कीचड़-युद्ध बंद होना चाहिए
Prem Kumar Mani जब से सोशल मीडिया प्रभावशाली हुआ है, सनक भरे लेखकों की भरमार हो गई है. ये किसी भी वैचारिक जमात के हो सकते हैं. कुछेक साल पहले श्रीमद्भगवद्गीता और अश्वघोष की कृति सौन्दरनन्द की तुलना करते हुए एक टिप्पणी लिखी तो सिरफिरे भगवा पट्टी से भयावह हमले हुए. उन सबकी धमकी थी कि मैं गीता को ईश्वरकृत मान कर चुप हो जाऊं, अन्यथा परिणाम भुगतना होगा. महिषासुर मामले में भी ऐसा ही हुआ था. हालांकि ऐसे ही मुद्दों को लेकर पानसरे और गौरी लंकेश का लोगों ने क़त्ल किया. लेकिन डरना मेरी फितरत में नहीं रहा है. उम्र के जिस पड़ाव पर हूं यही उम्मीद करता हूं कि आगे भी शायद इतनी निर्भीकता बनी रहेगी. लेकिन मैं रोज देख रहा हूँ सोशल मीडिया पर वाचालता बढ़ती जा रही है. भाजपाइयों ने इसका आरम्भ जरूर किया था, किन्तु अब दूसरे भी इसकी गिरफ्त में तेजी से आ रहे हैं. कुछ साल पूर्व से जान बूझ कर जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ अनाप-शनाप लिखने का एक प्रचलन शुरू हुआ. भगवा दल को शायद यह लगा कि नेहरू को ध्वस्त करते ही हमारे मोदी जी उस जगह पहुंच जाएंगे, जहां नेहरू थे. इसलिए नेहरू-निंदा अभियान में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल रहते हैं. लेकिन मुझे ऐसा महसूस हुआ, इससे नेहरू को कुछ फायदा हुआ. वह चर्चा में हमेशा बने रहे. इस बीच उन्हें नई पीढ़ी के लोगों ने काफी पढ़ा. यह सब फेसबुक से ही पता चला. कबीर ने निंदक को नजदीक रखने की सलाह दी है. इसके कुछ अर्थ हैं. आलोचना से लाभ होता ही है. लेकिन जब गाली-गलौच होने लगती है, तब चिंता होती है. अब स्थितियां इसी तरफ बढ़ रही हैं. दूसरी तरफ से बिना सोचे-समझे सावरकर पर हमला हो रहे हैं. बेसिर पैर के. मुआफीवीर कह कर उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है. इस टिप्पणी के लिखने के पीछे ऐसा ही एक पोस्ट रहा है, जिस में बताया गया है कि सावरकर ने अंग्रेज अफसर को एक पत्र में आपका आज्ञाकारी पुत्र लिखा है. किसी दूसरे ने उनकी मुआफी मांगने वाले पत्रों का पूरा ब्यौरा दिया है. यह भी लिखा है कि वह बहुत विनम्रतापूर्वक जुबान का इस्तेमाल करते थे. (टिप्पणीकार शायद यह कहना चाहता है कि तथाकथित वीर की भाषा इतनी पिलपिली नहीं होनी चाहिए थी). मुझे यह सब देख कर थोड़ी हंसी तो आती है, लेकिन सच कहूं ऐसी मूर्खताओं पर गुस्सा आता है. गांधी, नेहरू, सावरकर राष्ट्रीय आंदोलन के लोग थे. हमें उनके बारे में गहराई से जानकारी लेनी चाहिए और विवेकपूर्ण ढंग से पिछली सदी के स्वतंत्रता आंदोलन पर सोचना चाहिए. यदि हम ऐसा करेंगे तो देश -समाज और स्वयं का भला कर सकेंगे. आज गांधी, नेहरू, सावरकर नहीं हैं. न ही वे कभी आने वाले हैं. हां, उनका इतिहास है. उनसे हमें सबक सीखना है. गांधी, नेहरू, सावरकर में अनेक विशेषताएं थीं, कमजोरियां भी थीं. हमें कमजोरियों को एक किनारे रखना चाहिए और उनकी विशेषताओं को अपनाना चाहिए. अंग्रेजों से कोई भी पत्राचार करता तो उसे ओबीडियेन्ट लिखना ही पड़ता, क्योंकि वे सरकार में थे. पत्र तो संवाद स्थापित करने के लिए लिखे जाते हैं और उसकी पहली शर्त होती है कि उसकी भाषा शालीन और विनम्र हो. अन्यथा पत्राचार बेमानी है. जिन लोगों को सावरकर के ओबीडियेन्ट सन ( आज्ञाकारी पुत्र ) लिखने पर आश्चर्य है उन्हें महात्मा गांधी के पत्रों को भी देखना चाहिए, जो उन्होंने वायसराय को लिखे हैं.(देखें आर.एल. खिप्पले की किताब फेमस लेटर्स ऑफ़ महात्मा गांधी ) गांधी अधिकांश पत्रों के आखिर में योर ओबीडियन्ट सर्वेंट (आपका आज्ञाकारी चाकर ) लिखते हैं. यह तो पत्र लिखने का आम प्रचलन था. हम जानते हैं कि गवर्नर गलत व्यक्ति है, लेकिन यदि उससे बात करनी है या उसे पत्र लिखना है तो महामहिम तो बोलना या लिखना ही होगा. सावरकर के बारे में हमें ठीक ढंग से कभी बताया नहीं गया. लेकिन हमें जानना चाहिए. आज से बीस साल पूर्व भी एक कांग्रेसी नेता अय्यर ने उनकी नामपट्टी अंडमान जेल से उखाड़ने की बात की थी. एक लेख लिख कर मैंने उसका विरोध उसी समय किया था. बेशक सावरकर स्वतंत्रता सेनानी थे. स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक विचारों के लोग अपने अलग-अलग विचारों के साथ ब्रिटिश राज तंत्र का विरोध कर रहे थे. सबके अपने-अपने तरीके थे. गांधी का रास्ता भगत सिंह से अलग था, सुभाष का अलग था. वैसे ही तिलक-सावरकर का अलग था. 