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विधानसभा नियुक्ति घोटाले की कहानीः परीक्षा में बिना कुछ लिखे और ZERO नंबर पाने वाले भी सफल हो गये

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  • पहले जांच आयोग को विधानसभा ने सहयोग ही नहीं किया, अध्यक्ष ने त्याग पत्र दे दिया.
  • दूसरे आयोग ने गड़बड़ी पकड़ी, दो पूर्व विधानसभा अध्यक्षों पर की कार्रवाई की अनुशंसा.
  • तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष मृगेंद्र प्रताप सिंह ने नियुक्ति का विज्ञापन रद्द कर दिया था.
  • तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी ने फाइल पर लिखा था-खटिया में खटमल पड़ जाये तो खटमल निकाला जाता है. पूरी खटिया नहीं जलायी जाती है.

Ranchi : विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच के लिए कुल तीन न्यायिक आयोग बने. पहले आयोग के अध्यक्ष ने विधानसभा द्वारा जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाते हुए आयोग के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया. दूसरे आयोग के अध्यक्ष ने जांच की और अपनी रिपोर्ट सौंपी. इसमें बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का उल्लेख किया गया. साथ ही विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्षों इंदर सिंह नामधारी और आलमगीर आलम के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुशंसा की. लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई. इंदर सिंह नामधारी ने तो तत्कालीन अध्यक्ष मृगेंद्र प्रताप सिंह द्वारा रद्द किये गये नियुक्ति के विज्ञापन को वापस लेने के लिए अनोखा तर्क दिया. उन्होंने फाइल पर लिखा कि खटिया में खटमल पड़ जाये तो खटमल निकाला जाता है. पूरी खटिया नहीं जलायी जाती है.

 

जानकारी के मुताबिक झारखंड विधानसभा के दो अध्यक्षों के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों का मामला जांच के घेरे में है. विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में कुल 274 पदों पर नियुक्ति हुई. विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष आलमगीर आलम के कार्यकाल में 324 पदों पर नियुक्तियां हुई. दोनों ही अध्यक्षों के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के आरोप लगे. 

 

इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों में 70% लोग उनके गृह जिला पलामू से संबंधित थे. आलमगीर आलम के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों के दौरान पैसों के लेनदेन, नेताओं के करीबी और अयोग्य लोगों को नियुक्त करने के आरोप लगे. नियुक्तियों के मामले में हंगामा होने पर सबसे पहले झारखंड हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज लोकनाथ प्रसाद की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया गया. आयोग ने जांच शुरू की. लेकिन विधानसभा ने उन्हें जांच में सहयोग नहीं किया. वह जिन फाइलों को मांगते थे उसके बदले दूसरी फाइलें उनके पास भेज दी जाती थी. यहां तक कि आयोग के अनुरोध के बावजूद विधानसभा ने विज्ञापन प्रकाशित कराने से भी इनकार कर दिया था. 

 

आयोग ने विधानसभा से नियुक्तियों के मामले में जानकारी रखने वाले लोगों को आयोग के समक्ष उपस्थित होकर अपना बयान दर्ज कराने के लिए विज्ञापन प्रकाशित कराने का अनुरोध किया. लेकिन विधानसभा ने यह कहते हुए विज्ञापन प्रकाशित कराने से इनकार कर दिया कि यह उसका काम नहीं है. इसके बाद जस्टिस लोक नाथ प्रसाद ने जांच आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.

 

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इसके बाद विधानसभा नियुक्ति घोटाले की जांच के लिए दूसरी बार एक सदस्यीय आयोग का गठन किया गया. झारखंड हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश विक्रमादित्य प्रसाद को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. उन्हें कुछ विशेष अधिकार दिये गये ताकि वह नियुक्तियों के जुड़ी फाइलें आसानी से हासिल कर सकें. दूसरे आयोग के अध्यक्ष ने 30 बिंदुओं पर जांच की और अपनी रिपोर्ट सौंपी. रिपोर्ट में नियुक्ति के दौरान हुई गड़बड़ी का उल्लेख किया. अध्यक्ष सहित अन्य के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के अलावा मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच की अनुशंसा की.

 

उनकी अनुशंसा पर तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू (वर्तमान राष्ट्रपति) ने सीबीआई जांच की अनुशंसा की. लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एसजे मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में तीसरे आयोग का गठन किया. तीसरे आयोग के गठन का उद्देश्य, दूसरे आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने में आने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करना बताया गया. लेकिन तीसरे आयोग ने दूसरे आयोग की रिपोर्ट खारिज कर दी. तीसरे आयोग के मामले की समीक्षा के लिए दूसरे आयोग की सिर्फ रिपोर्ट दी गयी. रिपोर्ट में  वर्णित तथ्यों से संबंधित दस्तावेज उन्हें नहीं दी गयी. तीसरे आयोग के अध्यक्ष ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य का खुलासा भी किया है.

 

नियुक्ति में हुई ऐसी-ऐसी गड़बड़ी

  • पंकज कुमार ने अंग्रेजी शार्ट हैंड में सादा कापी जमा कर दी. लेकिन वह भी नियुक्त हो गये.
  • श्रीमती प्रेमा बारा को हिन्दी शार्ट हैंड में शून्य नंबर मिला था. लेकिन वह भी नियुक्त हो गयीं
  • श्रीमती एग्निस टोप्पो को अंग्रेजी शार्ट हैंड में शून्य नंबर मिला था. इसके बावजूद वह नियुक्त हो गयीं.
  • अनुराग खलखो, मनीष कुमार, अंजलिना टोप्पो, यूजीन जेवियर टोप्पो और कुमार धर के एक पेपर में Zero नंबर मिला. लेकिन सभी लोग नियुक्त हो गये.
  • अजीत कुमार ने हिन्दी शार्ट हैंड में 50% प्रतिशत शब्द लिखे. लेकिन उन्हें 25 में से 15 नंबर दिया गया. जो 50% प्रतिशत से अधिक था. यानी उन्होंने जितना लिखा उससे ज्यादा नंबर दिया गया.
  • लक्ष्मी नारायण मछुआ ने 410 में से 310 शब्द लिखे. इसमें 40 गलतियां थी. उन्होंने 50% से ज्यादा शब्द सही लिखे. लेकिन 25 में से सिर्फ सात नंबर दिया गया.
  • 18 ड्राइवरों की नियुक्ति हुई. इसमें से 14 ड्राईवर टेस्ट में शामिल हुए. टेस्ट में सभी फेल हो गये. लेकिन सभी नियुक्त हो गया. चार ड्राइवर तो टेस्ट में शामिल हुए बिना ही नियुक्त हो गये.
  • पूर्व विधायक अपर्णा सेनगुप्ता के भाई ने निर्धारित तिथि के बाद आवेदन दिया. लेकिन उसे भी नियुक्त कर लिया गया.

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