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मौत के सन्नाटे में गूंजती इंसानियत की आवाज- यही है ‘मुक्ति’

कहते हैं कि मृत्यु के बाद हर इंसान सम्मान का हकदार होता है. लेकिन कई बार जिन लाशों को कोई अपना कहने वाला नहीं मिलता, वे गुमनामी में सड़ जाती हैं. ऐसे ही भूले-बिसरे शवों को सम्मान देने का काम कर रही है रांची की सामाजिक संस्था (मुक्ति). इस संस्था के नेतृत्वकर्ता व्यवसायी व समाजसेवी प्रवीण लोहिया हैं, जिन्हें लोग मुक्तिदाता भी कहने लगे हैं.
 

Ranchi : कहते हैं कि मृत्यु के बाद हर इंसान सम्मान का हकदार होता है. लेकिन कई बार जिन लाशों को कोई अपना कहने वाला नहीं मिलता, वे गुमनामी में सड़ जाती हैं. ऐसे ही भूले-बिसरे शवों को सम्मान देने का काम कर रही है रांची की सामाजिक संस्था (मुक्ति). इस संस्था के नेतृत्वकर्ता व्यवसायी व समाजसेवी प्रवीण लोहिया हैं, जिन्हें लोग मुक्तिदाता भी कहने लगे हैं.

 

मुक्ति संस्था की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी. इसकी प्रेरणा प्रवीण लोहिया को 2013 के केदारनाथ हादसे में मिली, जब उन्होंने अनगिनत लाशों को लावारिस हालत में देखा. उसी पल उन्होंने तय किया कि रांची में कोई शव बेसहारा न रह जाए. इसी संकल्प से 'मुक्ति' का जन्म हुआ.

 

आज स्थिति यह है कि संस्था ने अब तक कुल 2064 लावारिस शवों का पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया है. यह सिलसिला निरंतर जारी है. संस्था नियमित रूप से रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) से सूचना मिलने पर शवों को लेती है और फिर जुमार नदी तट पर पूरे धार्मिक अनुष्ठान के साथ दाह-संस्कार करती है.

 

संस्था में 130 से अधिक सदस्य जुड़े हुए हैं. यह सदस्य न सिर्फ चिता सजाते हैं, बल्कि हर संस्कार उसी श्रद्धा से करते हैं, जैसे अपने परिवारजन के लिए किया जाता है. इसमें कंधा देने से लेकर मंत्रोच्चार तक, सब कुछ विधिवत किया जाता है.

 

प्रवीण लोहिया का कहना है कि किसी इंसान का जीवन भले ही गुमनामी में बीत जाए, मगर मृत्यु में उसे सम्मान अवश्य मिलना चाहिए. यही भाव उन्हें और उनके साथियों को इस कठिन सेवा कार्य में निरंतर आगे बढ़ाता है.

 

मुक्ति का यह प्रयास सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि इंसानियत तभी पूरी होती है जब हम जीते-जी ही नहीं, मरने के बाद भी एक दूसरे के काम आए.

 

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