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जनता हिन्दू कहलाकर प्रसन्न है और हिन्दू कहलाने के लिए भाजपा का मतदाता होना अनिवार्य!

यहीं से फिर यह कथानक भी उभरकर सामने आता है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार किया गया था और अगर हम भारतीय जनता पार्टी को बंगाल में नहीं जिताते तो वहां भी यही नौबत आने वाली थी! आप भारतीय जनता पार्टी के किसी भी समर्थक और वोटर को कुरेदिये- उसके भीतर से यही सामने आएगा. उसके पास इसके सिवा कोई एजेंडा नहीं है, कोई स्वप्न भी नहीं है, कोई आकांक्षा नहीं है. वो इसके लिए तमाम तरह की महंगाई-बेरोजगारी, प्राकृतिक-संसाधनों के दोहन, भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन को बर्दाश्त करने को तैयार हैं.
 

Sushobhit

एक बार को हम मान भी लें कि लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत से वंचित कर देने वाला जनमत उसके बाद से हुए विधानसभा चुनावों में सहसा हृदय-परिवर्तन के ज्वार के वशीभूत होकर स्वेच्छा से ही उसकी झोली में भर-भरकर वोट डाल रहा है और इसमें कहीं कोई व्यवस्थागत-विसंगति नहीं है. तब भी एक यक्ष प्रश्न हमारे सामने मुंह बाए खड़ा रहता है. और वो यह है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जिस आसन्न गृहयुद्ध, मनोवैज्ञानिक संघर्ष और शक्ति-संतुलन का नैरेटिव लगातार हिन्दुत्व की विचारधारा के द्वारा न केवल ठेला जा रहा है, बल्कि उसे सामूहिक-अवचेतन में गहरे तक रोप दिया गया है, क्या आज भारत-राष्ट्र में इससे बड़ा कोई और राजनैतिक प्रश्न है?

 

क्योंकि आप मानें ना मानें, भारतीय जनता पार्टी का बुनियादी-नैरेटिव यही है. इसके सिवा उसका कोई विचारधारागत आधार नहीं है. उसकी विदेश-नीति, अर्थ-नीति, महिला-कल्याण, लोकलुभावनवाद, विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर, ये सब मुखौटे हैं. उसके मतदाता भलीभांति जानते और मानते हैं कि यह सब तो कोई दूसरी सरकार भी कर देगी. इन चीजों के लिए वो भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं देते, मुसलमानों पर अपने परिकल्पित वर्चस्व को बनाये रखने के लिए वोट देते हैं.

 

यहीं से फिर यह कथानक भी उभरकर सामने आता है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार किया गया था और अगर हम भारतीय जनता पार्टी को बंगाल में नहीं जिताते तो वहां भी यही नौबत आने वाली थी! आप भारतीय जनता पार्टी के किसी भी समर्थक और वोटर को कुरेदिये- उसके भीतर से यही सामने आएगा. उसके पास इसके सिवा कोई एजेंडा नहीं है, कोई स्वप्न भी नहीं है, कोई आकांक्षा नहीं है. वो इसके लिए तमाम तरह की महंगाई-बेरोजगारी, प्राकृतिक-संसाधनों के दोहन, भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन को बर्दाश्त करने को तैयार हैं. 

 

वो मन बना चुका है कि चाहे जो हो जाए, मुझे भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करना है. वो बिलकुल मुग़ालते में नहीं है कि यह पार्टी नैतिक तौर-तरीकों से संचालित हो रही है, भ्रष्टाचार से दूर है और उसके नेता नेकी के पुतले हैं. उसे उनकी हकीकत न केवल अच्छी तरह से पता है, उलटे वो इस पर फिदा भी है. वो इसे उसकी साम-दाम-दंड-भेद की मेधावी-आजमाइश समझकर गौरवान्वित होता है. नायक का प्रतिनायकत्व उसने स्वीकार कर लिया है. उसे सत्य, अहिंसा, न्याय, नैतिकता से अब कोई मतलब नहीं, केवल और केवल एक अमूर्त हिन्दू-पहचान से मतलब है.

 

भारत के मुस्लिम-समुदाय ने भी इस पूर्वग्रह के निर्माण में अपनी ओर से योगदान दिया है- ईशनिंदा के आरोप में उनका समूह में सड़कों पर उतर आना और हिंसक हो जाना भारतीय जनता पार्टी को लगातार अपने मनपसंद नैरेटिव का वह ईंधन प्रदान करता है, जिससे उसके डबल इंजिन दिल्ली और देश के राज्यों में सरपट दौड़े चले जा रहे हैं.

