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तमिलनाडु के नतीजों में द्रविड़ राजनीति की सीमा दिखी है!

  • - भाजपा इसका दोहन करना चाहेगी.

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श्रीनिवास

तमिलनाडु में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद ‘तमिलनाडु में चर्च राज!’ का नया नैरेटिव गढ़ने और चलाने की कोशिश शुरू हो गयी है, इसलिए कि विजय थलपति ईसाई हैं. तमिलनाडु में ईसाई आबादी कितनी है? 2011 में हुई अंतिम जनगणना के अनुसार  ईसाई आबादी 44,18,331. राज्य की आबादी में मात्र 6.12 प्रतिशत. तो सिर्फ ईसाई मतों के बल पर टीवीके को 108 सीटें मिल गयीं? ये अच्छी तरह जानते हैं कि यह झूठ है, लेकिन स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि देश भर में कोई हिंदू किसी गैर भाजपा दल को वोट नहीं देता है! यानी पंजाब, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड और केरल की सरकारें, मुसलमानों और ईसाइयों के वोट से बनी हैं! 

 

बिहार में राजद और यूपी में सपा-बसपा जैसे दलों को भी हिंदू वोट नही देते. महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) और एनसीपी (पवार) को भी नहीं! दिल्ली में 'आप' को प्रचंड बहुमत मिलता रहा, गैर हिंदुओं के समर्थन के कारण ही! वाम दलों को तो खैर हिंदू वोट नहीं ही देते होंगे! मगर यही झूठ राग लगातार गाया जाता रहा है, आगे भी गाया जाता रहेगा. यह असल में ‘फूट डालो, राज करो’ का पुराना नुस्खा है, जिस पर अंग्रेज बड़ी सफलता से अमल करते थे!

 

तमिलनाडु में कोई उम्मीद नहीं थी, तो बहुत प्रयास ही नहीं किया, मगर ‘टीवीके’ के उभार से एक उम्मीद की किरण दिखी है. ‘हिंदू-मुसलिम’ न सही, अब  इरादा ईसाई बनाम गैर ईसाई करने का है. मानना पड़ेगा-दिमाग तो है, शातिर ही सही!

 

तमिलनाडु की राजनीति, वहां की सामाजिक संरचना के बारे में मुझे ठीक से नहीं मालूम, लेकिन ऐसा लगता है कि द्रविड़ आंदोलन की भारी सफलता और ब्राह्मणवाद के लगभग खत्म हो जाने-कम से कम राजनीति पर वर्चस्व खत्म हो जाने के बावजूद दलितों की स्थिति बहुत नहीं बदली है. दलितों के साथ भेदभाव जारी रहा है, जैसे बिहार की राजनीति में ‘पिछड़ों’ के उभार-वर्चस्व के बावजूद दलितों के साथ उनका का व्यवहार बहुत नहीं बदला है. इस कारण भी भाजपा को दलित समुदाय के एक हिस्से का समर्थन मिल जाता है.  

 

तमिलनाडु में भी कमोबेश यही स्थिति है. दलितों के धर्मांतरण की भी यही वजह होगी.  टीवीके का उभार संभवतः इसकी ही अभिव्यक्ति हो. उम्मीद की जानी चाहिए कि डीएमके नेतृत्व इसे समझेगा. ‘ईसाई बनाम गैर ईसाई’ मुद्दा बनाने के प्रयास के पीछे निहित  निहित मंशा को भी.

 

गौरतलब है कि विजय थलपति ने चुनावों के दौरान डीएमके को राजनीतिक विरोधी और भाजपा को शत्रु कहा था. बेशक ईसाई मिशनरी उसके साथ होंगे, मगर यह  ‘चर्च राज’ की स्थापना नहीं है. राज्य के दलित समुदायों ने विजय थलपति का समर्थन किया, फिल्म स्टार की छवि का भी लाभ मिला होगा. मूलतः यह द्रविड़ आंदोलन और राजनीति की कमियों की ओर एक इशारा है. 

 

सवाल है कि क्या विजय थलपति से हिसाब चुकाने के लिए स्टालिन भाजपा के नैरिटिव के जाल में फंस जाएंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. स्टालिन इतने अपरिपक्व और जल्दबाज लगते तो नहीं हैं!

 

वैसे तमिलनाडु को साधने के लिए, प्लान-बी भी तैयार है. ‘राम सेतु’ या ‘सेतु समुद्रम’ का मुद्दा एक बार गरमाने वाला है. इसी विषय पर महान पत्रकार-सह-अभिनेता अक्षय कुमार की एक फिल्म आ रही है! 

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