तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में हिंसा की घटना को लेकर प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है. राजनीतिक कार्यकर्ताओ की छोड़ दीजिये, इन प्रतिक्रियाओं में पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग भी सोशल मडिया पर कहीं ज्यादा उत्साहित/आनंदित दिख रहा है. जो बोया सो काटा, जैसे को तैसा सरीखे कहावत प्रतिक्रियाओं में तारी हैं.
पत्रकारों के लिए कुटाई, ठुकाई कहना-लिखना तो वैसे ही अब आम है. मत भूलिये, भारतीय राजनीति में गरिमा, सुचिता, लोकलाज, मूल्य,आलोचना, समालोचना, बहस, सुनने व सहने का लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है. भारतीय संसद, भारत गणराज्य का सर्वोच्च विधायी निकाय है. और अभिषेक उसी संसद का एक सदस्य हैं. अगर टीएमसी ने कुछ किया, कराया तो उसकी सजा जनता ने चुनाव में दे दी है. बाकी कानून भी अपना काम कर रहा है. रोज नेता, माफिया, गुंडे, टपोरी टंगा ही रहे हैं. जनता में आक्रोश है, लेकिन ‘बदले की राजनीति’ में आखिर पश्चिम बंगाल यह सब कब तक देखे.
इस आंच को हवा देने से क्या कुछ बदलने वाला है? याद रहे, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत असहमति है और उसकी सबसे बड़ी हार हिंसा. जो घटना हुई है, उसे बिल्कुल हटकर देखा जाना चाहिए. इसलिए कि डर इसके ‘परकने’ (चस्का लगने) का है.
डिस्क्लेमरः लेखक झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया से साभार ली गयी है.
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