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ठाकरे-पवार के वो दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था

बैजनाथ मिश्र

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बैजनाथ मिश्र

महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में संपन्न हुए चुनावों के नतीजे आ गये हैं. इनमें से करीब दो दर्जन निगमों में भाजपा अकेले या अपने सहयोगियों के साथ विजयी घोषित हई है. इनमें सबसे खास मुंबई की जीत है जहां मतदाताओं ने ठाकरे ब्रैंड का बैंड बजा दिया है. भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति की जीत के नायक रहे हैं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस. हालांकि तथ्य यह भी है कि महायुति में तो सभी नगर निगमों में मुकम्मल तालमेल नहीं ही हुआ था, लेकिन विपक्षी गंठबंधन (महाविकास अघाड़ी) भी मुंबई से लेकर जहां-तहां छितराया हुआ था. 

 

इन चुनावों में भाजपा ने अपने राष्ट्रीय नेताओं को नहीं उतारा था. कांग्रेस ने भी अपने कद्दावर नेताओं को प्रचार में नहीं झोंका था. शिवसेना के दोनों गुटों और एनसीपी के दोनों धड़ों के पास कोई राष्ट्रीय नेता है ही नहीं. यानी चुनाव स्थानीय नेताओं के बूते लड़ा गया और जो परिणाम आये हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि देवेंद्र फडनवीस ने इतिहास रच दिया है. विजय का ऐसा इतिहास न महाराष्ट्र के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत राव चव्हाण रच पाये, न चाणक्य के विशेषण से विभूषित शरद पवार, ना ही हिन्दुत्व और मराठी अस्मिता की गर्जना करने वाले बाला साहेब ठाकरे. पूरे महाराष्ट्र में अपनी धमक और चमक बिखेरने का अपूर्व कीर्तिमान फडनवीस ने ही कायम किया है. 

 

इन चुनावों में लोकशाही के आगे घरानाशाही ध्वस्त हो गयी है. शरद पवार ने चुनाव से ठीक पहले भतीजे अजित पवार से हाथ मिला लिया. अजित पवार फडनवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं. बावजूद इसके वह चाचा के साथ इस उम्मीद में गये कि कम से कम पुणे, पिंपरी, चिंटवण और कोल्हापुर आदि में विजय पताका फहराकर अपनी हैसियत का भान करा सकेंगे. इस गुमान में उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के खिलाफ अपशब्द भी कहे. लेकिन नतीजे ऐसे आये कि दिल के अरमां आंसुओं में बह गये. उनके गढ़ में ही भाजपा ने उन्हें बुरी तरह निचोड़ दिया है. 

 

दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे ने अपने बदतमीज चचेरे भाई राज ठाकरे से बीस साल बाद हाथ मिला लिया. इससे बिदक कर कांग्रेस अलग हो गयी और एक स्थानीय दलित मोर्चा से गंठबंधन कर लिया. इस उम्मीद में कि मुस्लिम-दलित और पार्टी के परंपरागत वोटों के सहारे वह एक बड़ी लकीर खींच लेगी. लेकिन विलासराव देशमुख द्वारा सिंचित जमीन लातूर के अलावा वह कहीं बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पायी. मुंबई में तो वह बामुश्किल बीस सीटों का आंकड़ा पार कर सकी. इसका कारण यह रहा कि मुस्लिम वोट कहीं ओवैसी खींच ले गये, तो कुछ समाजवादी पार्टी की ओर लुढ़क गये. एक छोटा हिस्सा उद्धव ठाकरे के साथ इस उम्मीद में चला गया कि वह भाजपा को शिकस्त दे देंगे. नतीजा यह हुआ कि ठाकरे की हालत तो थोड़ी जरुर सुधरी, लेकिन कांग्रेस की स्थिति "गये मियां रहीमा, न एहि मा न ओही मा" वाली हो गयी. 

 

यदि ठाकरे बंधुओं का मिलन नहीं होता और कांग्रेस उद्धव साथ होती तो मुंबई की तस्वीर भिन्न होती. लेकिन ऊपरवाला जब तकलीफ देना चाहता है तो सबसे पहले बुद्धि भ्रष्ट कर देता है. राज ठाकरे दक्षिण भारतीयों को "उठा लुंगी बजा पुंगी" जैसी गालियां दे रहे थे. बिहारियों और दूसरे हिन्दी भाषियों को थप्पड़ मारने का अभियान चला रहे थे. ठाकरे बंधु यह भूल गये थे कि मुंबई में सिर्फ मराठीभाषी नहीं रहते है. वहां चालीस फीसदी ही मराठी है तो इतने ही गैर मराठी और बीस फीसदी मुस्लिम. यानी ठाकरे ब्रदर्स ने अपनी कारस्तानियों से गैर मराठियों-गुजरातियों, दक्षिण भारतियों, उत्तर भारतीयों और अन्य परप्रांतीयों को अपने से अलग कर लिया और मराठी वोट भी बंट गये. 