 

हम इस दुष्चक्र से बाहर कैसे निकलेंगे, यह स्पष्ट नहीं है. अतीत में महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकारें बदल जाती थीं, आज सरकार को यह आत्मविश्वास है कि इन मुद्दों को अप्रासंगिक बना दिया गया है और जनता अब उससे सुशासन मांग भी नहीं रही. जनता हिन्दू कहलाकर प्रसन्न है और हिन्दू कहलाने के लिए भारतीय जनता पार्टी का मतदाता होना अनिवार्य मान लिया गया है.

 

यह एक निगेटिव-आइडियोलॉजी है. 2014 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने विकास के नाम पर पॉजिटिव-वोट के लिए लड़ा था. उस चुनाव प्रचार-अभियान की भाषा, शैली, भंगिमा दूसरी थी. उस समय यह ऐहतियात जरूरी थी. वह एक दूसरा भारत था. उस पर अब भी यूपीए-संस्कृति की छाप थी. उसके बाद के 12 वर्षों में प्रणालीगत तरीके से उस भारत को नष्ट किया गया है और अब तो राजनैतिक वक्तव्यों में योगी आदित्यनाथ और हिमंता बिस्वा सरमा जैसों के द्वारा सार्वजनिक शिष्टाचार के स्वांग का भी परिचय नहीं दिया जाता. मुखौटा उतर गया है. और जो सामने प्रकट हुआ है, भारत की जनता ने उसे स्वीकार लिया मालूम होता है.

 

भारतीय जनता पार्टी के समर्थक वर्ग से फौरी संवाद करने पर भी इनकी विचार-प्रक्रिया आपके सामने स्पष्ट हो जाएगी. इनमें से कुछ सवर्णवादी हैं, जो यूजीसी पर चिढ़ जाते हैं. कुछ पितृसत्तावादी पारिवारिक ढांचे के समर्थक. कुछ स्त्री द्वेषी. कुछ अशिक्षा और अंधविश्वास के जीवंत पुतले. किन्तु इनकी कोर-वैल्यू एक ही है- इस्लामिक चुनौती के परिप्रेक्ष्य में हिन्दुत्व के संरक्षण-संवर्द्धन को ​चिह्नित करना.

 

अगर इनसे इस्लामिक संदर्भ के बिना हिन्दुत्व की कोई परिभाषा रचने को कहा जाये तो ये संज्ञा शून्य हो जावेंगे. अवाक् रह जाएंगे. इनके पास हिन्दुत्व का वैसा कोई नक़्शा, वैसी कोई परियोजना नहीं है, जिसमें कोई इस्लामिक-चुनौती सामने ना हो. वहीं से उन्हें अपनी अर्थवत्ता और प्रासंगिकता प्राप्त होती है.

 

इनका हिन्दू राष्ट्र भी इस्लामिक संदर्भ से आलोकित होता है. कह लीजिये, वह पाकिस्तान का विलोम है. जैसे पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र है, वैसा ही भारत हिन्दू राष्ट्र होगा. लेकिन उस हिन्दू राष्ट्र के क्या मौ​लिक मूल्य होंगे, मान्यताएं होंगी, दृष्टि होगी और उसके निर्माण या उसकी औपचारिक घोषणा के बाद वो क्या करेंगे? इस पर वो मौन रह जाएंगे. मस्जिदों के सामने जुलूस निकालने और जय श्रीराम के नारे लगाने से बढ़कर उन्होंने इस बारे में अधिक कल्पनाएं नहीं की हैं. वह इसी में खुश हैं.

 

इस्लामिक चुनौती के परिप्रेक्ष्य से आलोकित होने वाला हिन्दुत्व, इसकी काट क्या है? शिक्षा, लोक विमर्श और प्रचार-तंत्र की वैसे नैरेटिव के निर्माण में क्या भूमिका हो, जो इस व्यामोह का खंडन करे और समाज कैसे इसमें अपना योगदान दे. इसी में भारतीय जनता पार्टी के पराभव का सूत्र निहित है. इस्लाम का हव्वा खत्म तो भारतीय जनता पार्टी खत्म. राजा के प्राण इसी तोते में बसे हुए हैं. तब वह इसे भला क्यों कर खत्म होने देगी? घोड़ा घास से दोस्ती कर लेगा तो खायेगा क्या?

डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार व टिप्पणीकार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया एकाउंट से साभार लिया गया है.

 

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