- (बिना 'शाखा' गये संघी या अवैतनिक सरकारी वकील!)

श्रीनिवास
सवर्ण समुदाय, जिसे खुद के श्रेष्ठ होने का गुमान और भ्रम है, के कुछ लोग, जो शिक्षित हैं और जिनको आधुनिक और लिबरल माना जाता है, दुविधा में हैं. या शायद हम जैसों को ऐसा भ्रम होता है! ऐसे लोग अनेक कारणों से भाजपा-संघ को पसंद करते हैं, मगर ऐसा दिखना नहीं चाहते. ‘हमें किसी पार्टी से लेना-देना नहीं है’, कि ‘हम तो तटस्थ हैं’ जैसा बोलना जरूरी लगता है.
मगर थोड़ी देर बातचीत करने पर उनका छिलका उतार जाता है. उनके अंदर बैठा संकीर्ण हिंदू, यानी जन्मजात ‘सर्वश्रेष्ठ’ बाहर आने लगता है. ‘तटस्थ’ दिखना है तो किसी भी पार्टी और नेता का आलोचना कर सकते हैं, करते हैं. मगर आलोचना के निशाने पर हमेशा भाजपा विरोधी दल और उनके नेता होंगे! कभी दबे स्वर में संघ जमात की भी.
उनकी पूरी बौद्धिकता, तर्कशक्ति मोदी और भाजपा विरोधी जमातों की अतीत की ऐसी करतूतों को खोजने में खर्च होती है, जिनको वे मौजूदा सरकार के किसी गलत फैसले की आलोचना के जवाब में पेश कर सकें. ऐसा तो हमेशा से होता रहा है, कि कांग्रेस ने तो इससे भी बड़ी गलतियां की हैं. राज्यपाल, लोकसभा या विधानसभा अध्यक्ष का पक्षपात, पूर्व जजों को उपकृत करना, चुनाव आयोग सहित अन्य संस्थाओं, एजेंसियों का दुरुपयोग आदि.
यहां तक कि प्रकट में नेहरू और गांधी के योगदान को स्वीकार करते हुए भी, अतीत के ऐसे प्रसंगों पर रिसर्च करने में लगे रहते हैं, जिनके आधार पर उनकी छवि में कुछ दाग दिख सके! दूसरी तरफ सावरकर की कमियां स्वीकार करने के बावजूद उनके ‘सकारात्मक’ योगदान के लिए भी उनके पास ‘तथ्य’ और तर्क रहता है!
ऐसे लोग मूलतः ब्राह्मणवादी हैं. ऊंच-नीच की सामाजिक व्यवस्था को सही मानते हैं, उसके लाभुक हैं. इस जन्मजात विशेषाधिकार को छोड़ना नहीं चाहते! इनको न सेकुलरिज्म पसंद है, न साम्यवाद. प्रछन्न पूंजीवाद, निजीकरण का समर्थन करते हैं. आरक्षण विरोधी हैं. सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और काहिली के किस्से और प्रमाण धड़ल्ले से बता सकते है, इसी आधार पर निजीकरण को जरूरी मानते हैं.
अडानी और अंबानी जैसों की ‘सफलता’ में इनको देश का गौरव नजर आता है. और सबसे बढ़ कर इस्लाम को खतरनाक धर्म. साथ ही मानते हैं कि मुसलमान कभी देशभक्त नहीं हो सकता, कि वे आदतन अपराधी होते हैं, किसी अन्य धार्मिक समुदाय के साथ सहजता से नहीं रह सकते. इसके लिए अन्य देशों के उदाहरण भी देंगे, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं.
इसलिए मोदी-योगी एंड कंपनी का ‘मियां मारो अभियान’ और बजरंगियों के उत्पात इनको दिखते नहीं या उससे कोई परेशानी नहीं होती. बल्कि शायद उसे सही और जरूरी मानते हैं, भले ही ऐसा कहने में संकोच करते हैं.
अंदर से ‘हिंदू राष्ट्र’ की कल्पना इनको गुदगुदाती भी है. ये हिंदू समाज में प्रभावी भी हैं और बारीकी से निचले तबकों में संघी एजेंडा फैलाने का काम करते हैं. थोड़ी दुविधा के बावजूद, उस जमात के घोषित सदस्य बने बिना उसके समर्पित कार्यकर्ता की भूमिका निभाते हैं. फिर भी ये 'तटस्थ' हैं, 'लिबरल' भी!