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झारखण्ड आन्दोलन-1912 से 2000 तक संघर्ष के कड़वे मीठे अनुभव

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सांवर मल अग्रवाल 

झारखंड का इतिहास प्राचीन जनजाति संस्कृति, समृद्धि, खनिजों और लंबी औपनिवेशिक व प्रशासनिक संघर्षों की कहानी है. बहुरंगी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण झारखंड प्रदेश सदा से ही आकर्षक और जिज्ञासा का केंद्र रहा है. 1912 से 2000 तक झारखंड आंदोलन का इतिहास एक अलग आदिवासी राज्य के लिए संघर्ष का रहा, जो 20वीं शदी में ढाका छात्रसंघ आंदोलन 1912 से शुरू होकर 15 नवंबर 2000 को पृथक राज्य बनने तक चला. यह आंदोलन औपनिवेशिक शासन, भूमि, आत्म स्वभाव और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए छोटानागपुर उन्नत समाज 1928, आदिवासी महासभा 1938 और 1986 जैसे प्रमुख चरणों से गुजरा है.

 

जमशेदपुर में 1988 में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश नेताओं द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी के समक्ष अलग वनांचल राज्य बनाने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे नेतृत्व द्वारा मान लिया गया और भाजपा ने इस पर फिर आगे आंदोलनकारी रणनीति बनाई.

 

बिहार से अलग होकर 15 नवंबर 2000 को भारत के 28वें राज्य झारखंड के रूप में गठित हुआ. एतिहासिक रुप में यह क्षेत्र आदिवासी आंदोलनों, यहां के महान नेताओं (बिरसा मुंडा जैसे) और प्राचीन राजवंशों (नागवंशी, सिंह, चेरो) के साथ छोटानागपुर पत्थर के रूप में जाना जाता था.

 

यहां का इतिहास पाषाण काल से शुरू होता है. पुरातात्विक साक्ष्यों (शैल चित्रों और उपकरणों) से पता चलता है कि यहां प्रारंभिक काल से मानव बस्तियां बसी हुई थी. यह क्षेत्र प्राचीन भारतीय ग्रंथों और महाभारत में भी वर्णित है. मध्यकाल में भी नागवंशी, पलामू के चेहरों और सिंघम के सिंह राजवंशों का शासन यहां पर था. छोटानागपुर पठार को मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा झारखंड कहा गया था.

 

17वीं शताब्दी में यह क्षेत्र मुगल शासक अकबर के नियंत्रण में आ गया था. वैदिक काल की पुस्तकों में भी झारखंड का वर्णन मिलता है. वायु पुराण में झारखंड को मुरण्ड कहा गया है और विष्णु पुराण में इसे मुंड नाम से जाना गया है. महाभारत काल में छोटानागपुर क्षेत्र को पुंडरीक नाम से जाना जाता था.

 

कुछ बौद्ध ग्रंथों में चीन यात्री फाह्यान के 399 ई. में भारत आने का वर्णन मिलता है. फाह्यान ने अपनी पुस्तक में छोटानागपुर को कुक्कुटलाड कहा है. तथा पूर्व मध्यकालीन संस्कृति रजाहिल ने भी इसे  कालिंदी देश कहा था. झारखंड का वर्णन चीनी यात्री युवान च्यांग, ईरानी यात्री अब्दुल लतीफ तथा ईरानी धर्म आचार्य मुला बहबहनी ने भी इस प्रदेश की चर्चा की है.

 

इस क्षेत्र में ताम्र, पाषाण काल में तांबा के उपकरण मिले. यह क्षेत्र ईसा पूर्व दूसरी सहशस्त्र के मध्य में लौह युग में प्रवेश कर गया था. इस क्षेत्र पर मौर्य साम्राज्य ने कब्जा किया और बाद में 17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर के नियंत्रण में यह क्षेत्र आ गया. 

 

18 वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन होने से पहले यह क्षेत्र चेरों राजवंश और अन्य स्थानीय शासको के नियंत्रण में था. 19वीं शताब्दी के मध्य में झारखंड ब्रिटिश राज के अधीन हुआ. ब्रिटिश राज के तहत 1905 तक यह क्षेत्र बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आता था. इस क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा को मध्य प्रांत और उड़ीसा राज्यों के क्षेत्र को में स्थानांतरित कर दिया गया था, फिर 1936 में पूरा क्षेत्र ईस्टर्न सेंट्रल एजेंसी को सौंप दिया गया. भारतीय स्वतंत्रता के बाद 1947 में इस क्षेत्र को मध्य प्रदेश, उड़ीसा और बिहार के नए राज्यों के बीच विभाजित कर दिया गया.