 

गनीमत रही कि मुंबई में मात्र 53 फीसदी ही वोट पड़े. यदि मतदान दो-चार फीसदी भी बढ़ जाता तो जीत का फासला अधिक हो जाता. जिस मुंबई को ठाकरे परिवार अपनी जागीर समझता था, जहां वह तीन दशक से काबिज था, जिसकी बदौलत उसकी पार्टी का खर्चा-पानी चलता था, उस जागीर के मालिक अब फडनवीस हैं. 

 

इन चुनाव परिणामों का एक साईड इफेक्ट यह भी है कि मुस्लिम वोटों ने अपने बीच की पार्टियों और उम्मीदवारों को तरजीह दी है. मसलन, मालेगांव महानगर में स्थानीय इस्लाम पार्टी और ओवैसी की पार्टी ने दो तिहाई सीटें हथिया ली है. मुंबई, अमरावती, संभाजीनगर, मुंब्रा में भी ओवैसी ने अच्छी सफलता हासिल की है. 

 

भाजपा को सबसे अधिक वोट युवाओं और महिलाओं ने दिया है. अधेड़ लोगों ने भी उसकी झोली भरी है. महाराष्ट्र का समूचा आकांक्षी वर्ग जो सिर्फ विकास चाहता है उसने भाजपा को सिर पर बैठा लिया है और परिणाम यह हुआ कि जो भी खुद को तुर्रम खां समझते थे उन्हें बता दिया कि "वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था." इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उद्धव की पार्टी खत्म हो जाएगी. राजनीति में हार-जीत होती रहती है. भाजपा भी दो सीटों से बढ़कर आज सत्ता के शीर्ष पर है. लेकिन ठाकरे परिवार की समस्या यह है कि मुंबई हाथ से निकल जाने और अन्य किसी नगर निगम में सत्ता नहीं मिलने के कारण उसकी हालत "जल बिनु मीन पियासी" वाली हो गयी है. उसे खुद को बचाने के लिए अहंकार की अट्टालिका से नीचे उतरना होगा, लफ्फाजी छोड़नी होगी और धरातल पर आम मुंबईकरों के साथ खड़ा होकर उनकी समस्याओं के समाधान के लिए लड़ना होगा. 

 

दरअसल, महाराष्ट्र में यह चुनाव इन्क्लूसिव और एक्सक्लूसिव का था. विपक्षी दलों को पता नहीं क्यों कुछ समूहों से गुरेज था जबकि फडनवीस अपनी सभाओं में सबके भले की और उनकी दुश्वारियां दूर करने की बात करते थे. ठाकरे बंधु यह बता ही नहीं पाये कि उन्होंने तीस वर्षों में मराठियों को बड़ा-पाव और मिशेल पाव के सिवा दिया ही क्या है? न ड्रेनेज की समस्या हल हुई, न सड़कें बनीं, न मेट्रो और ना ही कोस्टल एऱिया का विकास हुआ. मतदाताओं को लगा कि जिस तरह फडनवीस विकास पर फोकस कर रहे हैं, उससे महाराष्ट्र खासतौर से मुंबई की तस्वीर बदलेगी. 

 

मुंबई का सालाना बजट (पचहत्तर हजार करोड़) गोवा और नॉर्थ ईस्ट के कई राज्यों से अधिक है. यहां एशिया के सबसे ज्यादा रईस रहते हैं. यहां बड़ी-बड़ी अट्टालिकायें हैं तो झुग्गी झोपड़ियां भी उतनी ही हैं. एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धरावी भी यहीं है. यहां हॉलीवुड से ज्यादा फिल्में बनती हैं. लेकिन हर साल बारिश में लोग फंसते हैं, मरते हैं और बेघर हो जाते हैं. ठाकरे की सेना की यही उपलब्धियां हैं. 

 

बहरहाल फडनवीस ने यह सब ठीक करने का बीड़ा उठाया है. उनका काम दिख भी रहा है, लेकिन नगर निगमों में महाविजय ने उनका कद बड़ा कर दिया है. अब वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद योगी आदित्यनाथ की कतार में आ गये हैं. उद्धव ठाकरे ने उन्हीं के कारण भाजपा से दोस्ती तोड़ी थी और उसी फडनवीस ने न केवल शिवसेना तोड़ दी, गच्चा देनेवाले शरद पवार की पार्टी तोड़ डाली, आज खुद मुख्यमंत्री हैं और निगम चुनावों में सबका सूपड़ा साफ कर दिया है. 2012 में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने पहले संगठन दुरुस्त किया, कार्यकर्ता खड़े किये, उनका मनोबल बढ़ाया और आज वह भाजपा ही नहीं पूरे महाराष्ट्र के निर्विवाद नेता बन गये हैं. नागपुर के एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार से निकले फडनवीस कई मिथक तोड़ चुके हैं. यदि उनकी यही रफ्तार रही तो वह मोदी के बाद कौन का उत्तर भी हो सकते हैं.  

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