alt="" width="600" height="400" /> सिद्धार्थ साक्या[/caption] उन्नीस सौ अड़सठ और उन्नीस सौ छियासी के बाद शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 10+2 के फॉर्मेट को खत्म कर 5+3+3+4 के पैटर्न को लागू किया गया है. इसे हम दो भाग में देख सकते हैं. पहला भाग अठारह वर्ष तक के आयु के विद्यार्थियों के लिए प्राप्त करने वाली नीति और दूसरा भाग उच्च शिक्षा (विश्वविद्यालय) के तहत प्राप्त होने वाली नीति के रूप में है. अठारह वर्ष तक के आयु वाले विद्यार्थी के लिए अब शिक्षा का वर्ष तीन साल से ही शुरू हो जाएगा. जिसमें पहला तीन वर्ष आंगनबाड़ी में प्राप्त होने वाली शिक्षा होगी. उसके बाद के दो वर्ष कक्षा एक और दो फिर कक्षा तीन, चार और पांच. उसके बाद कक्षा छह, सात और आठ और बाद के चार वर्ष हायर सेकेंडरी अर्थात कक्षा नौ, दस, ग्यारहवीं और बारहवीं के लिए होगा. विद्यार्थी को कक्षा छह से ही प्रोफेशनल और कौशल विकास की शिक्षा देनी शुरू कर दी जाएगी. साथ ही पांचवी से आठवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में होगी. इसे एक तरह से यह समझा जा सकता है कि ऐसा करने से विद्यार्थी और शिक्षा के बीच जुड़ाव सा होगा. विद्यार्थी को स्कूल एवं उच्च शिक्षा में संस्कृत भाषा को एक विकल्प के रूप में चुनने की स्वतंत्रता होगी. साथ ही विदेशी भाषा की पढ़ाई सेकेंडरी अर्थात कक्षा नौ से शुरू होगी. दसवीं और बारहवीं बोर्ड की परीक्षा ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव फॉर्मेट में साल में दो बार होगी. बोर्ड कि परीक्षा में मुख्य ज़ोर ज्ञान के परीक्षण पर होगा. जिससे छात्रों मे रटने की प्रवृत्ति खत्म होगी. जो बहुत ही सराहनीय कदम है. वहीं उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू होगा. मतलब अगर कोई छात्र किसी कारण वर्ष के बीच मे पढ़ाई छोड़ देता है तो उसके साल बर्बाद नहीं होंगे. वह फिर कुछ साल बाद वो चाहे तो उस पढ़ाई को जारी रख सकता है. एक साल की पढ़ाई छोड़ने पर सर्टिफिकेट, दो साल में छोड़ने पर डिप्लोमा, तीन साल में छोड़ने पर इंटरमीडिएट और चार साल पढ़ाई पूरी करने पर कंप्लीट डिग्री मिलेगा. इसे क्रेडिट ट्रांसफर भी कहा जा सकता है. साथ ही उच्च शिक्षा में विषय चुनने की अनिवार्यता नहीं होगी. उदाहरण के रूप में अब बायोलॉजी वाले छात्र के साथ केमिस्ट्री या गणित वाले के साथ भौतिक रखने की ही आवश्यकता नहीं होगी. साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स के रूप में विषय का विभाजन नहीं होगा. तीन साल का डिग्री कोर्स उन छात्रों के लिए होगा, जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है और शोध में नहीं जाना है. वहीं शोध में जाने वाले छात्र के लिए चार साल में डिग्री कोर्स होगा. जिसमें उन्हे एक साल में एमए करना होगा. उसके बाद वो सीधे पीएचडी कर सकेंगे. उन्हें एमफिल नहीं करना होगा. उच्च शिक्षा में दो हजार पैंतीस तक पचास प्रतिशत ग्रॉस एनरोलमेंट रेसियो पहुंचाने का लक्ष्य एवं साढ़े तीन करोड़ नई सीट जोड़ने की योजना है. उच्च शिक्षा में यूजीसी, एआईसीटीई जगह अब एक ही नियामक होगा. विश्व के टॉप ग्लोबल रैंकिंग वाले विश्वविद्यालय को भारत मे ब्रांच खोलने की आजादी होगी. जिससे भारत के छात्र को विदेश जाने की आवश्यकता नहीं होगी. ये एक महत्वपूर्ण कदम होगा. सभी भारतीय भाषाओं के विकास, संरक्षण और उन्हे जीवंत बनाए रखने के लिए नई शिक्षा नीति में पाली, फारसी और प्राकृत भाषाओं के लिए अनुवादक की स्थापना की जाएगी. मोटा मोटी नई शिक्षा नीति की ये विशेषता होगी. किंतु नई शिक्षा नीति संभावनाओं के साथ कई चुनौती और सवाल में भी घिर गई है. नई नीति के तहत सरकार ने कुल जीडीपी का छः प्रतिशत खर्च करने की योजना बताती है, लेकिन इसे खर्च कैसे किया जाएगा