकि कंफ्यूजन पैदा हो.

 

भाजपा के लिए फिलहाल बड़ा सिरदर्द सवर्ण बने हुए हैं, वे न सपा को पसंद करते हैं, न कांग्रेस को. लेकिन वे नोटा का भी विकल्प चुन सकते हैं. सवर्णों की नाराजगी का एक कारण यूजीसी वाला आदेश तो है ही, एससी-एसटी कानून के बढ़ते मामले भी हैं. हालांकि उनकी शिकायत आदित्यनाथ से कम, नरेंद्र मोदी से ज्यादा है.

 

सपा-कांग्रेस को लग रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम की पुनरावृत्ति उत्तर प्रदेश में हो सकती है. तब भाजपा पिट गयी थी. तब यह जुमला भी चला था कि मोदी-शाह योगी को हटाने की योजना बना रहे हैं और वे आरक्षण भी खत्म करने वाले हैं. तथ्य यह भी है कि तब टिकट बंटवारे में योगी को किनारे कर दिया गया था. क्या विधानसभा चुनाव में भी योगी की अनदेखी होगी? योगी कह चुके हैं कि वह नौकरी करने नहीं आये हैं. वह कभी भी अपने मठ लौट जायेंगे. इसलिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस बार पुरानी गलतियां नहीं दोहराएगा.

 

इस बीच उत्तर प्रदेश में कृष्ण जन्मभूमि का मामला भी नये सिरे से गरम हो रहा है. स्वयं को कृष्ण का वंशज रहे अखिलेश एक सीमा से आगे नहीं जा पायेंगे. उन्होंने महिलाओं को सलाना चालीस हजार देने की घोषणा कर तुरुप चाल चल दी है. इसके जवाब में आदित्यनाथ ने सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़ी एक करोड़ महिलाओं को ब्याजमुक्त एक लाख ऋण देने का एलान कर नहले पर दहला दे मारा है. वह अन्य महिलाओं को भी 50 हजार देने की भी घोषणा कर सकते हैं. लेकिन जब ब्याजमुक्त ऋण की पहली किस्त बीस हजार रुपये दिसंबर में ही ट्रांसफर हो जायेंगे, तब फरवरी-मार्च में चुनाव की चाल कितनी निराली-मतवाली होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

 

उधर, मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को एक बार फिर पार्टी से अलग कर दिया है. वह कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने की वकालत कर रहे थे. मायावती ने चार युवा नेताओं की एक टीम बनाकर नया पासा फेंका है. इस टीम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, पिछड़ा और दलित हैं. दूसरी तरफ असदुद्दीन ओवैसी, चंद्रशेखर रावण के साथ तालमेल की कोशिश में हैं. यह तालमेल हो या नहीं, हर हाल में यह गंठबंधन एक फीसदी वोट भी शायद खींच पाये.

 

कांग्रेस वैसे तो राज्य में दो विधायकों वाली पार्टी है. ये दोनों ब्राह्मण हैं. लेकिन इस बार कांग्रेस सपा से कम से कम एक सौ सीटें मांग रही है. सपा मजबूर है. वह कांग्रेस की नहीं सुनेगी तो मुस्लिम वोट बंटेंगे. तब कांग्रेस का तो जो होगा सो होगा, सपा के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लग जाएगा. उत्तर प्रदेश में राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला ठिठक सा गया है. अलबत्ता कांग्रेस के कुछ नेता नये सीइओ की नियुक्ति में साजिश देख रहे हैं. लेकिन यह आवाज धीमी है. उन्हें इस मुद्दे के बैक फायर करने का भय सता रहा है. बहरहाल, उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति की बिसात बिछने लगी है. कुछ प्यादों को फर्जी बनाकर टेढ़ी चाल चलने के लिए कह दिया गया है. हाथी, घोड़े, वजीर सेट किये जा रहे हैं. यह चुनाव देश की भावी राजनीतिक दशा-दिशा तय करेगा. इसलिए कोई कोर कसर छोड़ने वाला नहीं है. इस बार उत्तर प्रदेश का चुनाव सचमुच महाभारत जैसा ही होगा जहां क्षेत्रवार व्यूह रचनाएं होंगी और व्यूह अभेद्य बनाने का प्रयास होगा.

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