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स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नायकों का अध्ययन व दस्तावेजीकरण की है जरूरत

Ranchi : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र क्षेत्रीय केंद्र और डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, मोरहाबादी के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को तेलंगा खड़िया की 219वीं जयंती मनाई गई. इस अवसर पर "तेलंगा खड़िया - स्वाधीनता संघर्ष का एक अल्पज्ञात जनजातीय शहीद" विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. कुमार संजय झा ने स्वागत भाषण दिया और कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी नायकों का महत्वपूर्ण योगदान है. इन सभी नायकों के जीवन का अध्ययन और दस्तावेजीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है.आज़ादी का अमृत महोत्सव पहल के तहत भारत के गुमनाम आदिवासी नायकों को समर्पित कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं. वक्ता ने कहा कि पिछले साहित्यिक कार्यों और ऐतिहासिक दस्तावेजों से सावधानीपूर्वक जानकारी प्राप्त की गई है, जिसमें 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ आदिवासी प्रतिरोध का नेतृत्व किया गया था.https://lagatar.in/wp-content/uploads/2025/02/Untitled-6-14.jpg">

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जनजातीय वीरों का इतिहास हाशिए पर है - अंगद किशोर

मुख्य अतिथि अंगद किशोर ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि तेलंगा खड़िया को अल्पज्ञात जननायक श्रेणी में गिना जाता है, लेकिन वह उन महान वीरों में से हैं जिनका योगदान भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अद्वितीय है. भारतवर्ष में जनजातीय वीरों का इतिहास हाशिए पर है, जिसे मुख्यधारा के इतिहास में सम्मान के साथ सम्मिलित करने की आवश्यकता है.सम्मानित अतिथि डॉ. बिनोद कुमार ने जनजातीय स्वाधीनता संघर्षों के मुख्य कारणों पर प्रकाश डाला और कहा कि जनजातीय समाज का प्रकृति से प्रेम है. इसकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहने की प्रवृत्ति रही है, और यही कारण है कि आदिवासी समाज ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में एकजुटता दिखायी.

वीर सपूत तेलंगा खड़िया आज भी गुमनाम - प्रो. डी.एन. वर्मा

सेवानिवृत्त प्रोफेसर और रामपुर हाट के अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र के संस्थापक प्रो. डी.एन. वर्मा ने संबोधित किया और कहा कि तेलंगा खड़िया अंग्रेजों के सामने कभी नहीं झुके. इसका प्रमाण विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों, मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों और खड़िया लोकगीतों में मिलता है. इस आदिवासी शहीद का उल्लेख होने के बावजूद यह वीर सपूत आज भी गुमनाम है.पूर्व में किए गए शोधों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए प्रो. वर्मा ने कहा कि औपनिवेशिक इतिहासकारों ने आदिवासियों को असभ्य, जंगली और बर्बर कहा था. लेकिन इसके बावजूद आदिवासी नायकों ने विदेशी शासन का पुरजोर प्रतिरोध किया. इसके बाद भी आज इनकी गौरव गाथा और अधिकांश गुमनाम हैं.

आदिवासियों का संघर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं

अनुपम शौर्य और अनवरत संघर्ष का निष्पक्ष मूल्यांकन देश के इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं किया गया है. विभिन्न जनजातीय संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संताल हूल 1855-1856 के सिदो और कान्हू, मुंडा संघर्ष 1895-1900 के बिरसा मुंडा, साफाहोड़ आन्दोलन के भागीरथ मांझी आदि से लोग अवगत हैं, लेकिन गोनो पिंगुआ (1857, कोल्हान), प्रोटो हो (1836-1837) जैसे आदिवासी समुदाय के वीर नायकों की तरह छोटानागपुर क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता का प्रतिरोध करने वाले तेलंगा खड़िया (1806-1880) के ऐतिहासिक संघर्ष और उनके बलिदान से लोग परिचित नहीं हैं.

कार्यक्रम में ये शामिल थे

रांची विश्वविद्यालय के खड़िया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बंधू भगत, सहायक प्राध्यापक डॉ. मेरी एस. सोरेन, संत ज़ेवियर कॉलेज हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. कमल कुमार बोस, डी.एस.पी.एम.यू. हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जिंदर सिंह मुंडा, डॉ. सावित्री बड़ाइक समेत अन्य विद्वान, शोधकर्ता और छात्र शामिल थे.

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