इसका कोई ब्यैरा नहीम है. पचास प्रतिशत तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो पहुंचाने की योजना भी सरकार तय नहीं कर सकी है. यूजीसी, एआईसीटीई की जगह एक नियामक शिक्षा के केंद्रीयकरण को दर्शाता है. जबकि जानकारों का कहना है इस समय इसके विकेंद्रीकरण पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था. शिक्षा के केंद्रीयकरण से राज्य और केंद्र के बीच उलझन पैदा हो जाएगा. बच्चों के मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाए जाने पर अनिश्चितताएं हैं. क्या निजी स्कूल इसे लागू करने में सक्षम होगा? इसे एक और तरीके से समझा जा सकता है. दिल्ली जैसे केंद्र शासित प्रदेश में देश के अलग-अलग राज्य के बच्चे होंगे. जिनकी मातृभाषा अलग होगी. ऐसे में उनके शिक्षा का माध्यम क्या होगा? एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण होने पर. उदाहरण स्वरूप झारखंड का कोई बच्चा का अभिभावक का स्थानांतरण बीच पढ़ाई के दौरान तमिलनाडु हो जाए तो उसकी शिक्षा का माध्यम क्या होगा. उच्च शिक्षा में इस नीति का लागू करना कितना मुश्किल होगा, इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा के लिए आवंटित फंड का पूरा इस्तेमाल हमारी सरकार खर्च नहीं कर पाती है और यह स्थिति तब है जब भारत सरकार अन्य देश के मुकाबले शिक्षा में कम खर्च का आवंटन रखती है. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए शिक्षण संस्थान की स्वायत्तता को कायम किया जाए और शीर्ष विश्वविद्यालय को पूर्ण शैक्षणिक एवं वित्तीय स्वायत्ता प्रदान की जाए. ताकि वे विश्व स्तर पर नवाचार और शोध में वृद्धि कर सके. साथ ही शिक्षा नीति के पैटर्न में बदलाव के साथ उसके पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाया जाए. मसलन आज से बीस वर्ष पहले जो इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट के छात्र, जिस पाठ्यक्रम को पढ़ रहे थे, आज भी बीस वर्ष बाद छात्र उसी पाठ्यक्रम को पढ़ रहे हैं. जबकि विदेशों में पढ़ाई और पाठ्यक्रम के तकनीक में बदलाव लाया जाता है. इसलिए शोध के लिए प्रयोगशाला को ज्यादा उन्नत करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है. [wpse_comments_template]
बोर्ड की परीक्षा में मुख्य जोर ज्ञान के परीक्षण पर होगा : सिद्धार्थ साक्या
Ranchi: किसी भी देश की तस्वीर यह बताती है कि वहां की सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा की क्या जगह है. सरकार इससे कितना सरोकार रखती है. भारत के विश्वविद्यालय का विश्व भर के एक सौ प्रमुख विश्वविद्यालय में नाम ना आने की वजह से बहुत दिनों से यह प्रयास किया जा रहा था कि इसकी शिक्षा व्यवस्था में गंभीर सुधार की आवश्यकता है. इसरो प्रमुख रहे के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार किया गया. [caption id="attachment_352592" align="aligncenter" width="600"]
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alt="" width="600" height="400" /> सिद्धार्थ साक्या[/caption] उन्नीस सौ अड़सठ और उन्नीस सौ छियासी के बाद शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 10+2 के फॉर्मेट को खत्म कर 5+3+3+4 के पैटर्न को लागू किया गया है. इसे हम दो भाग में देख सकते हैं. पहला भाग अठारह वर्ष तक के आयु के विद्यार्थियों के लिए प्राप्त करने वाली नीति और दूसरा भाग उच्च शिक्षा (विश्वविद्यालय) के तहत प्राप्त होने वाली नीति के रूप में है. अठारह वर्ष तक के आयु वाले विद्यार्थी के लिए अब शिक्षा का वर्ष तीन साल से ही शुरू हो जाएगा. जिसमें पहला तीन वर्ष आंगनबाड़ी में प्राप्त होने वाली शिक्षा होगी. उसके बाद के दो वर्ष कक्षा एक और दो फिर कक्षा तीन, चार और पांच. उसके बाद कक्षा छह, सात