लगभग सभी अखबारों में आज दो खबरें पहले पन्ने पर हैं. एक में पीएम की घोषणा-फास्ट ट्रैक कोर्ट व नया कानून बनाने, सख्ती-शिक्षा सचिव का हटाना और उनका पीड़ा वाला बयान छपा है. दूसरी खबर छोटी है, लेकिन अभी के वक्त में महत्वपूर्ण. नीट-2024 पेपर लीक का आरोपी संजीव मुखिया को सीबीआई का क्लिनचिट मिलना. विपक्ष संजीव मुखिया के परिवार का एनडीए के नेताओँ से रिश्ते का आरोप फोटो दिखाकर लगा चुका है.
अब आते हैं असल मुद्दे पर. पहली यह कि पीएम नरेंद्र मोदी ने गुरुवार की रात 12 बजे इंस्टाग्राम के हिसाब से जारी वीडियो में कहा है आज यानी शुक्रवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून बनाने जा रहे हैं. इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया पर उनका 2024 का वीडियो तेजी से फैल रहा है. संसद में वह लगभग यही बात कह रहे हैं. कह रहे हैं कि पेपर लीक गंभीर मामला है. उनकी सरकार ने सख्त कानून बनाया है. कठोर कार्रवाई होगी. फिर वह अब किस कानून की बात कर रहे हैं. क्या 2024 में उनकी सरकार ने कमजोर कानून बनाया था.
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दूसरी बात यह कि जंतर-मंतर समेत देश भर में प्रदर्शन कर रहे छात्र इस तरह की घोषणाओं, तबादले, सख्त कानून, कड़ी कार्रवाई की मांग कर ही नहीं रहे हैं. वह तो पेपर लीक के जिम्मेदार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. अपने लिए शिक्षा-रोजगार की बात कर रहे हैं. वह मांग कर रहे हैं कि उन्हें कॉकरोच ना समझा जाये. पीएम ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है. साफ है कि सरकार अब भी अकड़ में है. वह अब भी उस बात पर कायम है कि इस्तीफा भाजपा के डीएनए में नहीं है.
अगर पीएम मोदी सच में यह मानते हैं कि छात्रों की मांग जायज है, तो फिर उन्होंने अपनी पार्टी के उन नेताओं की आलोचना क्यों नहीं की, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान ने कहा- छात्र नहीं दहशतगर्द हैं, सांसद योगेंद्र चंदौलिया ने कहा- छात्र नहीं भेड़िए हैं, सांसद मदन राठौर ने कहा- छात्र नहीं भाड़े के टट्टू हैं. ऐसे नेताओं को साथ रखकर पीएम मोदी चाहते हैं कि उनकी बात सुनकर छात्र खुश होकर कहने लगे सचमुच बागो में बहार है.
तीसरी बात यह कि पीएम किस कानून की बात कर रहे हैं. कैसा कानून? कौन जांच करेगा. वही सीबीआई. जिसे पूर्व की सरकार में पिंजरे का तोता कहा गया था. आज भी उसमें क्या बदला है. संजीव मुखिया को कौन नहीं जानता? सैकड़ों-हजारों डॉक्टर्स-इंजीनियर की अंतरात्मा जानती है कि उन्हें कैसे और किस कीमत पर नामांकन मिला. वह संजीव मुखिया बरी हो गया. पता नहीं क्यों राज्यों में विपक्ष हर बात में सीबीआई जांच की मांग क्यों करने लगता है, जबकि राजनीतिक हस्तक्षेप की वजहों से देश की यह प्रीमियम एजेंसी अब जिलों की पुलिस जैसी भी नहीं रही.
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असल में समस्या यह है कि यह पूरा सिस्टम ही सड़ गया है. गल गया है. नेता-अफसर सिर्फ पैसे बनाने में लगे हुए हैं. अकूत संपत्ति बना रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, देहरादून, बैंगलोर, गोवा जैसे शहरों में जमीन खरीद रहे हैं, फॉर्म हाउस बना रहे हैं. पता नहीं उन्हें कितनी संपत्ति चाहिए. नौकरी शुरु करने से लेकर रिटायरमेंट तक और कुछ लोगों के मामलों में तो बाद में भी संपत्ति अर्जित करने का नशा उतरता ही नहीं है. और जिसके पास पैसा (चाहे जैसे भी कमाया हो) है, वह खुद को हर कानून से ऊपर मानते हैं. सीबीआई-ईडी जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल और विफलता चीख-चीख कर कह रहे है कि पूरा सिस्टम ही खराब हो गया है.
इसलिए अगर सच में छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ना हो इसके लिए जरूरी है कि ईमानदारी से कानून बने. कानून का ईमानदारी से पालन हो. अफसरों को कानून के हिसाब से काम करने की आजादी हो. जिम्मेदारी तय हो. गलत गिरफ्तारी पर कार्रवाई हो. फंसाने वालों को जेल भेजें. लेकिन जो दोषी नहीं, उसे तंग ना किया जाये. हर मामले में राजनीतिक प्रतिशोध को घुसेड़ने के रास्ते बंद हो. तभी सिस्टम में सुधार संभव है.
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