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महिमा घटी समुद्र की रावण बसा पड़ोस

राहुल गांधी वियतनाम निकलने से पहले शिव की बरात निकाल चुके हैं. यह बात अलग है कि वह बरात “हिमवान” यानी सुप्रीम कोर्ट के चौखट से ही लौट आयी. उन्होंने घोषणा तो की थी तांडव की, लेकिन बरात में जो कुछ हुआ वह तांडव तो कतई नहीं था. पता नहीं किस “बेवकूफ” ने उन्हें समझा दिया था कि शिव जी ने अपनी बरात में तांडव किया था.
 
टिप्पणी

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बैजनाथ मिश्र

शिव सेना (उबाठा) के नेता संजय राउत की मानें तो भारत में “रिजीम चेंज” होगा. यहां भी कुछ वैसा ही होगा जैसा अल्बानिया में हो रहा है. यानी सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट सब जलाये जाएंगे. संसद फूंकी जाएगी और सरकार कुछ नहीं कर पाएगी. बस इंतजार है राहुल गांधी के वियतनाम से लौटने का. 

 

राहुल गांधी वियतनाम निकलने से पहले शिव की बरात निकाल चुके हैं. यह बात अलग है कि वह बरात “हिमवान” यानी सुप्रीम कोर्ट के चौखट से ही लौट आयी. उन्होंने घोषणा तो की थी तांडव की, लेकिन बरात में जो कुछ हुआ वह तांडव तो कतई नहीं था. पता नहीं किस “बेवकूफ” ने उन्हें समझा दिया था कि शिव जी ने अपनी बरात में तांडव किया था. 

 

राहुल को भारतीय मनीषा के बारे में कोई ज्ञान तो है नहीं, इसलिए उन्होंने तांडव का मतलब उपद्रव टाइप का कोई कृत्य समझ कर घोषणा कर दी. वैसे तांडव नृत्य तो महादेव ने ही किया था. तो क्या परम सेक्लुयर राहुल खुद को महादेव समझ बैठे हैं? अगर ऐसा ही है और उन्हें शिव की शक्ति प्राप्त हो गई है, तो वह प्रलय नृत्य करते क्यों नहीं. शायद वियतनाम से लौटने के बाद करेंगे. उन्होंने संभवतः संजय राउत को बताया होगा कि प्रयलंकारी तरकीबों की ट्रेनिंग विदेश में ही मिलती है. इसीलिए संजय आशान्वित और उत्साही हैं. 

 

खैर, जरा शिव बरात की बात करें. उसमें तो महादेव यानी राहुल ने शिव कुमार (डीके) की कालर खींचकर पीछे कर दिया और कुछ बरातियों को कुहनी मारकर व्यथित कर दिया. देशभर से बुलाये गये बरातियों में कितने भूत-प्रेत थे, कितने मुखहीन और कितने बहुमुखी थे, इसकी गणना पता नहीं हुई या नहीं. लेकिन जलवा था तो केवल रक्तपिपासुओं की लाडली नेहा वोरा का. 

 

राहुल के साथ अगली कतार में उनकी बहन प्रियंका और नेहा ही थीं. लगता है कि किसी ने बताया होगा कि ओरिजनल गांधी बनने के लिए महिलाओं के कंधे पर हाथ रखकर चलना जरुरी है.

 

बहरहाल, कुछ नामचीन बरातियों के साथ राहुल रजिस्ट्री तक ही जा सके और त्रुटियों से भरी मनोकामना पूर्ण करने के अनुरोध वाली याचिका देकर लौट गये. इस बरात के आयोजन पर हुए खर्चा-पानी और जमा-हासिल पर गौर करें तो कहना पड़ेगा कि खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा बारह आना. ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए नोटिस भेज दिया कि कोई भी डराने की कोशिश न करे. पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की सो अलग. एक महिला पत्रकार ने बाकायदा मुकदमा दर्ज करा दिया. 

 

इस अनूठे बरात कार्यक्रम से प्रसन्नचित्त राहुल गांधी ने अगले दिन अपने आवास पर कुछ नामी लोगों को चाय पर बुलाया. इनमें सहयोगी पार्टियों के नेताओं के अलावा तीन महानतम लोग- नेहा वोरा, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण भी थे. चाय से गला गर्म हो जाने के बाद एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस टाइप कुछ हुआ. नेताओं ने तो वही सब कहा जो हर नेता ऐसे मौकों पर कहता है. लेकिन नेहा वोरा ने एक तरह से महफिल लूट ली. उन्होंने बेशर्मी के साथ कहा कि वह बंग्लादेश में जो कुछ हुआ उससे अनुप्रेरित हैं. 