और आठ और बाद के चार वर्ष हायर सेकेंडरी अर्थात कक्षा नौ, दस, ग्यारहवीं और बारहवीं के लिए होगा. विद्यार्थी को कक्षा छह से ही प्रोफेशनल और कौशल विकास की शिक्षा देनी शुरू कर दी जाएगी. साथ ही पांचवी से आठवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में होगी. इसे एक तरह से यह समझा जा सकता है कि ऐसा करने से विद्यार्थी और शिक्षा के बीच जुड़ाव सा होगा. विद्यार्थी को स्कूल एवं उच्च शिक्षा में संस्कृत भाषा को एक विकल्प के रूप में चुनने की स्वतंत्रता होगी. साथ ही विदेशी भाषा की पढ़ाई सेकेंडरी अर्थात कक्षा नौ से शुरू होगी. दसवीं और बारहवीं बोर्ड की परीक्षा ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव फॉर्मेट में साल में दो बार होगी. बोर्ड कि परीक्षा में मुख्य ज़ोर ज्ञान के परीक्षण पर होगा. जिससे छात्रों मे रटने की प्रवृत्ति खत्म होगी. जो बहुत ही सराहनीय कदम है. वहीं उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू होगा. मतलब अगर कोई छात्र किसी कारण वर्ष के बीच मे पढ़ाई छोड़ देता है तो उसके साल बर्बाद नहीं होंगे. वह फिर कुछ साल बाद वो चाहे तो उस पढ़ाई को जारी रख सकता है. एक साल की पढ़ाई छोड़ने पर सर्टिफिकेट, दो साल में छोड़ने पर डिप्लोमा, तीन साल में छोड़ने पर इंटरमीडिएट और चार साल पढ़ाई पूरी करने पर कंप्लीट डिग्री मिलेगा. इसे क्रेडिट ट्रांसफर भी कहा जा सकता है. साथ ही उच्च शिक्षा में विषय चुनने की अनिवार्यता नहीं होगी. उदाहरण के रूप में अब बायोलॉजी वाले छात्र के साथ केमिस्ट्री या गणित वाले के साथ भौतिक रखने की ही आवश्यकता नहीं होगी. साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स के रूप में विषय का विभाजन नहीं होगा. तीन साल का डिग्री कोर्स उन छात्रों के लिए होगा, जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है और शोध में नहीं जाना है. वहीं शोध में जाने वाले छात्र के लिए चार साल में डिग्री कोर्स होगा. जिसमें उन्हे एक साल में एमए करना होगा. उसके बाद वो सीधे पीएचडी कर सकेंगे. उन्हें एमफिल नहीं करना होगा. उच्च शिक्षा में दो हजार पैंतीस तक पचास प्रतिशत ग्रॉस एनरोलमेंट रेसियो पहुंचाने का लक्ष्य एवं साढ़े तीन करोड़ नई सीट जोड़ने की योजना है. उच्च शिक्षा में यूजीसी, एआईसीटीई जगह अब एक ही नियामक होगा. विश्व के टॉप ग्लोबल रैंकिंग वाले विश्वविद्यालय को भारत मे ब्रांच खोलने की आजादी होगी. जिससे भारत के छात्र को विदेश जाने की आवश्यकता नहीं होगी. ये एक महत्वपूर्ण कदम होगा. सभी भारतीय भाषाओं के विकास, संरक्षण और उन्हे जीवंत बनाए रखने के लिए नई शिक्षा नीति में पाली, फारसी और प्राकृत भाषाओं के लिए अनुवादक की स्थापना की जाएगी. मोटा मोटी नई शिक्षा नीति की ये विशेषता होगी. किंतु नई शिक्षा नीति संभावनाओं के साथ कई चुनौती और सवाल में भी घिर गई है. नई नीति के तहत सरकार ने कुल जीडीपी का छः प्रतिशत खर्च करने की योजना बताती है, लेकिन इसे खर्च कैसे किया जाएगा इसका कोई ब्यैरा नहीम है. पचास प्रतिशत तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो पहुंचाने की योजना भी सरकार तय नहीं कर सकी है. यूजीसी, एआईसीटीई की जगह एक नियामक शिक्षा के केंद्रीयकरण को दर्शाता है. जबकि जानकारों का कहना है इस समय इसके विकेंद्रीकरण पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था. शिक्षा के केंद्रीयकरण से राज्य और केंद्र के बीच उलझन पैदा हो जाएगा. बच्चों के मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाए जाने पर अनिश्चितताएं हैं. क्या निजी स्कूल इसे लागू करने में सक्षम होगा? इसे एक और तरीके से समझा जा सकता है. दिल्ली जैसे केंद्र शासित प्रदेश में देश के अलग-अलग राज्य के बच्चे होंगे. जिनकी मातृभाषा अलग होगी. ऐसे