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शिवराज व हिमंत की राह झारखंड में आसान नहीं

- लोस चुनाव के परिणाम के बाद सांगठनिक एकता तार-तार - खूंटी से लेकर संथाल तक भाजपा में मचा है घमासान - क्या लक्ष्मीकांत बाजपेयी को साइड लाइन करने की है तैयारी - बाबूलाल के लिए आदिवासी साख पुन: पाना होगी अग्निपरीक्षा Kaushal Anand Ranchi : झारखंड में होनेवाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा आलाकमान में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व सरमा को जिम्मेदारी सौंपी गयी है. नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि झारखंड में पार्टी के वर्तमान सांगठनिक ढांचे और नेतृत्वकर्ता से विधानसभा की नैया पार नहीं हो पाएगी. आने वाले दिनों में वर्तमान प्रदेश प्रभारी लक्ष्मीकांत वाजपेयी की छुट्टी हो जाए, तो कोई अचरज वाली बात नहीं होगी. भाजपा आलाकमान ने यह भी संकेत दे दिया है कि आगामी दिनों कई अन्य बड़े निर्णय हो सकते हैं. मगर शिवराज और हिमंत के लिए केवल चार महीने में पार्टी को जीत की दहलीज पर ले जाना और राज्य में डबल इंजन की सरकार बनाना, इतना आसान नहीं होगा. पार्टी अभी तुरंत ही लोकसभा चुनाव में राज्य की पांचों आदिवासी आरक्षित सीट हार गयी है. वहीं विधानसभा की बात करें, तो झारखंड में कुल 28 सीट आदिवासी आरक्षित हैं. गत विधानसभा चुनाव में पार्टी को 26 सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा था. अब इन दोनों चुनाव प्रभारियों के लिए न केवल आदिवासियों का विश्वास जीतना, बल्कि अधिक से अधिक से आदिवासी सीटें अपनी झोली में डालना बड़ी चुनौती होगी. इसके साथ ही गैर आदिवासी वोटरों को अपने पक्ष में साधना टेढ़ी खीर से कम नहीं होगी.

लोस चुनाव में नौ सीटें जीत कर भी पार्टी में खामोशी

लोकसभा चुनाव में राज्य की 14 सीटों में भाजपा के खाते में नौ सीटें आईं. इसके बाद भी पार्टी से लेकर संगठन में खामोशी है. वहीं खूंटी से लेकर संथाल तक घमासान मचा है. संगठन में आपसी सिरफुटव्वल का दौर जारी है. खूंटी के पूर्व सांसद और पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष कड़िया मुंडा ने खूंटी समेत अन्य आदिवासी सीटों पर पार्टी को मिली हार के लिए एक कड़ा पत्र भाजपा नेतृत्व को लिखा है. उन्होंने आलाकमान से आत्ममंथन करने का आग्रह किया है.

एक-दूसरे पर मढ़े जा रहे हैं आरोप, प्रदेश नेतृत्व चुप

झामुमो छोड़ कर भाजपा में गयीं सीता सोरेन ने दुमका लोकसभा सीट से अपनी हार के लिए पार्टी के बड़े नेताओं (बाबूलाल मरांडी, लुईस मरांडी, रंधीर सिंह) पर अरोप मढ़ कर सनसनी फैला दी है. वहीं गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे और दलित विधायक नारायण दास के समर्थकों के बीच मारपीट, गाली-गलौज ने पार्टी व संगठन की पोल खोल कर रखी दी है. प्रदेश नेतृत्व तमाम मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है. इन सब से पार पाना और फिर से पार्टी व संगठन को एक धागे में पिरोना दोनों नवमनोनीत चुनाव प्रभारियों के लिए आसान नहीं होगा. वहीं प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी के लिए आदिवासी साख पुन: पाना अग्निपरीक्षा होगी.

बिल्कुल अलग है झारखंड की राजनीतिक परिस्थिति

नि:संदेह शिवराज सिंह चौहान और हिमंत बिश्व सरमा की कार्यक्षमता पर किसी को कोई शक नहीं है. इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने इन्हें झारखंड की कमान सौंपी है. मगर झारखंड की राजनीतिक परिस्थिति और मुद्दे मध्य प्रदेश और असम से बिल्कुल भिन्न हैं.

इन मुद्दों पर आदिवासी समाज को विश्वास में लेना आसान नहीं होगा

- झारखंड में जल, जंगल और जमीन एक अहम मुद्दा है. इस पर आदिवासी समाज की सोच भाजपा के दृष्टिकोण से बिल्कुल भिन्न है. - सरना धर्म कोड की मांग झारखंड के आदिवासियों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है. इस पर भाजपा और केंद्र अब तक खामोश रही है. - झारखंड के आदिवासी यूसीसी कानून का विरोध कर रहे हैं. इसे आदिवासी परंपरा और संस्कृति को खत्म करने की साजिश बता रहे हैं. - जनगणना फॉर्म से अन्य का कॉलम हटा देने से झारखंड के आदिवासी नाराज हैं. इसे आदिवासी समाज बड़ी साजिश बता रहे हैं. - वनाधिकार कानून और वन संरक्षण अधिनियम से ग्राम सभा के पावर को विलोपित करने से झारखंड के आदिवासियों में आक्रोश है. - देश के एकमात्र आदिवासी सीएम रहे हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद आदिवासी समाज इसे भाजपा की साजिश मान रहा है. - कुरमी समाज खुद को एसटी सूची में शामिल नहीं करने का जिम्मेवार भाजपा की नीतियों और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा को मानता है.

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