 

आजादी के बाद 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद राज्यों के शासकों ने भारत गणराज्य में इसे शामिल करने का फैसला लिया. चांग भाकर, जशपुर, मोरिया, सरगुजा और उदयपुर मध्य प्रदेश राज्य के हिस्सा बने. गंगापुर और बीनाई उड़ीसा राज्य का हिस्सा बन गए और खरसावां  सरायकेला बिहार राज्य का हिस्सा बन गए.

 

1928 में इसाई आदिवासियों की राजनीतिक शाखा उन्नति समाज ने पूर्वी भारत में एक आदिवासी राज्य गठन के लिए साइमन कमीशन को ज्ञापन सौंपा. जयपाल सिंह मुंडा और राम नारायण सिंह मुंडा जो आदिवासियों के बड़े नेता थे, उन्होंने अलग राज्य की मांग की. 1955 में जयपाल सिंह  मुंडा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी ने आदिवासियों के लिए अलग राज्य की मांग को राज्य पुनर्गठन आयोग को एक ज्ञापन सौंपा. लेकिन इसे अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि इस क्षेत्र में अलग-अलग भाषाएं थी, आदिवासी अल्पसंख्यक थे, हिंदुस्तानी बहुसंख्यक भाषा थी और इसका बिहार के अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता. बाद में सदान लोग, विभिन्न जाति समुदाय भी अलग-अलग तरीके से राज्य के इस आंदोलन में शामिल हो गए जिसके  कारण आंदोलन काफी मजबूत हुआ.

 

विनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन और एके राय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की. झामुमो ने झारखंड आंदोलन को तेज किया. निर्मल महतो ने झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) की स्थापना की. उन्होंने अलग राज्य झारखंड के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया. रामदयाल मुंडा, डॉक्टर बीपी केसरी, विनोद बिहारी महतो, संतोष राणा और सूर्य सिंह बेसरा के नेतृत्व में एक झारखंड समन्वय समिति (जेसीसी) बनी और इन सबके द्वारा एक नहीं पहल शुरू की गई. यह विभिन्न दलों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास था.

 

1988 में भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण बिहार के वन क्षेत्र से एक अलग वनांचल की मांग करने का निर्णय लिया. इंदर सिंह नामधारी, समरेश सिंह, रुद्र प्रताप सारंगी यहां के प्रमुख नेता थे. अलग राज्य का आंदोलन प्रारंभ हुआ. 1936 में जब बिहार को विभाजित कर उड़ीसा राज्य का गठन हुआ तो झारखंड क्षेत्र के गंगापुर के बोनाई आदि जिले उड़ीसा को, जशपुर, उदयपुर और सरगुजा क्षेत्र मध्य प्रांत को भेंट कर दिए गए, जो बाद में मध्य प्रदेश के भाग बन गए. और जब मध्य प्रदेश को विभाजित कर छत्तीसगढ़ का गठन नवंबर 2000 में किया गया, तो यह प्रदेश इस नवगठित राज्य में हिस्सा बन गए. 

 

आजादी के बाद भारत गणराज्य का जब पुनर्गठन किया गया तो सरायकेला खरसावां की रियासतें (1948) में बिहार में सम्मिलित कर दी गई. झारखंड के गठन के बाद यह क्षेत्र इसका भाग बना दिए गए. 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग के अनुशंसा पर झारखंड का बड़ा हिस्सा बंगाल को दे दिया गया. इसके छोटे भाग को धनबाद के नाम पर यहीं छोड़ दिया गया.

 

इतिहासकारों का मानना है कि यह क्षेत्र मगध साम्राज्य से पहले भी एक इकाई के रूप में चिन्हित था. क्योंकि इस क्षेत्र की भू संरचना, सांस्कृतिक पहचान अलग ही थी. यह क्षेत्र आदिवासी समुदाय का नैसर्गिक स्थल माना जाता है, जिन्हें भारतीय संविधान में अनुसूचित  जनजाति का दर्जा दिया गया है. इनमें खड़िया, संथाल, मुंडा, हो, असुर, उरांव, विरजिया, पहाड़ियां आदि जनजातीय प्रमुख है. यहां के जंगली क्षेत्र में मनुष्यों के रहने लायक जगह इतनी के द्वारा बनाई गई थी, यह श्रेय इन्हीं को जाता है.

 

झारखंड में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन काल में 10 से भी अधिक बड़े आंदोलन या विद्रोह यहां हुए छोटे जनजाति विद्रोह भी यहां बहुत से हुए. इन विद्रोहों की शुरुआत 1767 में ढाल विद्रोह से हुई थी, जो 1857 की क्रांति और 1899- 1900 के बिरसा मुंडा विद्रोह तक चलती रही. ढाल विद्रोह, पहाड़िया विद्रोह, तिलकामांझी आंदोलन, तमाड़ विद्रोह, चेरो विद्रोह, संथाल विद्रोह, सिद्धू कान्हू के नेतृत्व में हुल आंदोलन, सरदारी आंदोलन, बिरसा मुंडा विद्रोह मुख्य हैं. 

 

इन विद्रोहों में झारखंड की जनजातियों के पारंपरिक शासन और भूमि अधिकारों की रक्षा करने में प्रमुख भूमिका रही है. तिलकामांझी पहले आदिवासी शाहिद है. बिरसा मुंडा ने उलगुलान विद्रोह का नेतृत्व किया, इनके अतिरिक्त सिद्धू- कानू, बुधु भगत, तेलंगाना खड़िया, पांडे गणपत राय, नीलांबर पीतांबर भी प्रमुख क्रांतिकारी थे. इन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, प्रभु दयाल हिम्मत सिंह का रोडा आर्म एक्ट  केश में शामिल क्रांतिकारी थे, झारखंड के प्रमुख शहीदों में बुधु भगत, जतरा भगत एवं टाना आंदोलन डॉक्टर यदु गोपाल मुखर्जी  पंडित रघुनाथ मुरमू, फटेल सिंह भगवान बिरसा मुंडा मुख्य थे.

 

केंद्र के सरकार द्वारा 1998 में झारखंड अलग राज्य गठन से संबंधित विधायक को बिहार विधानसभा में भेजने का फैसला किया जिस पर लालू प्रसाद यादव जो उसे वक्त बिहार के मुख्यमंत्री थे ने कहा था कि राज्य बंटवारा उनकी लाश पर होगा. 

 

भाजपा, झामुमो, आजसू, कांग्रेस समेत 16 राजनीतिक संगठन एक मंच पर आए और आंदोलन शुरू करने के लिए प्रत्येक ने राज्य समिति का गठन किया. न्यायमूर्ति पीएम शाहदेव संयोजक बनाए गए. बिहार विधानसभा में झारखंड एक्ट पर 21 सितंबर 1998 को प्रेजेंट होना था.

 

न्यायमूर्ति सहदेव के नेतृत्व में झारखंड बंद का आह्वान किया गया. विरोध मार्च निकला. न्यायमूर्ति केसरी सहित कई गिरफ्तारियां हुई. उन्हें पुलिस स्टेशनों में रखा गया. 1999 में भाजपा ने वादा किया कि अगर भाजपा को राज्य के चुनाव में जीतती है और भाजपा बहुमत मिलता है, तो वह एक अलग राज्य बनाने का वादा करती है. बाद में बिहार विधानसभा में त्रिशंकु सरकार बनी मगर कांग्रेस की शर्त पर विधानसभा में अलग राज्य विधेयक में विरोध नहीं करेगा, अंततः दोनों ने समर्थन किया, विधेयक पारित हुआ. केंद्रीय अधिनियम को मंजूरी दी गई. 

 

छोटानागपुर डिविजन और दक्षिण बिहार के संथाल परगना डिविजन को मिलाकर एक अलग राज्य निर्माण का मार्ग प्रस्तुत हुआ. झारखंड के सेनानी भगवान बिरसा मुंडा के जन्म दिवस 15 नवंबर 2000 को राज्य की नई सरकार बनी. इसके पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने शपथ ली और सरकार नए राज्य की सरकार प्रारंभ हुई. 2005 से लेकर 2014 तक राज्य में स्थितियां अनुकूल नहीं रही. भ्रष्टाचार बढ़ा, उग्रवाद पहले से था, जिससे राज्य का विकास बाधित हुआ. 2014 में भाजपा के बहुमत की सरकार बनी, जिसके मुख्यमंत्री रघुवर दास बने. उनकी सरकार में देश प्रांत को औद्योगिक स्तर पर विकसित करने का निर्णय लिया और उसे पर कार्य प्रारंभ किए गए.

 

2019 में फिर चुनाव हुए, इसमें भाजपा को हर का सामना पड़ा करना पड़ा और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड की सरकार बनी, जिसमें कांग्रेस, राजद सहित यूपीए के दलों ने समर्थन दिया. फिर 2024 का चुनाव हुआ उसमें भी हेमंत सोरेन की सरकार को बहुमत मिला और राज्य में आज उनकी सरकार कार्य कर रही है. आदिवासियों के हितों पर विशेष रूप से सरकार के द्वारा ध्यान दिया जा रहा है. राज्य कितना विकसित अब तक हुआ और यहां की जनता खासकर महिलाओं युवाओं की स्थिति क्या बनी, आदिवासियों के नाम पर बने इस राज्य में सरकारों द्वारा अब तक उनके हितों पर कितना कार्य किया गया, यह आने वाले समय में पता चलेगा.

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