
बैजनाथ मिश्र
खाड़ी में जारी युद्ध के बीच अपने देश में जो चुनावी महाभारत छिड़ा है, वह कम रोमांचक नहीं है. हालांकि युद्ध की खबरों के बीच इस रोमांच की चर्चा कम हो रही है. यह रोमांच पैदा हुआ है पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के कारण. इनमें तीन राज्य ऐसे हैं जहां सैद्धांतिक और व्यावहारिक अर्थों में इंडी गंठबंधन (इंडिया) निरर्थक हो गया है. इसके सहयोगी आपस में ही भिड़ गये हैं.
असम में कांग्रेस की राह में कांटे बिछाने का काम झामुमो कर रहा है. झारखंड में झामुमो के नेतृत्ववाली सरकार में कांग्रेस भी सहभागी है. लेकिन असम में दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं. झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन को मनाने के लिए असम कांग्रेस के कर्णधार गौरव गोगोई अपनी टीम के साथ रांची आये थे. वह झामुमो को कुछ सीटें देने को भी तैयार थे. लेकिन झामुमो की मांग अधिक सीटों की थी. बात बनी नहीं और अब झारखंड कांग्रेस के मंत्री अपने ही मुख्यमंत्री और झामुमो मंत्रियों से मुकाबले के लिए प्रचार में सन्नद्ध हैं. एक तरफ हेमंत सोरेन आदिवासी वोटरों को झामुमो के पक्ष में गोलबंद करने में लगे हैं तो कांग्रेस के आदिवासी चेहरा बंधु तिर्की उन्हीं वोटरों को कांग्रेस की ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं.
असम में कांग्रेस की समस्या यह भी है कि वह पूरी तरह से मुस्लिम मतों पर फोकस कर रही है. बदरूद्दीन अजमल की पार्टी (एआईयूडीएफ) से नाता तोड़कर कांग्रेस ने अपने सांसद रकीबुल हसन को कमान सौंप दी है. उनकी मदद के लिए सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) के सांसद इमरान मसूद को लगा दिया गया है. रकीबुल का जलवा यह है कि उन्होंने धुबरी सीट से अजमल को रिकार्ड मतों (साढ़े दस लाख) से हराया है और इमरान नरेंद्र मोदी की बोटी-बोटी काट डालने की घोषणा कर चुके हैं. इस जोड़ी के प्रभुत्व के कारण पहले असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ दी और बाद में नौगांव से सांसद प्रद्युत बारदलोई ने इस्तीफा दे दिया. ये दोनों भाजपा में चले गये हैं.
कांग्रेस के अनेक बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है. इनमें से कई भाजपा प्रत्याशी के रुप में मैदान में हैं. कांग्रेस इस नुकसान की भरपाई के लिए करीब दो दर्जन आदिवासी बहुल सीटों पर नजर लगाये हुए है. अब उसकी नजर उतारने के लिए झामुमो इन्हीं सीटों पर खम ठोंककर खड़ा हो गया है. झामुमो कितनी सीटें जीत पायेगा, इससे बड़ा प्रश्न यह है कि वह कांग्रेस को कितनी सीटें हरवा देगा.
झामुमो अभी क्षेत्रीय दल है. उसकी तमन्ना शायद राष्ट्रीय दल बनने की है और हेमंत सोरेन भी आदिवासी नेता के रुप में राष्ट्रीय फलक पर उभरना चाहते हैं. इसलिए वह ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में भी नयी तैयारियों के साथ उतरने की योजना बना रहे होंगे.
बंगाल में भी इंडी गंठबंधन दिग्भ्रमित है. यहां इस गंठबंधन के तीन घटक हैं- सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वाम मोर्चा. यहां भी मुकाबला भाजपा से है. असम में वह सरकार बचाने के लिए जूझ रही है तो बंगाल में टीएमसी से सत्ता छीनने के लिए. टीएमसी जहां सत्ता विरोधी रूझान से परेशान है, वहीं ओवैसी और बाबरी मस्जिदवाले हुमांयूं कबीर की जुगलबंदी से हलकान है. टीएमसी ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है. यानी उसने कांग्रेस, वाम मोर्चा के लिए न तो कोई सीट छोड़ी है, न उन्होंने समझौते के लिए आग्रह किया है.
वाम मोर्चा तीन दशक से अधिक समय तक सरकार चला चुका है. उससे पहले कांग्रेस की ही सरकारें थीं. भाजपा वहां फिसड्डी रही है. लेकिन आज वह टीएमसी की प्रबल प्रतिद्वंद्वी है. इसके विपरीत कांग्रेस राज्य की सभी 294 सीटों पर अकेले लड़ने की घोषणा कर चुकी है. उसने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिये हैं. अब वाम मोर्चा भी वहां अकेले ही चुनाव लड़ेगा. वैसे भी इन दोनों के पास विधानसभा में शून्य सीट है. यानी गंवाने के लिए कुछ है ही नहीं. इन दोनों के अधिकतर समर्थक टीएमसी और भाजपा के साथ चले गये हैं.