में उनके शिक्षा का माध्यम क्या होगा? एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण होने पर. उदाहरण स्वरूप झारखंड का कोई बच्चा का अभिभावक का स्थानांतरण बीच पढ़ाई के दौरान तमिलनाडु हो जाए तो उसकी शिक्षा का माध्यम क्या होगा. उच्च शिक्षा में इस नीति का लागू करना कितना मुश्किल होगा, इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा के लिए आवंटित फंड का पूरा इस्तेमाल हमारी सरकार खर्च नहीं कर पाती है और यह स्थिति तब है जब भारत सरकार अन्य देश के मुकाबले शिक्षा में कम खर्च का आवंटन रखती है. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए शिक्षण संस्थान की स्वायत्तता को कायम किया जाए और शीर्ष विश्वविद्यालय को पूर्ण शैक्षणिक एवं वित्तीय स्वायत्ता प्रदान की जाए. ताकि वे विश्व स्तर पर नवाचार और शोध में वृद्धि कर सके. साथ ही शिक्षा नीति के पैटर्न में बदलाव के साथ उसके पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाया जाए. मसलन आज से बीस वर्ष पहले जो इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट के छात्र, जिस पाठ्यक्रम को पढ़ रहे थे, आज भी बीस वर्ष बाद छात्र उसी पाठ्यक्रम को पढ़ रहे हैं. जबकि विदेशों में पढ़ाई और पाठ्यक्रम के तकनीक में बदलाव लाया जाता है. इसलिए शोध के लिए प्रयोगशाला को ज्यादा उन्नत करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है. [wpse_comments_template]
alt="" width="600" height="400" /> सिद्धार्थ साक्या[/caption] उन्नीस सौ अड़सठ और उन्नीस सौ छियासी के बाद शिक्षा नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 10+2 के फॉर्मेट को खत्म कर 5+3+3+4 के पैटर्न को लागू किया गया है. इसे हम दो भाग में देख सकते हैं. पहला भाग अठारह वर्ष तक के आयु के विद्यार्थियों के लिए प्राप्त करने वाली नीति और दूसरा भाग उच्च शिक्षा (विश्वविद्यालय) के तहत प्राप्त होने वाली नीति के रूप में है. अठारह वर्ष तक के आयु वाले विद्यार्थी के लिए अब शिक्षा का वर्ष तीन साल से ही शुरू हो जाएगा. जिसमें पहला तीन वर्ष आंगनबाड़ी में प्राप्त होने वाली शिक्षा होगी. उसके बाद के दो वर्ष कक्षा एक और दो फिर कक्षा तीन, चार और पांच. उसके बाद कक्षा छह, सात और आठ और बाद के चार वर्ष हायर सेकेंडरी अर्थात कक्षा नौ, दस, ग्यारहवीं और बारहवीं के लिए होगा. विद्यार्थी को कक्षा छह से ही प्रोफेशनल और कौशल विकास की शिक्षा देनी शुरू कर दी जाएगी. साथ ही पांचवी से आठवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में होगी. इसे एक तरह से यह समझा जा सकता है कि ऐसा करने से विद्यार्थी और शिक्षा के बीच जुड़ाव सा होगा. विद्यार्थी को स्कूल एवं उच्च शिक्षा में संस्कृत भाषा को एक विकल्प के रूप में चुनने की स्वतंत्रता होगी. साथ ही विदेशी भाषा की पढ़ाई सेकेंडरी अर्थात कक्षा नौ से शुरू होगी. दसवीं और बारहवीं बोर्ड की परीक्षा ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव फॉर्मेट में साल में दो बार होगी. बोर्ड कि परीक्षा में मुख्य ज़ोर ज्ञान के परीक्षण पर होगा. जिससे छात्रों मे रटने की प्रवृत्ति खत्म होगी. जो बहुत ही सराहनीय कदम है. वहीं उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू होगा. मतलब अगर कोई छात्र किसी कारण वर्ष के बीच मे पढ़ाई छोड़ देता है तो उसके साल बर्बाद नहीं होंगे. वह फिर कुछ साल बाद वो चाहे तो उस पढ़ाई को जारी रख सकता है. एक साल की पढ़ाई छोड़ने पर सर्टिफिकेट, दो साल में छोड़ने पर डिप्लोमा, तीन साल में छोड़ने पर इंटरमीडिएट और चार साल पढ़ाई पूरी करने पर कंप्लीट डिग्री मिलेगा. इसे क्रेडिट ट्रांसफर भी कहा जा सकता है. साथ ही उच्च शिक्षा में विषय चुनने की अनिवार्यता नहीं होगी. उदाहरण के रूप में अब बायोलॉजी