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प्रियंका गांधी पर नाराज देश के शीर्ष शिक्षाविद!

खबरों के मुताबिक कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी की एक टिप्पणी को लेकर 215 कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों और शिक्षाविदों ने खुला पत्र लिख कर नाराजगी जताई है. उन्होंने वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के सम्मान, अकादमिक गरिमा और तर्क आधारित सार्वजनिक विमर्श को बनाये रखने की अपील की है.
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टिप्पणी

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श्रीनिवास

खबरों के मुताबिक कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी की एक टिप्पणी को लेकर 215 कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों और शिक्षाविदों ने खुला पत्र लिख कर नाराजगी जताई है. उन्होंने वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के सम्मान, अकादमिक गरिमा और तर्क आधारित सार्वजनिक विमर्श को बनाये रखने की अपील की है. 

 

गत 30 जुलाई को लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने नीट पेपर लीक रोकने के लिए सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय कमेटी के एक सदस्य का जिक्र करते हुए उनको 'गो-मूत्र एक्सपर्ट' कह दिया था. प्रियंका ने किसी का नाम नहीं लिया था, मगर उनका इशारा आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो वी कामकोटि की ओर था, इसमें कोई संदेह नहीं! इसलिए कि श्री कामकोटि ने 15 जनवरी 2025 को चेन्नई में 'गो संरक्षण शाला' में मट्टू पोंगल के कार्यक्रम में गोमूत्र को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा था कि गोमूत्र में एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और एंटी-इंफ्लैमेटरी गुण होते हैं. यह भी कि यह पाचन और पेट की समस्याओं के लिए, खासकर इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी बीमारियों में उपयोगी है. उस समय भी इस पर काफी बहस हुई थी. कुछ लोगों ने तंज किया था, तो कुछ ने समर्थन भी. 

 

बेशक प्रियंका गांधी ने जो कहा, वह कटाक्ष था, जिससे उनको बचना चाहिए था. कोई संदेह नहीं कि इस तरह के पारंपरिक ज्ञान का अपना महत्त्व है. हर देश और समाज में इनका उपयोग भी होता रहा है. उनका मजाक उड़ाना सही नहीं है. मगर इन शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया और श्री कामकोटि की प्रशंसा में सत्ता पक्ष के नेताओं के कूद पड़ना भी अनायास और सामान्य नहीं है.

 

मुझे नहीं मालूम कि इन 215 कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों  और शिक्षाविदों में वैज्ञानिक कितने हैं, पर मुझे नहीं लगता कि ये देश के वैज्ञानिक समुदाय के प्रतिनिधि हैं. वैसे अब तो कतिपय वैज्ञानिक भी प्राचीन भारत के चमत्कारिक ज्ञान की महिमा का बखान करने लगे हैं, ‘इसरो’ के वैज्ञानिक अंतरिक्ष लांच करने के बाद ‘बालाजी’ से उसकी सफलता के लिए पूजा-अर्चना करने लगे हैं! अब यह भी रहस्य नहीं है कि 2014 के बाद देश के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में 'संघ' से प्रभावित और संघ से अनुमोदित 'शिक्षाविदों' की नियुक्ति होती रही है, 'वैज्ञानिक चेतना' के प्रति जिनकी समझ संदिग्ध रहती है. 

 

प्रियंका गांधी की टिप्पणी से आहत इन शिक्षाविदों से पूछा जा सकता है कि जब प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों के एक समारोह में 'गणेश' के धड़ पर शिशु हाथी का सिर लगा दिये जाने की एक मिथकीय कथा के आधार प्राचीन भारत में 'प्लास्टिक सर्जरी' का ज्ञान होने का दावा किया था, तब आपने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की थी? क्या आप मानते हैं कि मोदी जी के उस दावे का कोई वैज्ञानिक आधार है? जब मोदी जी ने वायु सेना को बताया था कि बादलों के रहते 'राडार' काम नहीं करते, तब आपको वह अटपटा और हास्यास्पद लगा था? लगा था तो क्या भयवश या अपने भविष्य की चिंता के कारण चुप रह गये थे या मानते हैं कि उन्होंने सही कहा था? 

 

क्या आप भी मानते हैं कि पश्चिमी देशों ने भारतीय ज्ञान को चुरा कर उसे अपना आविष्कार बता दिया? हां, तो या तो आप कूढ़ मगज हैं या आप ‘हिंदू राष्ट्र’ के राजनीतिक अभियान का हिस्सा हैं या फिर सत्ता की कृपा आपके लिए अधिक महत्वपूर्ण है! यह मसला भी उनके लिए एक ‘वैज्ञानिक’ पर तंज के बजाय ‘आस्था’ का मामला है! हमारी जानकारी में कामकोटि सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. सहज जिज्ञासा होती है कि उनकी प्रसिद्धि सिर्फ उनके गोमूत्र विशेषज्ञ होने के कारण है या कोई और उपलब्धि भी है?

 

उल्लेखनीय है कि संविधान के नीति निदेशक तत्वों में वैज्ञानिक चेतना का विकास और उसे समाज में प्रोत्साहित करना राज्य (सरकार) का दायित्व माना गया है. बेशक नीति निदेशक तत्व बाध्यकारी नहीं हैं, मगर संविधान में इनके होने का अपना महत्व है. हर नागरिक का भी कर्तव्य है कि वह अपनी वैज्ञानिक चेतना का विकास करे और समाज में भी इसके विकास के प्रति सचेष्ट रहे. मगर सरकारों का रवैया यह रहा है कि उनमें से जो अपने राजनीतिक हितों के अनुकूल लगता है, उसे लागू करने के लिए नीति निदेशक तत्व का तर्क देती हैं; जैसे मौजूदा सरकार ने 'समान नागरिक संहिता' के लिए दिया, मगर अंधविश्वास पर आधारित मान्यताओं-कर्मकांडों को 'आस्था' के नाम पर स्थापित करने में लगी रहती है.

 

पारंपरिक ज्ञान का मजाक उड़ाने का समर्थन नहीं किया जा सकता. मगर इस कथित मजाक पर ऐसे 'शिक्षाविदों' की नाराजगी को भी गंभीरता से नहीं लिया जा सकता, जो आम तौर पर आधुनिक विज्ञान को तुच्छ बताने या उसकी सीमा बताने में लगे रहते हैं.

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