इस इंडी गंठबंधन की गंदी तस्वीर केरलम में भी दिखाई दे रही है. यहां वाम मोर्चा और कांग्रेस में सीधी भिड़ंत है. यहां भाजपा भी लड़ रही है, पर वह हाशिए पर है. अलबत्ता वह जितना तेज लड़ेगी वाम मोर्चा को नुकसान पहुंचायेगी और शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस की राह भी कठिन बना सकती है. इसलिए यहां कांग्रेस और वाम मोर्चा दोनों एक-दूसरे पर भाजपा से सांठगांठ का आरोप लगा रहे हैं.
कांग्रेस वाले जहां वाम मोर्चा जनता पार्टी कह रहे हैं, वहीं वाम मोर्चा वाले कांग्रेस जनता पार्टी का आरोप लगा रहे हैं. इसका मकसद मुस्लिम और ईसाइयों को ताकीद करना है कि चौकन्ना हो जाइए. पिछले दिनों दिल्ली में संपन्न इंडी गंठबंधन के सांसदों की बैठक में कांग्रेस-वाम मोर्चा के बीच तकरार हो चुकी है. कांग्रेस यहां दस साल से सत्ता से बाहर है. इस बार उसका संयोग बन रहा है, लेकिन भाजपा चाहती है कि वाम मोर्चा भले जीत जाये, कांग्रेस को नहीं जीतना चाहिए. उसने शायद प्रत्याशी भी उसी हिसाब से तय किये हैं. तभी कांग्रेसी वाम मोर्चा पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं.
कुछ इसी तरह की स्थिति 1996-97 में तब पैदा हो गयी थी जब सोमनाथ चटर्जी कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को सीताराम वाजपेयी और केसरी जी प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा को देवगौड़ा वाजपेयी कह रहे थे. उस समय न यूपीए था, न इंडी गंठबंधन, लेकिन इस समय घटक दल एक-दूसरे के प्रति जैसी शब्दावलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे इस गंठबंधन का पुर्जा-पुर्जा खुल गया है. केरलम वामपंथी राजनीति का आखिरी किला बचा है. यदि वह इस बार ढ़ह गया तो भारतीय चुनावी राजनीति की लाल धारा सूख जायेगी.
जहां तक तमिलनाडु की बात है, वहां डीएमके के नेतृत्व में कांग्रेस-वामपंथी दोनों लड़ रहे हैं. ये दोनों एमके स्टालिन के कृपा पात्र हैं. न वहां कांग्रेस की कोई हैसियत है, न वाम मोर्चा की. लेकिन केरलम में एक-दूसरे से लड़ने वाले ये दोनों दल तमिलनाडु में भाईचारा निभा रहे हैं. यही ढ़कोसला है.
वैसे भी इंडी गंठबंधन का उद्देश्य आपस में लड़ते हुए भी मोदी विरोध में एकजुटता प्रदर्शित करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है. हाल ही में संपन्न हुए राज्य सभा चुनावों में बिहार, ओडिशा और हरियाणा में जिस तरह कांग्रेस के विधायकों ने बागी बन कर एनडीए समर्थित प्रत्याशियों की मदद की, वह इस गंठबंधन की हुलिया बयान करने के लिए काफी है.
तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी भी एक प्रमुख कारक बन रही है. वह दोनों तरफ वार कर रही है. यानी द्रमुक और अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले गंठबंधनों में से किसे कितना नुकसान पहुंचाएगी, उसी पर हार-जीत निर्भर करेगा. यहां भाजपा अन्नाद्रमुक की छतरी के नीचे करीब दो दर्जन सीटों पर लड़ रही है.
जहां तक पुडुचेरी की बात है, इस केंद्र शासित राज्य में बाजी किसी गंठबंधन के हाथ लग सकती है. यहां मामूली अंतर से हार-जीत होती रही है. इस बार भी यही होगा. एनडीए के घटक दलों के बीच कहीं आपसी भिड़ंत नहीं है, क्योंकि उपर्युक्त किसी भी राज्य में भाजपा को छोड़कर उसका कोई भी साथी दल चुनाव नहीं लड़ रहा है. अन्नाद्रमुक लड़ रहा है तो भाजपा उसके साथ ही है. लेकिन चुनाव के इस बाजार में इंडी गंठबंधन की गांठें खुल गयी हैं. वैसे भी इस गंठबंधन का व्यावहारिक स्वरुप कभी बना ही नहीं. यह एक मोर्चे की तरह ही है जो आपस में लड़ते हुए भी एनडीए खासतौर से भाजपा के साथ कोई मुरव्वत नहीं करता है.
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