
श्रीनिवास
दो दिन पहले मेरी बहन ने फोन करके पूछा- आपको दादी का नाम याद है? मैंने कुछ देर सोचा; मुझे याद नहीं आया, शर्मिंदा हुआ! नानी का नाम भी याद नहीं था. बहन को तो याद नहीं ही था, एक नाम कौंधा था- फिर लगा, कहीं यह बड़ी फूफू का नाम तो नहीं! फिर देर तक सोचता रहा कि क्या यह हमारे समाज में, परिवारों में स्त्री की हैसियत का द्योतक नहीं है कि उसका कोई नाम नहीं है? कि उसे नाम की जरूरत ही नहीं है? उसकी पहचान सिर्फ फलां की पत्नी या फलां की मां या फलां गांववाली होकर रह गयी; और किसी को स्त्रियों का ‘बेनाम’ हो जाना अखरता भी नहीं!
शादी के बाद उपाधि बदलना अलग बात है, लेकिन नाम का गुम हो जाना कुछ अजीब नहीं लगता? जब तक शादी नहीं हुई, लड़की को लोग उसके नाम से जानते हैं; शादी के बाद नाम की जरूरत नहीं रह जाती! उसके बाद उसका वजूद किसी की मां, किसी की पत्नी, किसी की दादी के रूप में रह जाती है! हो सकता है- आपमें से कुछ लोगों को याद हो. मुझे अपने दादा के दादा का नाम याद है, पर दादी का नहीं! मेरे भैया को याद हो सकता है, उन्होंने वंशावली बनाई है, खोज-खोज कर लोगों का नाम लिखा है, उसमें पुरुषों के तो नाम हैं, लेकिन सबों की पत्नी का नहीं, मिला ही नहीं! संतानों में बेटों का नाम है; बेटियों के बारे में सिर्फ यह लिखा है कि उसका विवाह किस गांव में हुआ!
हम जानते हैं कि ‘वंशावली’ बेटों से बनती है, इसीलिए वंश चलाने के लिए पुत्र चाहिए! इसीलिए हम कन्या भ्रूण की हत्या करते हैं! फिर भी गर्व से कहते हैं कि हम तो स्त्री को देवी का दर्जा देते हैं, उसे दुर्गा, काली और लक्ष्मी आदि मानते हैं!
दूसरे धार्मिक समुदायों में स्त्रियों की कितनी दुर्दशा है, इससे मर्माहत जरूर रहते हैं! लेकिन स्त्री मात्र का सम्मान करने का दावा करते हुए शर्म नहीं आती!
कल शाम मुहल्ला कमेटी की बैठक में गये थे. आठ लोग थे. पूछा- दादी का नाम याद है? सिर्फ तीन को याद था!