Search

 
 
 

परिंदा की आग, क्रांतिवीर के संवाद और नटसम्राट का मौन अब भी जिंदा है

National News : नाना पाटेकर की जिंदगी पर बात करें तो उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को विश्वनाथ पाटेकर के रूप में मुंबई के निकट मुरुड-जंजीरा में एक मराठी परिवार में हुआ था. बचपन संघर्षों से भरा रहा. जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से वाणिज्यिक कला की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने छोटे-मोटे काम किए, पोस्टर पेंट किए और मंच पर कदम रखा. मां के प्रोत्साहन और पिता की नाटकों के प्रति रुचि ने उनमें अभिनय की ललक जगाई.
 
नाना पाटेकर (फाइल फोटो)

Lagatar Desk

8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा के डोना पाउला में एक खामोशी छा गई. भारतीय सिनेमा का वह तेजस्वी चेहरा चुप हो गया, जिसकी आवाज दशकों तक परदे पर गूंजती रही. उनका नाम है नाना पाटेकर. वह शरीर के रुप में नहीं रहें, लेकिन ‘परिंदा’ की आग, ‘क्रांतिवीर’ के संवाद और ‘नटसम्राट’ का मौन अभी भी परदों पर जिंदा है. भारतीय सिनेमा ने अपना एक सबसे ईमानदार और शक्तिशाली अभिनेता खो दिया.


वे अपने घर में बेहोश पाए गए. सीने में तेज दर्द की शिकायत के बाद मेडिकल टीम पहुंची, मौके पर कार्डियक मसाज दी गई और उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया. सुबह करीब 5:20 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. प्राथमिक जानकारी के अनुसार हृदय गति रुकने से उनका निधन हुआ.


नाना पाटेकर की जिंदगी पर बात करें तो उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को विश्वनाथ पाटेकर के रूप में मुंबई के निकट मुरुड-जंजीरा में एक मराठी परिवार में हुआ था. बचपन संघर्षों से भरा रहा. जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से वाणिज्यिक कला की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने छोटे-मोटे काम किए, पोस्टर पेंट किए और मंच पर कदम रखा. मां के प्रोत्साहन और पिता की नाटकों के प्रति रुचि ने उनमें अभिनय की ललक जगाई.

 

नाना पाटेकर की फिल्में

1978–1989

  • गमन (1978)
  • आज की आवाज (1984)
  • अंकुश (1986)
  • माफीचा साक्षीदार (1986, मराठी)
  • प्रतिघात (1987)
  • सलाम बॉम्बे! (1988)
  • परिंदा (1989)

1990–1999

  • थोड़ा सा रूमानी हो जाए (1990)
  • प्रहार: द फाइनल अटैक (1991) — अभिनय और निर्देशन
  • दिशा (1991)
  • दीक्षा (1991)
  • राजू बन गया जेंटलमैन (1992)
  • अंगार (1992)
  • तिरंगा (1993)
  • क्रांतिवीर (1994)
  • हम दोनों (1995)
  • अग्नि साक्षी (1996)
  • खामोशी: द म्यूजिकल (1996)
  • गुलाम-ए-मुस्तफा (1997)
  • यशवंत (1997)
  • युगपुरुष (1998)
  • वजूद (1998)
  • हू तू तू (1999)
  • कोहराम (1999)

2000–2009

  • गैंग (2000)
  • तर्कीब (2000)
  • वध (2002)
  • शक्ति: द पावर (2002)
  • भूत (2003)
  • डरना मना है (2003)
  • आंच (2003)
  • अब तक छप्पन (2004)
  • अपहरण (2005)
  • ब्लफमास्टर (2005)
  • टैक्सी नंबर 9211 (2006)
  • हैट्रिक (2007)
  • यात्रा (2007)
  • वेलकम (2007)
  • दस कहानियां (2007)

2010–2026

  • पाठशाला (2010)
  • राजनीति (2010)
  • शागिर्द (2011)
  • कमाल धमाल मालामाल (2012)
  • द अटैक्स ऑफ 26/11 (2013)
  • अब तक छप्पन 2 (2015)
  • वेलकम बैक (2015)
  • नटसम्राट (2016, मराठी)
  • गोलमाल अगेन (2017)
  • काला (2018, तमिल)
  • द वैक्सीन वॉर (2023)
  • गदर 2 (2023, नैरेटर)
  • ओले आले (2024, मराठी)
  • वनवास (2024)
  • हाउसफुल 5 (2025)
  • ओ' रोमियो (2026)
  • सुबेदार (2026)


नाना ने 1978 में ‘गमन’ से फिल्मी दुनिया में प्रवेश किया, लेकिन असली पहचान 1988 की ‘सलाम बॉम्बे’ और 1989 की ‘परिंदा’ से मिली. ‘परिंदा’ में अन्ना सेठ के रूप में उनकी क्रूर, जटिल और मानवीय छवि ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर दोनों जीते. उस दृश्य में असली आग में जलने के बावजूद उन्होंने शूटिंग पूरी की, महीनों अस्पताल में रहे, फिर भी परदा छोड़ने को तैयार नहीं हुए.


1990 के दशक में उन्होंने खुद को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचा दिया. ‘अंगार’ में खलनायक की भूमिका, ‘क्रांतिवीर’ में देशभक्त की आग और ‘अग्नि साक्षी’ में भावुक गहराई, तीनों में राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर दोनों उनके नाम रहे. उन्होंने ‘प्रहार’ का निर्देशन भी किया और टेरिटोरियल आर्मी में कैप्टन से लेफ्टिनेंट कर्नल तक का सफर तय किया. कारगिल युद्ध के दौरान मराठा लाइट इन्फैंट्री में सेवा दी. यह सिर्फ अभिनय नहीं था, जीवन का अनुभव था जो उनके किरदारों में उतरता था.


बाद के वर्षों में ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी की कॉमिक ताकत, ‘राजनीति’ की राजनीतिक तीक्ष्णता, ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ की गंभीरता और मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ में सेवानिवृत्त मंच अभिनेता की दर्दनाक यात्रा ने साबित किया कि वे हर रंग में माहिर थे. पद्म श्री (2013) उनके योगदान की आधिकारिक मान्यता थी. नाम फाउंडेशन के जरिए किसानों और आपदा प्रभावितों के लिए किया गया काम उनकी सामाजिक चेतना को दिखाता था. उनकी आवाज में हमेशा एक खुरदरापन था, आंखों में सवाल और चेहरे पर वह तीव्रता जो किरदार को जीवंत कर देती थी. वे नायक भी थे, खलनायक भी और आम आदमी भी.

 

 Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.

 

Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही