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लालटेन से हाथ तक का सफर: राधाकृष्ण किशोर की सर्वव्यापी राजनीति और कांग्रेस की दुविधा

Ranchi : झारखंड की राजनीति में कई नेताओं ने समय के साथ दल बदले, लेकिन बहुत कम ऐसे नेता रहे जो हर राजनीतिक बदलाव के बाद भी सत्ता और प्रभाव के केंद्र में बने रहे. राधा कृष्णा किशोर उन्हीं नेताओं में शामिल हैं. आज वह झारखंड सरकार में वित्त मंत्री हैं, लेकिन उनका राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव और बदलते राजनीतिक समीकरणों से होकर गुजरा है.

 

राधाकृष्ण किशोर की पहचान सबसे पहले पलामू और गढ़वा क्षेत्र की राजनीति से बनी. उन्हें तेजतर्रार वक्ता और आक्रामक शैली वाले नेता के रूप में देखा जाता रहा है. उनकी शुरुआती राजनीति दक्षिणपंथी विचारधारा और भाजपा-एनडीए खेमे के साथ जुड़ी रही. लंबे समय तक वह भाजपा के प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं में गिने जाते थे.

 

पलामू प्रमंडल की राजनीति हमेशा जातीय समीकरण, स्थानीय प्रभाव और व्यक्तिगत पकड़ पर आधारित रही है. ऐसे माहौल में राधाकृष्ण किशोर ने खुद को एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में स्थापित किया. वह सिर्फ संगठन तक सीमित नेता नहीं थे, बल्कि जनता के बीच सक्रिय रहने वाले चेहरे के रूप में उभरे.

 

समय के साथ भाजपा के अंदर नेतृत्व और संगठन को लेकर नए समीकरण बनने लगे. कई क्षेत्रों में पुराने और नए नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी. इसी दौर में राधाकृष्ण किशोर और भाजपा के बीच दूरी बढ़ने लगी. राजनीतिक जानकारों के अनुसार टिकट और स्थानीय नेतृत्व से जुड़े मुद्दों ने इस दूरी को और बढ़ाया.

 

इसके बाद उन्होंने भाजपा छोड़ दी. उस समय यह फैसला काफी चर्चित रहा, क्योंकि वह लंबे समय तक भाजपा राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते थे. पार्टी छोड़ने के बाद भी उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीति से दूर नहीं किया. वह लगातार सरकार और विपक्ष दोनों पर मुखर बयान देते रहे और अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखी.

 

बाद में जब झारखंड में गठबंधन राजनीति मजबूत होने लगी, तब राधाकृष्ण किशोर कांग्रेस के करीब आए. कांग्रेस ने उन्हें पार्टी में शामिल करने के बाद जल्द ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी. यहीं से कांग्रेस के अंदर असहजता की चर्चा शुरू हुई.

 

कांग्रेस के कई पुराने नेता लंबे समय से संगठन में काम कर रहे थे और कठिन दौर में भी पार्टी के साथ खड़े रहे थे. सरकार बनने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री पद मिलेगा. लेकिन राजनीतिक संतुलन, अनुभव और क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए राधाकृष्ण किशोर को सीधे वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी गई.

 

झारखंड सरकार में वित्त विभाग सबसे अहम विभागों में माना जाता है. राज्य का बजट, विभिन्न विभागों को राशि जारी करना, नई योजनाओं को मंजूरी देना और आर्थिक प्राथमिकताएं तय करने में वित्त मंत्री की बड़ी भूमिका होती है. ऐसे में राधाकृष्ण किशोर को यह विभाग मिलना राजनीतिक रूप से बड़ा संदेश माना गया.

 

उनके मंत्री बनने के बाद कांग्रेस के अंदर यह चर्चा तेज हुई कि पार्टी के पुराने नेताओं की अनदेखी की गई है. कई नेताओं के बीच यह नाराजगी भी रही कि हाल में पार्टी में आए नेता को इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई.

 

वित्त मंत्री बनने के बाद राधाकृष्ण किशोर लगातार सक्रिय नजर आए. उन्होंने विभागीय बैठकों, बजट प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन को लेकर सख्त रुख अपनाया. सरकार के भीतर उनकी छवि ऐसे मंत्री की बनी जो अपनी बात साफ और सीधे तरीके से रखते हैं.

 

उनकी यही कार्यशैली धीरे-धीरे उन्हें सरकार के भीतर प्रभावशाली शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करती गई. वह कई बार राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बयान देने से भी पीछे नहीं हटे. इससे उनकी राजनीतिक मौजूदगी और मजबूत हुई.

 

हाल के महीनों में कांग्रेस और राज्य सरकार के अंदर कई मुद्दों पर असंतोष की चर्चा सामने आई है. संगठन और सरकार के बीच तालमेल, मंत्री पद और नेतृत्व को लेकर पार्टी के अंदर अलग-अलग राय देखने को मिली. इसी माहौल में राधाकृष्ण किशोर को लेकर भी सवाल उठने लगे.

 

पार्टी के अंदर एक वर्ग मानता है कि कांग्रेस ने पुराने नेताओं की बजाय बाहर से आए नेताओं को ज्यादा महत्व दिया. वहीं दूसरा वर्ग यह तर्क देता है कि सरकार को अनुभवी और प्रशासनिक समझ रखने वाले नेताओं की जरूरत थी, इसलिए उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी गई.

 

राधाकृष्ण किशोर का भाजपा से जुड़ा पुराना राजनीतिक बैकग्राउंड आज भी चर्चा का विषय बना रहता है. विपक्ष कई बार यह सवाल उठाता है कि कांग्रेस ने लंबे समय तक भाजपा राजनीति से जुड़े रहे नेता को वित्त मंत्रालय जैसी अहम जिम्मेदारी क्यों दी. वहीं कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच भी इस मुद्दे को लेकर असहजता बनी रहती है.

 

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड जैसी गठबंधन आधारित राजनीति में विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय प्रभाव अहम भूमिका निभाते हैं. ऐसे में प्रभावशाली नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलना असामान्य नहीं माना जाता.

 

राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक सफर झारखंड की बदलती राजनीति की तस्वीर भी पेश करता है. यह उस दौर की कहानी है जहां दल बदल आम बात हो चुकी है, गठबंधन राजनीति में समीकरण सबसे महत्वपूर्ण हो गए हैं और संगठन से ज्यादा प्रभावशाली चेहरों को प्राथमिकता मिल रही है.

 

राधाकृष्ण का राजनीतिक सफर किसी सीधी रेखा में नहीं चलता, यह जैसे बदलते रंगों वाली एक अजीब कहानी है. राजद की सामाजिक न्याय वाली लालटेन से लेकर आजसू के साधारण चूल्हे तक, भाजपा के कमल से लेकर जदयू के तीर तक और फिर समता पार्टी के दौर से गुजरते हुए अब कांग्रेस के हाथ तक, उन्होंने हर राजनीतिक पड़ाव को करीब से देखा है.

 

शायद इसी लंबे और मिले-जुले अनुभव का असर है कि आज वे कांग्रेस के कोटे से मंत्री होते हुए भी अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को हटाने जैसी सलाह देने से पीछे नहीं हटते.

 

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