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150 साल पहले रखी गई थी रांची के संत पॉल कैथेड्रल चर्च की नींव

रांची की पहचान बने संत पॉल्स कैथेड्रल चर्च इनकी इतिहास सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक सहयोग, मिशनरी प्रयास और स्थानीय श्रम की अनोखी मिसाल पेश की गई है.
 

Ranchi : रांची की पहचान बने संत पॉल्स कैथेड्रल चर्च इनकी इतिहास सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक सहयोग, मिशनरी प्रयास और स्थानीय श्रम की अनोखी मिसाल पेश की गई है. आज से करीब 155 वर्ष पूर्व बहुबाजार स्थित कैथेड्रल चर्च की नींव रखी गई थी.

 

उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत का नियम था कि जहां 50 से अधिक ईसाई परिवार हों, वहां चर्च निर्माण के लिए सरकार 35 हजार रुपये तक की सहायता दे सकती है. इसी नियम के तहत छोटानागपुर में चर्च निर्माण को मंजूरी मिली.

 

जनरल डाल्टन से लेकर जज साहब तक ने दिया दान

चर्च निर्माण के लिए समाज के कई प्रभावशाली लोगों ने खुलकर सहयोग किया. छोटानागपुर के कमिश्नर जनरल ई.टी. डाल्टन ने स्वयं 3000 रुपये से अधिक की राशि दी. तत्कालीन जज साहब ने भी आर्थिक योगदान किया था.

 

कलकत्ता के बिशप मिलमैन ने 2000 रुपये भेजे थे. इसके अलावा S.P.G. और S.O.C.K. संस्थाओं ने भी मदद की. इस प्रकार संत पॉल्स कैथेड्रल चर्च का निर्माण हुआ. इसपर करीब 26 हजार रुपये से अधिक की राशि खर्च हुई, जो उस समय एक बड़ी रकम मानी जाती थी.

120 फीट ऊंचा बुर्ज, जो आज भी इतिहास बयां करता है

जज साहब द्वारा स्थल चयन और नक्शा तैयार कराया गया. इसके बाद नींव की खुदाई हुई. 1870 को एक विशाल सभा की उपस्थिति में जनरल ई.टी. डाल्टन के द्वारा कैथेड्रल चर्च का नीव-पत्थर रखा गया. समारोह की शुरुआत में नियुक्त पुरोहित किटली साहब हुए.

 

मंडली को संबोधित करते कहा कि यह भवन ईश्वर की इच्छा से बन रहा है और भविष्य में यह आस्था का ऊंचा केंद्र बनेगा. उन्होंने बाइबिल के नींव-पत्थर में करीब डेढ़ फीट गहरा और 6 इंच चौड़ा गोल छेद बनाया गया.

 

कैथेड्रल का बुर्ज लगभग 120 फीट ऊंचा है. इसके शिखर पर 8–10 फीट ऊंचा पत्थर का स्तंभ और उस पर लोहे की 5 फीट लंबी छड़ लगाई गई है. अलग-अलग डिजाइन की खिड़कियां बनाई गई. इस स्थापत्य कला ने उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया.

 

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