1907 के सूरत कांग्रेस में नरम दलियों और गर्म दलियों के बीच जो भयावह जूतमपैजार हुआ था, उसकी रिपोर्ट पढ़ कर किसी को ऐसा ही लग सकता है कि इसमें जरूर कोई एक पक्ष अंग्रेजों से मिला हुआ है. गांधी के राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने तिलक को कांग्रेस से बाहर कर दिया. क्या तिलक राष्ट्रद्रोही थे? तिलक जैसा व्यक्ति कभी कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बन सका. उनकी हसरत दिल में ही रह गई. यह सब हमारा इतिहास है. जिस मुआफीनामे के बारे में राहुल गांधी से लेकर इस सदी में जन्मे बच्चे तक डिंग मार रहे हैं, जरा उस पर भी विचार कीजिए. सावरकर महाराष्ट्र से थे . वहां उनकी परंपरा में शिवाजी महाराज थे. शिवाजी माफी मांग-मांग कर मुगलों पर चढ़ बैठते थे. धोखे से अफजल खान को बुलवाया और गले मिलते समय सीने में बघनखे उतार दिए. सावरकर केलिए हीरो तो शिवाजी थे. गांधी जी की नैतिक राजनीति का उन्होंने कभी दावा भी नहीं किया था. यह सब हमें ध्यान में रखना चाहिए. और सावरकर पर सवाल उठाने वाले लोगों को यह भी जानना चाहिए कि 1931 में जब भगत सिंह को फांसी दी जा रही थी तो पूरे देश का गुस्सा गांधीजी पर इसी बात केलिए था कि उन्होंने उनकी जान बचाने के लिए अंग्रेजों से बात क्यों नहीं की. गांधीजी बात यदि करते तो निवेदन-दया याचना ही तो करते. यही तो मुआफी होती है. सावरकर के हिंदुत्व के विचारों से मैं असहमत हूँ, लेकिन उनकी काबिलियत का प्रशंसक हूं. बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में देश में हिंदू महासभा, अनुशीलन समिति और आरएसएस नामक तीन हिंदू संगठन चल रहे थे. मुस्लिम लीग और नेशनल गार्ड नाम से दो मुस्लिम संगठन चल रहे थे. कम लोगों को मालूम है कि 1945-46 में मुस्लिम नेशनल गार्ड अपने संख्या बल और प्रभाव में आरएसएस से ढाई गुना था. उसका आतंक जब 16 अगस्त 1946 को कोलकाता में मचा तब कांग्रेसी तो घरों में घुस गए थे, अनुशीलन समिति के लोगों ने ही कोलकाता में हिन्दुओं की रक्षा की थी. हालांकि पहले दौर में पांच हजार से अधिक मारे जा चुके थे. पंजाब में संघ के लोगों ने नेशनल गार्ड का सामना किया था. बंटवारे के समय नेहरू किसी हिंदूवादी नेता की तरह पंजाब और बंगाल के विभाजन पर यह कहते हुए अड़ गए थे कि इतनी बड़ी संख्या में हम हिन्दुओं को वहां नहीं छोड़ सकते. जिन्ना लगातार पूरे पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे और अंग्रेजों ने भी मन बना लिया था. इन सब बातों को हमें समझना चाहिए. राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को एकमुखी बनाने के चक्कर में कभी हम सावरकर को गाली देते हैं, कभी सुभाष को और कभी कम्युनिस्टों को. सावरकरवादी गांधी और नेहरू को गाली देकर अपना धर्म निभाते हैं. हमें अधिक उदार और गंभीर हो कर इतिहास का अध्ययन करना चाहिए. न हम गांधी को भूल सकते हैं, न गफ्फार खान को, जिन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत में मुस्लिम लीग को शिकस्त दे कर भारत का परचम उठाए रखा. जब दो हिस्सों में पाकिस्तान बन सकता था तो भारत भी बन सकता था. यही तो गफ्फार खान साहब का स्वप्न था. वह पाकिस्तान में नहीं शामिल होना चाहते थे. लेकिन आज़ाद भारत में हमने उन्हें भुला दिया. हमने सुभाष बोस, भगत सिंह सबको भुला दिया. अब कोशिश हो रही है कि नेहरू-गाँधी को खलनायक बना दिया जाए. जवाबी कोशिश है कि सावरकर को मिटा दिया जाए. क्या इसी रास्ते से मजबूत भारत बनेगा? आज़ादी के 75 वें जलसे पर हम कुछ बेहतर सोच और कर सकें तो अच्छा. कीचड़- युद्ध से कोई समाज नहीं बनेगा. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. 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