Girish Malviya
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते सिर्फ तेल और नैचुरल गैस ही नहीं आती हैं, असली संकट जो आने वाला है, वो क्या है? ये जान लीजिए! विकासशील देशों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी' के मुताबिक हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है. इसलिए, अगर यह समुद्री रास्ता सिर्फ 30 दिनों के लिए भी बंद हो जाए, तो दुनिया भर में खाद की किल्लत पैदा हो सकती है. इससे मक्का, गेहूं और चावल जैसी फसलों की पैदावार गिरने का बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि ये फसलें पूरी तरह से नाइट्रोजन (यूरिया) पर निर्भर होती हैं. दुनिया भर में व्यापार होने वाली प्रमुख खादों, जैसे कि अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है.
अब आते हैं अपना देश भारत पर क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा फर्टिलाइजर्स का आयातक देश है. पिछले साल के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि भारत ने 56.4 लाख टन यूरिया का आयात किया था. इसमें से 70 फीसदी आयात सिर्फ ओमान, सऊदी अरब, यूएई और बहरीन से किया गया था. डीएपी की बात करें तो पिछले साल सिर्फ सऊदी अरब ने ही भारत को 45.6 लाख टन डीएपी का निर्यात किया था, जो हमारे कुल आयात का करीब 41 फीसदी है. फिलहाल ईरान युद्ध की वजह से इन क्षेत्रों से आयात आसान नहीं रहा है,होर्मुज का रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए जितने लंबे समय तक बंद रहेगा, खाद की वैश्विक आपूर्ति उतनी ही ज्यादा ठप होने लगेगी.
भारत पर इस संकट का गंभीर असर हो सकता है, क्योंकि यह अपनी जरूरत की दो-तिहाई नाइट्रोजन खाद के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है. इसमें यूरिया का एक बड़ा हिस्सा शामिल है. खाद की कमी आने वाले मानसून में बुवाई पर असर डाल सकती है, जिससे चावल, गेहूं और अन्य मुख्य अनाजों की खेती की लागत बहुत बढ़ जाएगी. इससे 145 करोड़ लोगों के भोजन के लिए बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के मुताबिक दुनिया भर में व्यापार होने वाले यूरिया, जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद है, का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है. Qatar Fertiliser Company (QAFCO) अकेला दुनिया का 14% यूरिया सप्लाई करता है.
जब पिछले हफ्ते ईरान ने दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी और फर्टिलाइजर हब ‘रास लफ्फान' पर हमला किया था, तो कतर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा. इस वजह से लाखों टन जरूरी फर्टिलाइजर न्यूट्रिएंट्स और उन्हें बनाने वाले कच्चे माल (प्रिकर्सर्स) जहां के तहां रुक गए.
खाद (फर्टिलाइजर) महंगी होगी या मिल नहीं पाएगी. ऐसे में किसान कम खाद इस्तेमाल कर सकते हैं. नतीजतन इसका सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ेगा और आगे चलकर खाने‑पीने की चीज़ों के दाम बढ़ सकते हैं. यानी खाद्य संकट खड़ा हो सकता है. यह हैं असली संकट! देखते है इस खाद्य संकट से निपटने के लिए हमारी केंद्र की सरकार क्या रास्ता निकालती है.
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