 

संदेश साफ था, यहां भी वैसा ही होगा. लेकिन किसी ने उन्हें रोका-टोका नहीं. प्रशांत भूषण पहले ही कह चुके थे लड़ाई गलियों में होगी. खून-खराबा भी होगा. लेकिन इस सरकार को हटाने के लिए दूसरा कोई रास्ता नहीं है. उन्होंने प्रेस क्लब में ही संवाददाताओं से कह दिया था कि रिजीम चेंज होगा और होकर रहेगा. 

 

योगेंद्र यादव तो शुरु से ही संसद के बदले सड़क से फैसले की हांक लगाते रहे हैं. शाम होते-होते जब भाजपा नेहा और प्रशांत के बयानों को आधार बनाकर विपक्ष पर चढ़ बैठी तो कांग्रेस के हांथ-पांव फूल गये. कांग्रेस के अंदर भी खलबली मच गई. डैमेज कंट्रोल के लिए जयराम रमेश सक्रिय हुए और पवन खेरा ने “रिजीम चेंज” को सत्ता परिवर्तन बताकर लीपापोती करने की कोशिश की. 

 

एक पत्रकार ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपाइयों को अंग्रेजी नहीं आती है, इसलिए उन्हें रिजीम चेंज को खूनी संघर्ष समझ लिया. लेकिन इस पत्रकार महोदय को कौन समझाये कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज के शब्दकोशों में रिजीम चेंज का मतलब जबरन व बलपूर्वक सत्ता हथियाना होता है. ये पत्रकार प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव गिरोह के ही सदस्य रहे हैं. 

 

वैसे भी रिजीम चेंज का सीधा मतलब होता है तख्ता पलट और तख्ता पलट बिना ख़ून-खराबे, आगजनी तोड़फोड़ के नहीं होता है. अब संजय राउत इसी शैली के निर्णायक कार्यक्रम के लिए राहुल की बाट जोह रहे हैं और कांग्रेसी ऐसे किसी अभियान से पल्ला झाड़ रहे हैं. 

 

कांग्रेसियों को पता है कि देश हिंसक कार्यक्रमों के विरोध में खड़ा हो जाएगा. यही कारण है कि आनंद शर्मा, शशि थरुर और मनीष तिवारी जैसे नेता रिजीम चेंज का विरोध कर रहे हैं. सवाल यह है कि राहुल गांधी इस तरह रिजीम चेंज को भावार्थ में लेंगे, शब्दार्थ में या फिर व्यावहारिक अर्थ में? 

 

फिलहाल कांग्रेस के छात्र संगठन (एनएसयूआई) और युवक कांग्रेस के बीच से यह आवाज उठने लगी है कि पहले डफली गैंग के सरगना कन्हैया कुमार को एनएसयूआई का प्रभारी बना दिया गया और अब नेहा वोरा को कांग्रेस के युवा नेताओं पर तरजीह क्यों दी जा रही है? 

 

सही है कि एनएसयूआई छात्र संघ चुनावों में अच्छा नहीं कर पा रही है, लेकिन क्या नेहा की आइसा उससे बेहतर है? क्या नेहा या उनका संगठन किसी भी विश्वविद्यालय के छात्र संघ का कोई चुनाव जीत पाया है? 

 

एनएसयूआई आज भी एक मजबूत और जुझारू संगठन है, लेकिन यदि कांग्रेस नेतृत्व को कन्हैया कुमार और नेहा जैसे उच्छृंखल, जहरीले और फालतू नेता ही पसंद हैं तो फिर एनएसयूआई और युवक कांग्रेस की जरूरत ही क्या है? क्या कांग्रेस में ऐसी कोई युवती नहीं थी जो “शिव बरात” में राहुल के साथ अगली कतार में चल सके? यदि हां तो क्या कांग्रेस अब सिर्फ उधार के सिंदूर से ही सुहागन बनना चाहती है? 

