वन उपज पर वन निगम का कब्जा, ग्रामीणों को कम मिलती है मजदूरी Praveen Kumar Ranchi : झारखंड में केंदू पत्ता संग्रहण में लगभग एक लाख परिवार लगे हैं, जिन्हें साल भर में 20 से 30 दिन तक का रोजगार मिलता है. राज्य सरकार ने केंदू पत्ता संग्रहण को लेकर 2015 में नीति बनायी थी. सरकार ने केंदू पत्ता संग्रहण को बढ़ावा देने की जिम्मेवारी झारखंड राज्य वन विकास निगम लिमिटेड को सौंपी है. केंदू पत्ता सबसे अधिक रांची, गढ़वा, पलामू के अलावा धालभूमगढ़ में होता है. पलामू में सिर्फ पलामू व्याघ्र परियोजना (पीटीआर) के अंदर केंदू पत्ता संग्रहण पर रोक है, जबकि पेसा और वन अधिकार अधिनियम ने केंदू पत्ते सहित लघु वन उपज के संग्रहण और बिक्री का अधिकार ग्रामसभा को दिया है, लेकिन राज्य में इसे कभी भी सही तरीके से लागू नहीं किया गया. इसके कारण राज्य के 11 हजार से अधिक गांव जो वन क्षेत्र के करीब है, वहां से आदिवासियों का पलायन रोकने में राज्य सरकार कभी भी सक्षम नहीं हो सकी. वहीं महाराष्ट्र के गोंदिया व गढ़चिरौली इलाके में ग्राम सभा के माध्यम से फेडरेशन बनाकर केंदूपत्ता और लघु वन उपज का व्यापार किया जा रहा है. इसके कारण वहां के लोगों को प्रति मानक बोरा दस हजार रुपये तक मिल रहे हैं. लेकिन राज्य वन विकास निगम लिमिटेड झारखंड में केंदू पत्ता संग्रह करने वाले परिवार को मात्र 1750 रुपये प्रति मानक बोरा देता है.
पेसा और वन अधिकार अधिनियम 2006 कानून देता है ग्राम सभा को अधिकार
लघु वन उपज जैसे केंदू पत्ता, गैर-लकड़ी वन उत्पादों को इकट्ठा करने और बिक्री करने का अधिकार ग्राम सभा को देता है. इसके बाद भी राज्य में इसे कभी लागू नहीं किया गया. झारखंड में करीब 11 हजार गांव वन क्षेत्र में है. इन इलाकों से रोजगार के लिए आदिवासियों का पलायन अधिक होता है. पेसा और वन अधिकार के प्रावधानों को बेहतर तरीके से लागू करने पर इस इलाके की हालत में कुछ बदलाव संभव हो सकता है. महाराष्ट्र में केंदू पत्ता और लघु वन उपज का व्यापार करती है ग्राम सभा
महाराष्ट्र के गोंदिया व गढ़चिरौली के इलाके में ग्राम सभा के माध्यम से फेडरेशन बनाकर भी केंदू पत्ता और लघु वन उपज का व्यापार किया जा रहा है, जिसका फायदा वहां रहने वाले लोगों को मिल रहा है. महाराष्ट्र के 5 जिलों में 170 से अधिक गांवों में 7 ग्रामसभा महासंघ इस बिजनेस मॉडल पर काम कर रहे हैं. इस वर्ष केंदू पत्ता का रेट 10,000 रुपये प्रति मानक बोरी से भी ऊपर तक गया है. समितियों ने खुद का टेंडर निकाला और व्यापारियों को माल भी बेचा. कानून लागू होने से झारखंड के गांवों में आयेगी समृद्धि : फादर जार्ज मोनोपोली
फादर जार्ज मोनोपोली कहते हैं कि वन विभाग आदिवासियों को अधिकार नहीं देना चाहता है. वह सीधे तौर पर कानून को ताक पर रख काम कर रहा है, सरकार भी चुप है. राज्य सरकार को इस दिशा में पहल करनी चाहिए. सुधीर पाल कहते हैं कि सरकार वन अधिकार कानून और पेसा को सही तरीके से लागू करे तो झारखंड के गांव पलायन के लिए नहीं बल्कि समृद्धि को लिए जाने जायेंगे. क्या है कानून में प्रावधान
सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआर) : धारा 3(1)(i) वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को मामूली वन संसाधनों को इकट्ठा करने और निपटान करने का अधिकार देता है. स्वामित्व और पहुंच : धारा 3(1)(सी) इन समुदायों को केंदू पत्ता सहित लघु वन उपज पर स्वामित्व अधिकार प्रदान करती है. वे इन उत्पादों को स्थायी रूप से एकत्र, उपयोग और निपटान कर सकते हैं. प्रबंधन और बिक्री का अधिकार : समुदाय लघु वन उपज को व्यक्तिगत रूप से या सहकारी समितियों या अन्य सामुदायिक संस्थानों के माध्यम से बेच सकता है. राज्य नियंत्रण से छूट : अधिनियम की धारा 4(1) में कहा गया है कि केंदूपत्ता सहित लघु वन उपज का अधिकार, वन विभागों द्वारा लगाये गये पिछले प्रतिबंधों के अधीन नहीं है, जो प्रभावी रूप से समुदायों को इन संसाधनों पर अधिक स्वायत्तता प्रदान करता है. कीमत तय करने और बेचने का अधिकार : समुदायों को राज्य वन विभागों के अनुचित हस्तक्षेप के बिना सीधे बाजारों तक पहुंचने का अधिकार है. [wpse_comments_template]
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