
Balraj Singh
(वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)
एक लिखित फैसला पढ़ा जा सकता है, उद्धृत किया जा सकता है, अपील की जा सकती है और पलटा जा सकता है. निर्णय न करने से कोई कागज, कोई अनुपात, कोई अपील और कोई रिकॉर्ड नहीं बचता, जिसे जज के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके. यह सरकार को अदालत द्वारा दी जा सकने वाली सबसे साफ-सुथरी न्यायिक सुरक्षा है और यही मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की स्थायी पद्धति बन गई है.
वे शायद ही कभी सरकार के पक्ष में ऐसा फैसला सुनाते हैं जो अदालत को कटघरे में खड़ा करे. वे बस एक मान्यता प्राप्त प्रक्रियात्मक रास्ता खोज लेते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि अदालत कभी सरकार के खिलाफ फैसला ही न सुनाए. हर रास्ता अलग-अलग देखने पर सामान्य लगता है. लेकिन इकट्ठा करके देखें तो ये गैर-निर्णय का एक सुसंगत पैटर्न बनाते हैं जो सरकार को जांच से बचाता है और अदालत की औपचारिक स्वतंत्रता की छवि को बनाए रखता है.
हालिया उदाहरण
01- स्थानांतरण और देरी जब तक मौका बीत न जाए
16 फरवरी को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मुस्लिम-विरोधी भाषणों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया. साथ में फटकार भी दी गई कि याचिकाकर्ता उसे “निराश” करने की कोशिश कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल SIR शिकायतों को भी कलकत्ता उच्च न्यायालय को भेज दिया गया. जुलाई में एक ध्वस्तीकरण की याचिका को इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया गया कि भले ही उस दिन ही संरचना तोड़ दी जाए, अदालत मामले की सुनवाई नहीं करेगी. मामला खारिज नहीं होता, वह बस कभी सुना ही नहीं जाता, जब तक शिकायत का काम रोका या उलटा जा सकता है.
02- उल्लंघन को अदालत के दायरे से बाहर घोषित करना
13 अक्टूबर को दिल्ली में लॉकडाउन, लगभग 7,000 लोग हिरासत में और इंटरनेट सेवाएं बंद होने की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश ने इसे “कानून और व्यवस्था” का मामला बताया और कहा कि यह “मेरा क्षेत्र नहीं है.” देश की सर्वोच्च अदालत ने नागरिकों के अधिकारों पर सामूहिक प्रतिबंध को अपने सरोकार से बाहर कर दिया.
03- कैलेंडर को फैसला करने देना
28 सितंबर को हजारों मतदाता जिनके नाम पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से काट दिए गए थे, उप चुनावों से पहले तत्काल सुनवाई चाहते थे. जवाब था कि “ये सिर्फ उप चुनाव हैं.” बिहार SIR की चुनौती को लंबित रहने दिया गया, जबकि संशोधित सूचियों पर मतदान जारी रहा. यहां देरी तटस्थ नहीं है. यह ही असली फैसला है और इससे कोई लिखित आदेश नहीं बनता जिसे चुनौती दी जा सके.
04- जिम्मेदारी से इनकार करते हुए उपाय को जारी रहने देना
पांच अक्टूबर को अदालत ने कहा कि उसने संशोधित फॉर्म 6 को कभी मंजूरी नहीं दी, फिर भी उसके इस्तेमाल पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. अदालत को जांच का शीर्षक मिल गया, चुनाव आयोग को फॉर्म मिला.
05- रिकॉर्ड को सील रखना
पेगासस मामले में सरकार ने अदालत की अपनी विशेषज्ञ समिति के साथ सहयोग करने से इनकार किया. मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि किसी देश द्वारा स्पाइवेयर इस्तेमाल करने में क्या गलत है और रिपोर्ट को सार्वजनिक दृष्टि से बाहर रखा. जांच का आदेश दिया गया, फिर उसे प्रभावी रूप से सुरक्षित कर दिया गया.
06- सबूत की जांच से इनकार करना
22 जुलाई को जब पुलिस द्वारा छात्रों को पीटने के वीडियो दिखाए गए, तो जवाब था “हमारा समय बर्बाद मत करो.” जिन सबूतों को अदालत देखने से इनकार करती है, उनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता.
07- समिति गठित करना और उसे निष्क्रिय छोड़ देना
अगस्त में बेंच ने पुलिस अतिरेक पर पांच सदस्यीय पैनल गठित किया. अक्टूबर की बड़ी कार्रवाइयों से कोई रिपोर्ट या हस्तक्षेप नहीं आया. समिति का गठन कार्रवाई के रूप में दर्ज होता है जबकि कोई कार्रवाई नहीं होती.
08- व्यक्तिगत राहत देते हुए तरीके को वैध ठहराना
केजरीवाल मामले में अदालत ने जमानत का आदेश दिया, लेकिन CBI की गिरफ्तारी को वैध माना. उसी बेंच पर न्यायमूर्ति भुयान ने गिरफ्तारी को अनुचित, जमानत रोकने के लिए समयबद्ध बताया और चेतावनी दी कि CBI को “पिंजरे में तोते” जैसा दिखना बंद करना चाहिए. विपक्षी नेता रिहा हो गए. एजेंसी को गिरफ्तारी के तरीके की न्यायिक मंजूरी मिल गई.
09- सुओ मोटो शक्ति का प्रयोग सिर्फ संस्था की रक्षा के लिए करना
अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर न्यायिक भ्रष्टाचार पर एक स्कूल पाठ्यपुस्तक अध्याय को उठाया, प्रतियां जब्त कीं और लेखकों को काली सूची में डाल दिया. छात्रों के खिलाफ पुलिस क्रूरता पर समान ध्यान मांगने वाली एक पत्र याचिका का कोई जवाब नहीं मिला.
10- शिकायतकर्ता को समस्या मानना
घृणा वाले भाषण को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं को कहा गया कि वे उच्च न्यायालयों का मनोबल गिरा रहे हैं. विपक्षी दलों को कहा गया कि वे अदालत में चुनाव लड़ रहे हैं. एक बार जब अदालत के पास आने वाले व्यक्ति को ही कठिनाई या समस्या बना दिया जाता है, तो शिकायत की सामग्री की जांच करने की जरूरत नहीं रहती.
व्यक्तिगत रूप से देखें तो हर कदम एक मान्यता प्राप्त प्रक्रिया है. सामूहिक रूप से देखें तो ये सुनिश्चित करते हैं कि हर उपलब्ध रास्ता जिससे कोई नागरिक सरकार को जवाबदेह ठहरा सकता है, उसी बंद दरवाजे पर खत्म हो जाए. कोई फैसला नहीं है जिसे इंगित किया जा सके. सिर्फ उन मामलों की लंबी सूची है जिन्हें अदालत ने फैसला न करने के तरीके खोज लिए हैं.
जो लोग अदालत को देखते हैं उन्हें अपना समकालीन रिकॉर्ड रखना चाहिए. हर बार जब कोई मामला कहीं और भेजा जाए, चुनाव या समय सीमा के बाद टाला जाए, रिपोर्ट सील रखी जाए, या सबूत को समय की बर्बादी कहकर खारिज किया जाए, तो तारीख, बेंच और विषय नोट करें. ये इंकार अकेले में कोई स्पष्ट संकेत नहीं देते. यही वजह है कि इन्हें इकट्ठा करके एक साथ पढ़ा जाना चाहिए.
डिस्क्लेमरः यह टिप्पणी लेखक ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर अंग्रेजी में लिखा है, उसका हिन्दी अनुवाद किया गया है.