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लोककथाओं में जीवित है अधूरा जगन्नाथपुर मंदिर, नयासराय तालाब में मौजूद पत्थरों में छुपे हैं कई रहस्य

धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक रोचक लोककथा आज भी रांची के नयासराय (सपारोम) क्षेत्र में सुनने को मिलती है.  स्थानीय लोगों का दावा है कि वर्षों पहले नयासराय तालाब के बीच भगवान जगन्नाथ का एक मंदिर बनाने की शुरुआत हुई थी
 

Ranchi :  धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक रोचक लोककथा आज भी रांची के नयासराय (सपारोम) क्षेत्र में सुनने को मिलती है.  स्थानीय लोगों का दावा है कि वर्षों पहले नयासराय तालाब के बीच भगवान जगन्नाथ का एक मंदिर बनाने की शुरुआत हुई थी, लेकिन किसी कारणवश इसका निर्माण पूरा नहीं हो सका. हालांकि, इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेज या पुरातात्विक प्रमाण अब तक सामने नहीं आया है.

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गर्मियों में दिखाई देता है पत्थर का ढांचा

ग्रामीणों के अनुसार गर्मी के मौसम में जब तालाब का जलस्तर कम हो जाता है, तब तालाब के बीच पत्थरों से बना एक द्वारनुमा ढांचा साफ दिखाई देता है. बारिश के दौरान पानी बढ़ने पर यह पूरी तरह डूब जाता है. स्थानीय लोग इसे अधूरे मंदिर निर्माण का हिस्सा मानते हैं और इसे वर्षों पुरानी कहानी से जोड़ते हैं.

 

सपारोम में आज भी मौजूद है प्राचीन पत्थर का स्तंभ

सपारोम गांव में 15 से 20 फीट ऊंचा एक प्राचीन पत्थर का स्तंभ आज भी मौजूद है. ग्रामीणों का कहना है कि यह स्तंभ छोटे-बड़े पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है और इसके निर्माण में मिट्टी या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया है. उनका मानना है कि यह स्तंभ भी प्रस्तावित जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा हो सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है .

 

इतिहासकार कर रहे हैं अध्ययन

स्थानीय लोगों के अनुसार  इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए कुछ इतिहासकार और शोधकर्ता समय-समय पर यहां अध्ययन कर रहे हैं. उनका प्रयास यह जानना है कि क्या वास्तव में इस स्थान पर कभी जगन्नाथ मंदिर बनाने की योजना बनाई गयी थी या यह केवल स्थानीय लोककथाओं का हिस्सा है .

 

तालाब के भीतर भी दिखती हैं पत्थर की संरचनाएं

तालाब में तैरने वाले स्थानीय लोगों का कहना है कि गहराई में जाने पर पत्थरों से बनी करीब पांच फीट लंबी सीढ़ीनुमा संरचना दिखाई देती है. वहीं बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहां पत्थर के बने पीढ़े, बैठने के स्थान और अन्य अवशेष भी नजर आते थे, जो अब पानी और समय के साथ काफी हद तक ढंक चुके हैं .

 

तालाब से मिली वस्तुएं घर नहीं ले जाते ग्रामीण

50 वर्षीय स्थानीय निवासी महावीर कच्छप बताते हैं कि तालाब में आज भी कई पुरानी वस्तुएं मिलती हैं, लेकिन गांव के लोग उन्हें घर नहीं ले जाते. स्थानीय मान्यता है कि तालाब से मिली वस्तु घर लाने पर रात में विचित्र सपने आते हैं. इसी विश्वास के चलते लोग ऐसी वस्तुओं को वापस तालाब में ही छोड़ देते हैं. इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक या आधिकारिक आधार उपलब्ध नहीं है .

 

मटटोली में बन रही थी मौसीबाड़ी

सपारोम बस्ती के 60 वर्षीय महावीर लोहरा बताते हैं कि उनके बुजुर्गों से सुनी बातों के अनुसार मटटोली में भगवान जगन्नाथ की मौसीबाड़ी का निर्माण भी शुरू हुआ था, लेकिन किसी कारण से यह काम बीच में ही रुक गया. उनका कहना है कि तालाब के बीच आज भी पत्थरों से बना द्वारनुमा ढांचा इस कहानी की याद दिलाता है.

 

आधिकारिक पुष्टि का इंतजार

नयासराय तालाब में अधूरे जगन्नाथ मंदिर के निर्माण की यह कहानी फिलहाल स्थानीय जनश्रुतियों और लोगों की मान्यताओं पर आधारित है. अब तक कोई आधिकारिक अभिलेख, पुरातात्विक रिपोर्ट या प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो इन दावों की पुष्टि करता हो. इसके बावजूद तालाब के बीच दिखाई देने वाली पत्थर की संरचनाएं और सपारोम का प्राचीन स्तंभ आज भी स्थानीय लोगों के लिए आस्था, इतिहास और जिज्ञासा का विषय बने हुए हैं. भविष्य में यदि इस क्षेत्र पर विस्तृत पुरातात्विक या ऐतिहासिक अध्ययन होता है, तो इस रहस्य से जुड़े नये तथ्य सामने आ सकते हैं.

  

 

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