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'ये है बिहार, जहां फिर से नीतीशे कुमार

Nishikant Thakur पिछले सप्ताह जिन्हें बिहार की राजनीति से लगाव रहा होगा, उनकी बुद्धि वहां की राजनीति और राजनीतिज्ञों के बारे में सुन—सुनकर कुंद हो गई होगी. वहीं बिहार, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, वही जदयू, वही आरजेडी, वही भाजपा. दिन-रात, सुबह-शाम चाहे सोशल मीडिया हो, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, वही एक तर्क नीतीश कुमार वर्तमान महागठबंधन की सरकार से इस्तीफा देकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रहे हैं. साथ ही यह भी कहा जा रहा था कि `पलटूराम` ने अपना भविष्य सोच लिया और बस दो—तीन दिन में इस्तीफा देकर भाजपा के साथ सरकार का गठन करेंगे. अब वह ऐसा इसलिए कर रहे थे कि उनका तालमेल लालू प्रसाद यादव से बैठ नहीं रहा है और वे भारी दबाव में काम कर रहे हैं. इतना ही नहीं, जो काम वह कर रहे हैं, उसका श्रेय भी उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उठा रहे हैं. फिर 28 जनवरी को उन्होंने राज्यपाल को त्यागपत्र सौंप दिया. अभी भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं, लेकिन सरकार अब एनडीए की है. उधर, तेजस्वी यादव कहते हैं, `थके हुए मुख्यमंत्री से हमने काम करवाया. हमने संयम से गठबंधन का पालन किया. अभी खेल शुरू हुआ है, बहुत खेल बाकी है. मैं जो कहता हूं, वह करता हूं. आप लिखकर रख लीजिए जेडीयू 2024 में खत्म हो जाएगी.` पता नहीं किस मुहूर्त में उन्होंने राजनीति में कदम रखा था कि बार-बार पलटी मारने के बावजूद उनका राजनीतिक जीवन बिंदास चल रहा है. अभी पिछले दिनों सोशल मीडिया पर राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर का एक बयान आया था कि नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन की आखिरी पारी खेल रहे हैं. अब जो स्थिति स्वयं नीतीश कुमार ने अपने लिए बना दी है, उसमें तो ऐसा ही लगने लगा है कि प्रशांत किशोर ने बिल्कुल सही विश्लेषण किया है. सच तो यह है कि राजनीतिज्ञ यदि राजनीति नहीं करेंगे, तो कौन करेगा. वैसे, हल्की-फुल्की राजनीति तो परिवार और दफ्तरों में भी होती रहती है, देश के लिए राजनीति करने वाले दूरदर्शी होते हैं और सामान्य जनता की नब्ज और मानसिकता तथा हवा का रुख अच्छी तरह पहचानते हैं. वे इस बात को जानते हैं कि जब जैसी बहे बयार, तैसी पीठ मोड़ दें, यही तो नीतीश कुमार अब तक करते आ रहे हैं और संभवतः नीतीश कुमार देश के पहले व्यक्ति होंगे, जिन्होंने एक टर्म में तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हो. वैसे, नीतीश कुमार का इस बार का शपथ ग्रहण कुल नौवीं बार हुआ. गृहमंत्री जब नीतीश कुमार से मिलेंगे तो क्या इस बात को वे भूल चुके होंगे, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा था कि `नीतीश बाबू और ललन सिंह के लिए भाजपा के दरवाजे सदा के लिए बिलकुल बंद हो गए हैं.` इसका जवाब देते हुए नीतीश कुमार ने भी कहा था `मिट्टी में मिल जाऊंगा, लेकिन भाजपा में नहीं जाऊंगा.` इस बात को बिहार ही नहीं, देश का लगभग हर वह व्यक्ति जानता है. जिनकी थोड़ी भी रुचि राजनीति को जानने की होती है, वह सब इस सच को जानते हैं कि भाजपा की बुनियाद ही झूठ की नींव पर टिकी है, लेकिन नीतीश कुमार की तो कुछ साख थी और इसलिए बिहार ही नहीं, देश की जनता और राजनीति के मर्मज्ञ नीतीश कुमार की विशेषता को जानते हैं, लेकिन यह क्या? मिनटों में बिहार की 13 करोड़ जनता को ठेंगा दिखा दिया जाए. जिस प्रकार जयप्रकाश आंदोलन से नीतीश कुमार और लालू प्रसाद सुर्खियों में आए थे, इन लोगों ने देश के इतिहास को जानबूझकर भुला दिया. अब इस समस्या का निदान कैसे हो, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए. समीक्षकों का कहना है कि भाजपा ने जिस उम्मीद से उन्हें वापस अपनी पार्टी में शामिल किया है, वह पूरा होगा, इसमें संदेह है. समीक्षक तो यह भी चुनौती देते हैं कि यदि भाजपा को नीतीश कुमार की छवि इतनी साफ लगती है, तो आगामी लोकसभा चुनाव में उनको अपना चेहरा बनाकर चुनाव लडे, फिर उन्हें नीतीश कुमार की छवि का सच समझ में आ जाएगा. जो भी हुआ, वह कुछ की नजर में अच्छा, तो कुछ की नजर में बुरा हुआ ही होगा. फिर जिन्हें बुरा लगा होगा, वह अपनी भड़ास किसी न किसी रूप में तो निकलेंगे ही और जिन्हें नीतीश कुमार का यह दल बदलना अच्छा लगा होगा, उनकी प्रतिक्रिया तो निश्चित रूप से सकारात्मक होगी. अब पूरी स्थिति बिहार की जनता पर निर्भर करती है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में किसके लिए अपना मतदान करती है और किसे दिल्ली की सत्ता में पहुंचाने में योगदान देती है. यह सच है कि नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल बहुत ही सराहनीय रहा और बिहार ने विकास के कई रिकर्डतोड़ कार्य किए, लेकिन धीरे-धीरे उनका कार्यकाल सराहनीय नहीं रहा. लेकिन, सदैव उनका तालमेल किसी न किसी दल से ऐसा रहा कि पिछले लगभग बीस वर्षों से मुख्यमंत्री बने रहे. कभी एनडीए के साथ गठजोड़ के साथ कभी राजद के साथ रहकर. पार्टी में घालमेल करते रहे और अपनी काबिलियत को कायम रखते हुए सदैव मुख्यमंत्री ही बने रहे. समीक्षकों की मानें इस बार की नई पारी तो उन्होंने अभी शुरू ही की है, इसलिए अभी से कोई नकारात्मक टिप्पणी उचित नहीं होगा. सकारात्मक टिप्पणी यह होगी कि वह बिहार की जनता को देश में दर—दर भटकने के लिए न छोड़कर उनके हित में रोजगार के लिए कुछ करें, राज्य में शांति—व्यवस्था बनाए रखें और राज्य का विकास करके बिहार के विकासपुरुष कहलाएं. लेकिन, क्या ऐसा हो सकेगा? डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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