 

तमाम गिरावट के बावजूद कांग्रेस स्थापित पार्टी है. सिद्धांत और विचार पर आधारित देश की सबसे पुरानी. वह अब भी आधे-अधूरे मन से ही सही, गांधी को अपना आदर्श मानती है. वह कांग्रेस यदि उन वामपंथी संगठनों के युवाओं-नेताओं को अपने सिर पर बैठाने लगेगी जो गांधी को गरियाते रहे हैं और जो अपनी राह की रुकावटों को बलपूर्वक हटाने में यकीन करते हैं तो कांग्रेस का बचा-खुचा आधार भी खिसक जाएगा. 

 

जब अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल (सुप्रीम कोर्ट के जज) जिंदा हैं, जैसे नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार को सिर पर बैठाया जाएगा, उमर खालिद और सरजिल इमाम की रिहाई के लिए बेताब नेहा को आंदोलन का पोस्टर गर्ल बना दिया जाएगा और वह भारत में बांग्लादेश जैसे हालात के लिए माहौल बनाने में लगी रहेगी, तब आम कांग्रेसी पार्टी की परंपरागत राह पर चलें या देश विरोधी अभियान में जुटें? 

 

दरअसल, राहुल इन दिनों वामपंथियों के दबाव में हैं. इन वामपंथियों का दाना-पानी जनता ने बंद कर दिया है. नक्सली मारे जा चुके हैं या जेल में हैं. इसलिए ये राजनीति में हिडमा गिरोह बनाने में लगे हैं और उन्हें उर्वरक दे रहे हैं राहुल गांधी. 

 

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को ही देख लीजिए. ये दोनों कांग्रेस की सरकार के विरुद्ध अण्णा हजारे के आंदोलन के हरावल दस्ते में थे. उसका फायदा उठाकर जब केजरीवाल ने दिल्ली लूट ली तो ये हिस्सा मांगने पहुंच गये. उन्हें धकियाकर बाहर कर दिया गया. उसी आंदोलन की तपिश पर अपनी रणनीति की रोटी सेंककर भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता पर काबिज हो गई. 

 

अब ये दोनों मोदी सरकार को छल-बल से हटाने के कुचक्र लगे हैं. ये आदतन विघ्नसंतोषी जीव हैं. ये कोई चुनाव जीत नहीं सकते हैं, लेकिन चुनाव जीतने का गुर सिखाते हैं और माहौल बनाने का दम भी भरते हैं. 

 

राहुल को ऐसे ही लोग पसंद हैं जो अतिवादी हैं और जिनकी भाषा-शैली उग्रवादियों-आतंकवादियों जैसी हो, कम से कम लंपटों जैसी तो हो हीं. विश्वास न हो तो मीडिया चैनलों पर कांग्रेस के तुर्रम खां प्रवक्ताओं के बोल वचन सुन लीजिए. 

 

इस बीच केरल कांग्रेस ने अपने ऑफिशियल वेबसाइट के जरिए चीफ जस्टिस का ही इस्तीफा मांग लिया और यह भी कह दिया कि नये चीफ जस्टिस की नियुक्ति शीघ्र कर ली जाएगी. यह खबर पसरते ही पोस्ट हटा दी गई लेकिन कांग्रेस में इसी पैटर्न वालों की ही चलती है. 

 

उधर, अरविंद केजरीवाल युवाओं को ललकार रहे हैं- कैसी है तुम्हारी जवानी, कैसे हो तुम लोग? जो काम बांग्लादेश, नेपाल के युवा कर सकते हैं, वह तुम क्यों नहीं कर सकते हो? केजरीवाल ने अपनी जरूरत के लिए एक बूढ़े को अनशन पर बैठा दिया था और दिल्ली की गद्दी मिलने के बाद खुद शीश महल चले गये थे. फिर भी यदि हिंसक आंदोलन जरुरी है तो वह अपने बेटे-बेटियों को आगे क्यों नहीं ला रहे हैं? यह सवाल उन सभी नेताओं से है जो देश जलाने के लिए युवाओं को बरगलाने पर आमदा हैं. 

 

बहरहाल, कांग्रेस आयातित नेताओं और विचारों के कारण फंस गई है. राहुल यह समझ क्यों नहीं रहे हैं कि रावणों को साथी बनाएंगे तो समुद्र लंघन का असंभव कार्य भी होगा और उस पर पुल भी बन जाएगा. सोहबत गलत होगी तो परिणाम अच्छा नहीं होगा. रहीम ने कहा है- 

बसि कुसंग चाहत कुशल, कह रहीम जिय सोस |

महिमा घटी समुद्र की, रावण बसा पड़ोस ||

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