
बैजनाथ मिश्र
देश सावन में शिव के महिमा गायन का मासिक पर्व मना रहा है. शिव वागर्थ हैं. ऐसे जैसे वाणी और अर्थ चिपके रहते हैं. इसीलिए वह अर्द्धनारीश्वर भी हैं. वह महाकाल हैं. यानी समय के नियंता. समय के पांच अंग होते हैं. इन्हीं के आधार पर पंचांग बनते हैं. दुर्भाग्य यह है कि शिव के ही इस भारत में देश की राजनीति का पंचांग नहीं बन पा रहा है. हमारी सभी पार्टियों के पुरोहित सलाहकार योग बैठा भी ले रहे हैं तो कारण नहीं बता पा रहे हैं. नक्षत्र किसी के ठीक नहीं चल रहे हैं. सब एक-दूसरे के वैरी भाव में हैं. विलुप्तगामी पार्टियों को छोड़ दें तो बाकी सभी पर कमोबेश शनि की महादशा चल रही है. इसीलिए संसद नहीं चली. करीब डेढ़ सौ सांसदों ने लोकसभा को बंधक बना लिया. साढ़े तीन सौ टुकुर-टुकुर देखते रहे. राज्य सभा में भी यही स्थिति थी.
इससे हमारा संसदीय लोकतंत्र बलवान हुआ है. लगातार पराजय की पीड़ा से पैदा कीड़ा दिमाग खराब कर देता है. चाहिए तो चंद्र खिलौना, लेकिन करतब अधःपतन के. ऐसे में ग्रह कितनी मदद कर पायेंगे? दार्शनिक के लबादे में दुष्टग्रह सलाह दे रहे हैं कि फैसला सड़क पर होगा. संसद बेकार है. इस दार्शनिक महोदय को इस दर्शन की अभिव्यक्ति का अधिकार भी संविधान ही देता है. संसद उसकी विशिष्ट संरचना है. उसी संरचना के खम्भों पर प्रहार करते हुए देश के प्रथम सियासी खानदान के वारिस और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं कि वह सदन में गृह मंत्री का भाषण नहीं सुनेंगे. क्यों नहीं सुनेंगे, इसका कोई नियमसंगत और संविधान सम्मत उत्तर उनके पास नहीं हैं.
अमित शाह जनता के आदेश से बनी मोदी सरकार के गृह मंत्री हैं. जनता ने ही राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष बनने का मौका दिया है. उनके पास मौका था, अब भी है, लेकिन वह शॉर्ट कट वाले हैं और राजनीति में समय का उपयोग ही वरदायी होता है. जनता के अधिकारों के ये दोनों पहरेदार आपस में सवाल-जवाब नहीं करेंगे तो लोकतंत्र की रक्षा कैसे होगी?
संसद के न चलने पर भी सरकार को घाटा नहीं है. सरकार जरूरी बिल पास करा ही लेती है. जवाबदेही से बच भी जाती है. देखिए न, संसद से खनिज बिल पास हो गया. विपक्ष ने विरोध नहीं किया. बिल लटक सकता था. अब झारखंड के मुख्यमंत्री आंदोलन करना चाहते हैं. यह अल्पमत का बहुमत को अल्टीमेटम है. और वह भी दुनिया के विशालतम लोकतंत्र में.
स्वाधीनता दिवस के पहले कुछ ड्रामे हुए. एक तो कांग्रेस का रचनात्मक कार्यक्रम हुआ. उसके डायरेक्टर स्वाभाविक रुप से राहुल गांधी थे. आजकल वह रचनात्मकता में नहाये हुए हैं. उससे पहले उनके परम सेवादार पवन खेड़ा ने "छप्पन इंच का बंदर, नरेंद्र जल्दी आ संसद के अंदर" वाले कार्यक्रम से कांग्रेस को आत्मविभोर कर दिया था. दूसरे दिन रचनात्मक कार्यक्रम में राहुल ने अपना संकल्प दोहराया. मोदी-शाह को सोने नहीं दूंगा. पागल बना दूंगा. फिर हालात के वाचिक दर्शन कराये गये और विदेश नीति पर बढ़िया व्यंग्य किया गया. लेकिन उस व्यंग्यात्मकता का संदीप दीक्षित ने यह कह कर गुड़ गोबर कर दिया कि मलोनी समझ कर गले मिले थे क्या? बहुत थूका-फजीहत हुई. महसूस हुआ हो तो.
स्वाधीनता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय में तिरंगा फहराया गया. वंदे मातरम् भी बजा. शीर्ष नेतृत्व सावधान मुद्रा में था. लेकिन वंदे मातरम् का तीसरा पैराग्राफ शुरु होते ही सावधान की मुद्रा टूट गयी. यह कैसे गाया गया, गलत हो गया, इशारों में, आंखों में बात होने लगी. नेता सावधान की मुद्रा में लौटे. गीत पूरा हुआ. बाद में सफाई आयी कि खरगे साहब बहुत देर से खड़े थे. उनके लिए कुर्सी लाने का इशारा सोनिया जी कर रही थीं. पार्टी के बड़े बुजुर्गों की चिंता अच्छी बात है. लेकिन न कुर्सी लायी गयी न खरगे बैठे.