वाले छात्र के साथ केमिस्ट्री या गणित वाले के साथ भौतिक रखने की ही आवश्यकता नहीं होगी. साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स के रूप में विषय का विभाजन नहीं होगा. तीन साल का डिग्री कोर्स उन छात्रों के लिए होगा, जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है और शोध में नहीं जाना है. वहीं शोध में जाने वाले छात्र के लिए चार साल में डिग्री कोर्स होगा. जिसमें उन्हे एक साल में एमए करना होगा. उसके बाद वो सीधे पीएचडी कर सकेंगे. उन्हें एमफिल नहीं करना होगा. उच्च शिक्षा में दो हजार पैंतीस तक पचास प्रतिशत ग्रॉस एनरोलमेंट रेसियो पहुंचाने का लक्ष्य एवं साढ़े तीन करोड़ नई सीट जोड़ने की योजना है. उच्च शिक्षा में यूजीसी, एआईसीटीई जगह अब एक ही नियामक होगा. विश्व के टॉप ग्लोबल रैंकिंग वाले विश्वविद्यालय को भारत मे ब्रांच खोलने की आजादी होगी. जिससे भारत के छात्र को विदेश जाने की आवश्यकता नहीं होगी. ये एक महत्वपूर्ण कदम होगा. सभी भारतीय भाषाओं के विकास, संरक्षण और उन्हे जीवंत बनाए रखने के लिए नई शिक्षा नीति में पाली, फारसी और प्राकृत भाषाओं के लिए अनुवादक की स्थापना की जाएगी. मोटा मोटी नई शिक्षा नीति की ये विशेषता होगी. किंतु नई शिक्षा नीति संभावनाओं के साथ कई चुनौती और सवाल में भी घिर गई है. नई नीति के तहत सरकार ने कुल जीडीपी का छः प्रतिशत खर्च करने की योजना बताती है, लेकिन इसे खर्च कैसे किया जाएगा इसका कोई ब्यैरा नहीम है. पचास प्रतिशत तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो पहुंचाने की योजना भी सरकार तय नहीं कर सकी है. यूजीसी, एआईसीटीई की जगह एक नियामक शिक्षा के केंद्रीयकरण को दर्शाता है. जबकि जानकारों का कहना है इस समय इसके विकेंद्रीकरण पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था. शिक्षा के केंद्रीयकरण से राज्य और केंद्र के बीच उलझन पैदा हो जाएगा. बच्चों के मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाए जाने पर अनिश्चितताएं हैं. क्या निजी स्कूल इसे लागू करने में सक्षम होगा? इसे एक और तरीके से समझा जा सकता है. दिल्ली जैसे केंद्र शासित प्रदेश में देश के अलग-अलग राज्य के बच्चे होंगे. जिनकी मातृभाषा अलग होगी. ऐसे में उनके शिक्षा का माध्यम क्या होगा? एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण होने पर. उदाहरण स्वरूप झारखंड का कोई बच्चा का अभिभावक का स्थानांतरण बीच पढ़ाई के दौरान तमिलनाडु हो जाए तो उसकी शिक्षा का माध्यम क्या होगा. उच्च शिक्षा में इस नीति का लागू करना कितना मुश्किल होगा, इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा के लिए आवंटित फंड का पूरा इस्तेमाल हमारी सरकार खर्च नहीं कर पाती है और यह स्थिति तब है जब भारत सरकार अन्य देश के मुकाबले शिक्षा में कम खर्च का आवंटन रखती है. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए शिक्षण संस्थान की स्वायत्तता को कायम किया जाए और शीर्ष विश्वविद्यालय को पूर्ण शैक्षणिक एवं वित्तीय स्वायत्ता प्रदान की जाए. ताकि वे विश्व स्तर पर नवाचार और शोध में वृद्धि कर सके. साथ ही शिक्षा नीति के पैटर्न में बदलाव के साथ उसके पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाया जाए. मसलन आज से बीस वर्ष पहले जो इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट के छात्र, जिस पाठ्यक्रम को पढ़ रहे थे, आज भी बीस वर्ष बाद छात्र उसी पाठ्यक्रम को पढ़ रहे हैं. जबकि विदेशों में पढ़ाई और पाठ्यक्रम के तकनीक में बदलाव लाया जाता है. इसलिए शोध के लिए प्रयोगशाला को ज्यादा उन्नत करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है. [wpse_comments_template]

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