
बैजनाथ मिश्र
बिहार की सियासत ने करवट ले ली है. राज्य में शासन-प्रशासन की नयी इबारत लिखने वाले इतिहास पुरुष नीतीश कुमार राकेश चौधरी को वस्तुतः सम्राट बनाकर राज्य सभा चले गये हैं. यह सम्राट हैं तो भाजपा के और पसंद भी अमित शाह के ही हैं, लेकिन उनकी ताजपोशी नीतीश की रजामंदी से हुई है. नीतीश ने अपने बूते संघर्ष, रणनीति और सामाजिक सरोकार के सम्मिश्रण से न केवल बीस साल तक सरकार चलायी, बल्कि राज्य को "नो रिटर्न एंड" से बाहर निकालकर उसे नयी पहचान दिलायी. हालांकि वह गफलत में भी फंसे और इधर-उधर भी भागे, लेकिन अंततः वह समझ गये कि भाजपा के साथ ही चलने में भलाई है.
बिहार में बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर से लेकर लालू प्रसाद, राबड़ी देवी तक पिछड़ा वर्ग के करीब आधा दर्जन मुख्यमंत्रियों के बीच नीतीश सबसे लंबी अमिट लकीर खींचकर सत्ता से निर्लिप्त हो गये. अगर कबीर की भाषा में कहें तो उन्होंने सत्ता की चादर पर कोई दाग नहीं लगने दिया. यानी जस की तस धर दीन्ही चदरिया.
काजल की कोठरी में बीस साल रहने के बावजूद वह लक-धक सफेद हैं. उन्होंने वंशवादी राजनीति के कीचड़ में भी धंसने से इंकार कर दिया जैसे कर्पूरी ठाकुर ने किया था. वह चाहते तो अपने पुत्र निशांत को भी कुछ बना-बनवाकर गद्दी छोड़ते, लेकिन उन्होंने उसे उसकी प्रतिभा, परिश्रम और शायद प्रारब्ध के भरोसे छोड़ दिया. प्रारब्ध इसलिए कि राज्य के नये चौधरी बने सम्राट कई संयोगों और परिस्थितियों के बावजूद "भाग्यं फलति सर्वदा" के कारण ही सत्ता का सूत्र संचालन कर रहे हैं. अन्यथा सम्राट के पास न तो कोई डिग्री डिप्लोमा है, ना ही बता सकनेवाला कोई शैक्षणिक प्रमाण पत्र. उनकी वास्तविक जन्मतिथि में भी लोचा है.
1994-95 में वह नाबालिग थे क्योंकि इसी आधार पर वह हत्या के एक मामले में बरी हो गये थे, लेकिन आज वह 56-57 साल के हैं तो कैसे? नीतीश इंजीनियर हैं और किसी भी आपराधिक घटना में उनका नाम नहीं आया है. नीतीश के पिताजी वैद्य थे, लेकिन सम्राट के पिता छह-सात बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं. सम्राट की माता जी भी विधायक रही हैं. इसके बावजूद वह पढ़-लिख नहीं पाये तो शायद इसलिए कि उनकी परवरिश लालू स्कूल ऑफ थॉट में हुई थी, जहां तेल पिलावन-लाठी चलावन सिखाया जाता था और चरवाहा-हरवाहा विद्यालय के आगे की समझ ही नहीं थी.
सम्राट चौधरी कभी नरेंद्र मोदी को बिहार में निपटाने का ढ़िंढ़ोरा पीटते थे तो उनके पिता शकुनि चौधरी मोदी को जमीन में गाड़ देने की सार्वजनिक मंच से घोषणा करते थे. इसके बावजूद वह बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रुप में इतिहास पुरुष बन गये हैं तो इसलिए कि कुश (कुशवाहा) बिरादरी के हैं, संघर्ष का जज्बा उनमें है और सबसे बड़ी बात यह कि वह अब खांटी हिंदू हो गये हैं.
जब नीतीश कुमार 2020 के बाद राजद के साथ चले गये थे तब सम्राट ने सिर पर मुरेठा बांधकर प्रतिज्ञा ली थी कि यह तभी खुलेगा जब नीतीश को हटा लूंगा. थोड़ा और पहले चलें तो 2016 में वह अमित शाह से मिलकर राज्य सभा जाने की इच्छा जता चुके थे. तब शाह ने कहा था कि आपका बिहार में ही इस्तेमाल किया जाएगा. अभी लगे रहिए. उसके बाद वह एमएलसी, पार्टी के उपाध्यक्ष बने, फिर अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गयी. नीतीश लौटे तो डिप्टी सीएम बने. 2025 में फिर सरकार बनी तो नीतीश से गृह विभाग लेकर डिप्टी सीएम बने सम्राट को दे दिया गया. यह साफ संकेत था कि बिहार में भाजपा को जब भी मौका मिलेगा सेहरा सम्राट के सिर ही बंधेगा.
