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युद्ध के मुहाने पर दुनिया और शांति की तलाश

Nishikant Thakur  पिछले कुछ वर्षों से ऐसा लगने लगा कि विश्व अशांत हो गया है, चाहे वह रूस-यूक्रेन का युद्ध हो, या इजराइल-ईरान-इराक-फिलीपींस-लेबनान में जारी घमासान की. फिर बाद में जीत-हार की बात युद्ध समाप्त होने के बाद ही हो पाएगी. लेकिन विश्व के सभी देश डरे-सहमे हुए हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि कब कोई गोला उनके शहर या उनके घर के पास न गिर जाए, इसका अनुमान नहीं है. यह सबको मालूम है कि रूस-यूक्रेन के कितने शहर ध्वस्त हो गए और कितने सिविल नागरिक हलाक हो गए. भारत का शांति के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी है, लेकिन यह हस्तक्षेप भारत आखिर किस आधार पर करेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत और रूस के बीच एक समझौता हुआ था कि वे एक-दूसरे की मदद ही करेंगे, आक्रमण करने वाले देश विशेष का साथ नहीं देंगे, जो रूस का दुश्मन हो या फिर भारत का. पाकिस्तान के साथ युद्ध के समय तत्कालीन सोवियत संघ ने भारत की सहायता के लिए अपने नौसैनिक बेड़े को तैनात कर अमेरिका को रोकने का प्रयास किया था, जिसने 1971 में पाकिस्तान के साथ भारत के युद्ध के दौरान अपना परमाणु सशस्त्र सातवां बेड़ा भेजा था. अभी फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भेंट रूसी राष्ट्रपति पुतिन से हुई थी. इस भेंट में निश्चित रूप से यूक्रेन के विषय में भी बात हुई होगी, लेकिन बातचीत का ब्योरा सार्वजनिक न होने से बात स्पष्ट नहीं हो रही है कि आखिर निष्कर्ष क्या निकला? युद्ध खत्म होगा या जारी रहेगा? इजराइल और इराक-ईरान-फिलीपींस का आजकल एक साथ युद्ध लड़ रहे हैं. कुछ कुछ यह भी समझने का प्रयास करते हैं कि हमास और इजरायल में लड़ाई क्यों हो रही है? दरअसल, हमास फिलिस्तीनी क्षेत्र का सबसे प्रमुख इस्लामिक चरमपंथी संगठन है. इसका गठन 1987 के जनांदोलन के दौरान हुआ था. उसके बाद से यहां फिलिस्तीनी क्षेत्रों से इस्लामी सेना को हटाने के लिए संघर्ष चल रहा है. हमास, इजरायल को मान्यता नहीं देता, वह पूरे फिलिस्तीनी क्षेत्र की स्थापना करना चाहता है. ज्ञात हो कि इजराइल यहूदियों का देश है, जिसे हमास एक इस्लामिक राज्य बनाना चाहता है. याहया सिनवार आतंकी संगठन हमास के प्रमुख थे, जो पिछले दिनों एक हमले में मार दिए गए. याहया का जन्म 1962 में गाजा के एक शरणार्थी कैंप में हुआ था.अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन पश्चिमी एशिया में छिड़े युद्ध को रुकवाने के प्रयासों के तहत एक बार फिर पश्चिमी एशिया के दौरे पर हैं. उनकी कोशिश गाजा और लेबनान में युद्ध रुकवाकर तनाव खत्म करने की है. 7 अक्टूबर, 1923 को इजराइल पर हुए हमले के बाद ब्लिंकन का पश्चिमी एशिया का यह 11वां दौरा है. बाइडन प्रशासन की कोशिश है कि 5 नवंबर के चुनाव से पहले पश्चिम एशिया का तनाव कम हो जाए, जिससे अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी को राजनैतिक लाभ मिल जाए. अब हिजबुल्लाह क्या है, इसे समझने का प्रयास करते हैं. हिजबुल्लाह लेबनान में स्थित एक शिया मुस्लिम राजनीतिक दल और उग्रवादी समूह है. पंद्रह साल (1975 से 1990) के लेबनानी गृहयुद्ध की अराजकता के दौरान स्थापित, ईरान समर्थित समूह इजराइल के प्रति अपने हिंसक विरोध और मध्य-पूर्व में पश्चिमी प्रभाव के प्रति अपने प्रतिरोध से प्रेरित है. संयुक्त राज्य अमेरिका और कई अन्य देशों में हिजबुल्लाह को एक आतंकी संगठन माना जाता है, क्योंकि ईरान और सीरिया के दमनकारी, इजराइल विरोधी शासनों के साथ इसके गहरे सैन्य गठबंधन है. हाल के वर्षों में हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच सीमा पर संघर्ष बढ़ गए हैं, खासकर पिछले साल से गाजापट्टी में हमास के साथ इजराइल के चल रहे युद्ध के दौरान. हिजबुल्लाह के साथ अपनी लड़ाई को और तेज करते हुए इजराइल ने लंबे समय से उसके नेता हसन नसरुल्लाह को मार डाला और दक्षिण लेबनान में इस समूह के खिलाफ जमीनी हमला किया. भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ (RAW) के पहले प्रमुख और भारत के मास्टरस्पाई के नाम से मशहूर ( 10 मई, 1918 को जन्मे) रामेश्वर नाथ काव की समझ और बेहतरीन रणनीति की वजह से ही भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को पूरी दुनिया में एक अलग पहचान और कामयाबी मिली. हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, जब कहीं रॉ की चर्चा होती है या कोई जिक्र करता है. लेकिन, इतनी बड़ी संस्था की बदनामी विश्व भर में हो जाए, इसे कोई भी दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहा है, क्योंकि विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका ने तथाकथित भारतीय एजेंट विकास यादव को एक खालिस्तानी समर्थक आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रचने के मामले में भारत सरकार के एक पूर्व अधिकारी को आरोपित किया है. यह चूक भारतीय अधिकारी से कैसे हो गई, इसकी जांच तो भारत सरकार कर ही रही है, लेकिन अमेरिका की फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने कुछ दिन पहले तक रॉ में कार्यरत विकास यादव के नाम का पूरा ब्योरा देते हुए भाड़े के हत्यारे से पन्नू की हत्या करवाने की साजिश रचने, गैर कानूनी ढंग से एक देश से दूसरे देश पैसे भेजने का आरोप लगाया है। हर देश में ऐसा होता रहता है कि वह अपने देश के एजेंट को दूसरे देश में भेजते रहे है, लेकिन इस राज पर पर्दा ही पड़ा रहता है. रॉ जैसी प्रतिष्ठित संस्था के अधिकारी से ऐसी भूल की कतई आशा नहीं की जाती है, लेकिन जो कुछ हुआ है और जिसके कारण हमारे देश के संबंध कनाडा और अमेरिका से खराब हुए है, यहां इसलिए इसका उल्लेख करना आवश्यक है, क्योंकि भारत कई विश्वस्तरीय समस्याओं से जूझ रहा है. ऊपर से इस तरह की बदनामी भी सिर पर आ जाए, तो उस बोझ को उतरने में काफी समय लग सकता है. वैसे पिछले कुछ वर्षों में हमारे संबंध भी पूरी दुनिया से लगभग खराब ही हुए है, सुधरे नहीं हैं। हमारे खास मित्र श्रीलंका से अच्छे संबंध थे, लेकिन आज हालत बदले हुए हैं और हमारे देश का वह पुराना और भरोसेमंद मित्र नहीं रहा. इसी तरह जिसका जन्म ही भारत के विरोध के कारण हुआ, वह भी भारत से दुश्मनी कर बैठा है. रही बात अपना सबसे करीबी और बेटी-रोटी का संबंध वाला देश नेपाल हमसे छिटककर चीन की तरफ अपना कदम बढ़ा चुका है. चीन तो कभी हमारा नहीं था और आज तो वह हमारे ही सीने पर मूंग दल रहा है. विश्लेषक कहते हैं कि उसने हमारी भूमि पर अपने कई गांव बसा लिए हैं, लेकिन हम उसे आंख दिखाने के बजाय हमारे विदेश मंत्री कहते हैं कि वह बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है. उससे हम अपनी तुलना नहीं कर सकते. और, प्रधानमंत्री स्वयं कहते हैं कि हमारी सीमा में न घुसा है, न ही किसी ने गांव बसाया है. अब किसकी बात पर भरोसा किया जाए? रही पड़ोसी पाकिस्तान की बात? तो उस देश का जन्म ही भारत का विरोध करने के लिए हुआ है. इसी वज​ह से वह भारत के विकास को देखकर और उससे चिढ़कर बार-बार आक्रमण करता है. अपने तरह-तरह के आतंकी घुसपैठियों को ट्रेंड करके भारत को नुकसान पहुंचाता रहता है. इन सारी बातों का उल्लेख करना इसलिए जरूरी था, क्योंकि आज विश्व की जो स्थिति है, उससे भारत अलग नहीं हैं, क्योंकि कहा जाता है कि यदि जंगल में आग लगती है, तो उसे फैलने में देर नहीं लगती और न ही उसे कोई छुपा सकता है. इसलिए हमारे राजनेताओं को सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि युद्ध जब शुरू होता है, तो साधारण इंसान की स्थिति कीड़े मकोड़े जैसी हो जाती है, जबकि हमारे समर्पित सैन्यशक्ति सदैव तैयार रहते हैं. लेकिन, जिनके द्वारा देश में युद्ध न हो, देश का विकास हो, वे नीति-निर्माता तो हमारे राजनेता ही होते हैं. उनकी नीति और कूटनीति से ही देश आगे बढ़ता और उन्हीं के कारण देश गर्त में भी चला जाता है। डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.

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