दो दिन बाद ही पार्टी की शीर्ष बॉडी ने यह निर्णय ले लिया कि 1937 में वंदे मातरम् के दो छंदों के गायन का प्रस्ताव कांग्रेस कमिटी में पास किया गया था. महान नेताओं के सुझाव पर वह प्रस्ताव पास हुआ था. लेकिन क्या किसी भी महान पार्टी के महान नेताओं द्वारा पारित कोई भी प्रस्ताव संसद से पारित कानून से बड़ा है? वंदे मातरम् को दो छंदों तक सीमित किया गया था मुस्लिम लीग के दवाब में. उम्मीद यह की गई थी कि इससे बंटवारे की हवा की रफ्तार कम होगी. लेकिन इस लोच ने भारी मोच पैदा कर दी और अंततः बंटवारा तो हुआ ही, वंदे मातरम् का भी बंटाधार हो गया.
जो गीत परतंत्र भारत में पूरा गाया जाता था, जिसे कांग्रेस के मुस्लिम अध्यक्ष भी अधिवेशनों में गाते थे, वह स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक हो गया है. जिस गीत को गाते हुए हमारे पूज्य शहीदों ने फांसी के फंदे चूम लिए, जेल यातनाएं झेलीं, लाठियां खायीं, गोलियां खायीं, जवानी कुर्बान कर दीं, वही गीत स्वाधीनता समर की कोख की स्वघोषित पैदाइश कांग्रेस पूरा गाने से इनकार कर रही है.
मान लीजिए कि यह भी एक क्रांति है. क्रांति कौन सा गुल खिलायेगी, इसकी परीक्षा 2027 के विधानसभा चुनावों के परिणाम से हो जायेगी. कभी वंदे मातरम् गाते हुए हमारे क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अलख जगाते थे, अब वही गीत नहीं गाकर कांग्रेसी जेल जायेंगे. उस दिन का बेसब्री से इंतजार रहेगा. संसद में सभी गा रहे थे, लेकिन बाहर आते ही उन्हें वोट की चिंता सताने लगी और स्टैंड बदल गया.
उधर, निहत्था हो गई भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ बड़ा मुद्दा मिल गया है. वह वंदे मातरम् को राष्ट्रवाद का प्रतीक बताते-बनाते हुए हिंदुत्व की चाशनी में डुबोकर जो डिस पेश करेगी उसका कोई तोड़ विपक्ष के पास नहीं होगा. 1937 में तो गोविंद बल्लभ पंत, राज गोपालचारी और संपूर्णानंद जैसे अनेक कांग्रेसी थे जिन्होंने वंदे मातरम् में कांट-छांट का विरोध किया था. लेकिन आज की कांग्रेस रीढ़विहीन लोगों से भरी है. पार्टी में चतुर्दिक पाखंडपूर्ण ओष्ठ सेवा का विस्तार हो रहा है. सहयोगी पार्टियां असमंजस में हैं. वे समझ नहीं पा रही हैं कि क्या करें. कानून तोड़े या साथ छोड़ें. कांग्रेस वंदे मातरम् नहीं ही गाती तो क्या बिगड़ जाता? लेकिन वह तो एलानिया कानून तोड़ेगी और राष्ट्रवादी होने का स्वांग भी रचेगी तो भरोसा कौन करेगा.
इसी बीच लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री ने दिमागी नक्सलियों से निपटने का आह्वान कर उनके बिलों में पानी डाल दिया है. वे सब अपनी बिलों से निकलकर बिलबिला रहे हैं. दिमागी नक्सलियों के एक दार्शनिक तो शिव पुत्र कार्तिकेय को ही नक्सली साबित करने में लग गये हैं. इनके लिए धर्म अफीम है, खासतौर से सनातन. लेकिन अपने बचाव के लिए ये उपमेय और उपमान भारतीय मनीषा से लेने में संकोच नहीं करते हैं.
जहां तक वंदे मातरम् पूरा गाने के लिए कानून बनाने का प्रश्न है तो इसमें गलत क्या है? यदि महान लोगों द्वारा बनाये गये संविधान में करीब सवा सौ संशोधन हो सकते हैं, आगे और भी संशोधन होंगे और समूचे विपक्ष को जेल में डालकर संविधान की आत्मा यानी प्रस्तावना में सेक्युलरिज्म तथा सोशलिज्म ठूंसा जा सकता है तो स्वाधीनता संग्राम के पार्श्व संगीत और प्रेरणा से परिपूर्ण और ओजपूर्ण गीत की अनिवार्यता के लिए कानून बनाने में हर्ज क्या है? कोई भी कह सकता है कि यह भाजपा का एजेंडा है, लेकिन सरकार भी तो उसी के नेतृत्ववाली है. क्या उसे अपने हिसाब से संविधान संशोधन और कानून बनाने का हक नहीं है?
यदि कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ सदन में इस मुद्दे पर कोहराम मचाती, सदन में वंदे मातरम् की धुन बजते ही समूचा विपक्ष वायकाट कर जाता तब भी कहा जा सकता था कि भाजपा ने बुलडोज किया है. लेकिन अब जबकि आम राय से वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन का कानून बन गया है, तब उसका अनुपालन आवश्यक है और इसकी अवहेलना दंडनीय अपराध है. राजनीतिक दल हों या सामाजिक संगठन या फिर दिमागी नक्सली, सबको यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि अब मामला "हिमालय का नहीं शिव के भाल का" है और इसकी रक्षा के लिए आम हिंदुस्तानी तत्पर था और रहेगा. जिन्हें बहुत बेचैनी है, वे सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं जा रहे हैं?