सम्राट भाजपा में आये एक घटना विकास से. 2013 में नरेंद्र मोदी को भाजपा का प्रचार प्रमुख बनाये जाने से नीतीश खफा थे. 2014 में वह अकेले लोकसभा चुनाव लड़े. लेकिन सिर्फ दो सीटें ही मिलीं. फिर उन्होंने अपनी जगह जीतन राम माझी को मुख्यमंत्री बना दिया. उस समय राजद के पास केवल 22 विधायक थे. सम्राट उसके मुख्य सचेतक थे. उन्होंने तेरह विधायकों के साथ सदन में राजद से अलग बैठने की मांग रख दी. तत्कालीन स्पीकर उदय नारायण चौधरी ने इस प्रस्ताव को मान्यता दे दी. बाद में लालू प्रसाद ने उनमें से नौ को तोड़ लिया. सम्राट दल बदल विरोधी कानून की चपेट में आ गये. उनकी सदस्यता चली गयी. लेकिन वह माझी के साथ ही रह गये. वहीं से वह भाजपा में आये और धीरे-धीरे अपनी काबिलियत के बूते छा गये. वह राबड़ी देवी की सरकार में भी मंत्री थे, लेकिन पच्चीस साल से कम उम्र होने के कारण हटा दिये गये थे.
खैर, सम्राट के मुख्यमंत्री बनने से सबसे अधिक पीड़ा उपेंद्र कुशवाहा को हो रही होगी. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-राजद-जदयू का अजेय गंठजोड़ था. इधर, भाजपा के साथ कुशवाहा और माझी थे. भाजपा कुशवाहा को मुख्यमंत्री के रुप में पेश कर चुनाव लड़ना चाहती थी. शर्त सिर्फ यह थी कि वह अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दें. कुशवाहा इसके लिए तैयार नहीं हुए और आज सम्राट (कुशवाहा) भाजपा के मुख्यमंत्री बन गये हैं.
दरअसल, उपेंद्र हर साल-दो साल में नयी पार्टी बनाते हैं, कहीं विलय कर देते हैं, फिर अलग हो जाते हैं. कल्पना कीजिए 2014 में वह भाजपा से मिलकर लोकसभा चुनाव लड़े थे. उन्हें तीन सीटें मिली थीं- काराकाट, जहानाबाद और सीतामढ़ी. उन्होंने तीनों सीटें जीतीं. केंद्र में मंत्री भी बने. लेकिन इस्तीफा देकर बाहर हो गये. आज फिर भाजपा के खेमे में हैं, लेकिन कोई लोकसभा सीट नहीं है. वह राज्यसभा में हैं तो भाजपा की कृपा से. तीन-चार विधायक भी हैं तो भाजपा की वजह से और बेटा दीपक प्रकाश फिर मंत्री बन पायेगा या नहीं, कहना मुश्किल है, क्योंकि इन पांच महीनों में भी वह विधान परिषद का सदस्य नहीं बन पाया है.
बिहार में यादवों के बाद पिछड़ों में सर्वाधिक आबादी कुशवाहा की है. यह वोट बैंक हमेशा नीतीश के साथ रहा. यही लव-कुश समीकरण अन्य पिछड़ों-अति पिछड़ों के साथ मिलकर राजद को मात देता रहा. अब तक सत्ता लव के हाथ में थी अब कुश के हाथ में है और जय श्री राम का घोष चातुर्दिक सुनायी दे रहा है. लेकिन सम्राट के समक्ष चुनौतियां और जिम्मेदारियां बड़ी हैं. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी पार्टी, जद(यू) और अन्य साथी दलों को संतुष्ट रखने और साथ लेकर चलने चलने की. वह भाजपा के मूल कैडर के नहीं हैं और उनके विरूद्ध असंतोष के स्वर कभी भी, कहीं से भी फूट सकते हैं. इस पूरी जमात में विघ्न संतोषियों की कमी नहीं है. उनकी कद-काठी भी नीतीश जैसी नहीं है जो साथी दलों को प्रभाव-दबाव में रख पाएगी.
हालांकि भाजपा अब बाहरी लोगों को मुख्यमंत्री बना रही है- प्रेम खांडू (अरूणाचल), हिमंता विस्वा शर्मा (असम), मानिक साहा (त्रिपुरा), बसवराज बोम्मई (कर्नाटक, पहले थे) और बंगाल जीते तो सुवेंदु अधिकारी आदि.
जहां तक जिम्मेदारी की बात है, सम्राट को पहले तो नीतीश के सात निश्चय को बढ़ाते हुए उसे मजबूती देनी है, विकास की नयी इबारतें लिखनी है, कानून-व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी और नीतीश के बनाये वोट बैंक को अपने साथ एकजुट रखना होगा. उन्हें केंद्र से हर संभव मदद मिलेगी, परामर्श भी मिलेगा और एजेंडा भी. एक बड़े सैन्य अधिकारी के राज्यपाल बनने से भी ऐसा लगता है केंद्र सम्राट के जरिये कोई नयी योजना लागू कर सकती है. सम्राट को सर्कस के कलाकार की तरह एक पतली रस्सी पर सामंजस्य बनाते हुए कई करतब दिखाने होंगे जिसकी परीक्षा 2030 में होगी. फिलहाल उन्हें अशेष शुभकामनाएं.
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